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Saturday 16th of November 2019
 
चितोडगढ़

चित्तौड़ दुर्ग के सीताफल की मिठास कुछ हटकर है, विदेशी पर्यटक भी लेते हैं स्वाद

Friday, November 08, 2019 14:50 PM
सीताफल की टोकरियां लेकर बैठे विक्रेता

चित्तौड़गढ़। देश के दूर-दराज तक प्रसिद्धि पा चुके चित्तौड़ दुर्ग के सीताफल की मिठास इस वर्ष भी महंगा होने की वजह से आम लोगों से अभी दूर है, लेकिन इस वर्ष अच्छी पैदावार बताई जा रही है।

दुर्ग स्थित विशाल भू-भाग में फैले हजारों पेड़ों पर शरद ऋतु आने के साथ ही सीताफल आना शुरू हो जाते हैं, जिसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं तहसील विभाग की ओर से प्रति वर्ष ठेका दिया जाता है। इस ठेके के लिए लगाई जाने वाली बोली में राज्य की राजधानी से लेकर देश की राजधानी तक कई लोग यहां भाग लेते हैं।


मिठाई के स्थान पर भेजते हैं सीताफल
इस वर्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से बोली लाखों में छूटी, दुर्ग पर सीताफल की लकदक अक्टूबर में शुरू हो जाती है, एवं दीपावली के आसपास इसकी मिठास लोगों तक पहुंचना शुरू हो जाती है, जिसके चलते काफी लोग दीपावली पर मिठाई के स्थान पर यहां के प्रसिद्ध सीताफल की टोकरी अपने परिचितों को भिजवाते हैं।


देरी से हुई पैदावार
इस वर्ष  समय पर फूल नहीं आने की वजह से सीताफल की पैदावार देरी से तैयार हो पाई। इसकी मिठास का आनंद लेने के लिए अपेक्षाकृत कुछ इंतजार करना पड़ा, लेकिन इस वर्ष पैदावार अच्छी बताई जा रही है। दीपावली के बाद अब यह पैदावार बाजार में आ चुकी है। माना जा रहा था कि दिसम्बर तक लोगों को यहां के सीताफल की मिठास का आनंद लेने का मौका मिल सकेगा। हालांकि इससे पूर्व जिले में अन्य स्थानों पर खेतों में तैयार की गई फसल यहां बाजार में पहुंच गई थी, एवं कई व्यापारियों ने इस सीताफल को भी दुर्ग के सीताफल बताकर भ्रमित करना शुरू कर दिया, लेकिन खेतों में तैयार होेने वाले सीताफल एवं दुर्ग पर मौजूद सीताफल की मिठास में दिन-रात का अंतर है।


डाल पक हैं यहां के सीताफल

सीताफल की पैदावार अन्य कई स्थानों पर भी होती है, लेकिन यहां के सीताफल को डाल पक सीताफल के रूप में माना जाता है, जो कि पेड़ों पर ही पक जाते हैं, जबकि अन्यत्र भिजवाए जाने वाले सीताफल को कुछ कच्चा होने पर तोड़ दिया जाता है, एवं बाद में यह स्वतः ही पक जाते हैं। यहां के सीताफल के बीज भी अपेक्षाकृत बड़े होने के साथ ही इसकी मिठास कुछ अलग ही होती है।


दुर्ग पर लगभग 13 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में कई एकड़ में दुर्ग पर सीताफल के यह वृक्ष लगे हुए हैं। यहां आने वाले विदेशी पर्यटक भी सीजन में इस सीताफल का आनंद लेते हैं। इस वर्ष यह सीताफल 100 से 120 रूपए प्रति किलो के अनुसार बिक रहे हैं, जो गत वर्ष के मुकाबले कुछ अधिक है, जबकि अन्य स्थानों के सीताफल 60 से 80 रुपए प्रति किलो में बिक रहे हैं। दुर्ग के सीताफल की विशेषता यह भी है कि यह साइज में भी अपेक्षाकृत काफी बडे होते हैं। कई सीताफल तो एक किलो में तीन से चार तक ही तुल पाते हैं।


स्वतः ही लग जाते हैं पेड़
ठेकेदारों के अनुसार, ठेका मंहगा छूटने से इस वर्ष इसके भाव अधिक हैं, लेकिन आगामी महीनों में कुछ गिरावट हो सकती है। दुर्ग पर सीताफल की खेती कब से हो रही है, इसके बारे में दावे के साथ दुर्ग पर निवास करने वाले लोग भी नहीं बता पाते हैं, लेकिन उनके अनुसार राजा-महाराजाओं के समय भी यहां सीताफल हुआ करते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि सीताफल के पेड़ कोई नहीं लगाता है, बल्कि 15-20 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद सीताफल का पेड़ खत्म हो जाता है, एवं इससे गिरने वाले बीजों से नए पेड़ आकार लेते रहते हैं।

यहां के सीताफल को दूर-दराज स्थानों पर निवास करने वाले कई लोगों द्वारा यहां निवास करने वाले अपने रिश्तेदारों-परिचितों से अक्टूबर माह से सीताफल की टोकरी भिजवाने के लिए विशेष रूप से फरमाइश करना शुरू कर दिया जाता है। यहां से कई जने वीआईपी लोगों को भी यह सीताफल प्रति वर्ष भिजवाते हैं। दूर दराज रहने वाले लोगों को प्रति वर्ष बेसब्री के साथ यहां के सीताफल का इंतजार रहता है।

विशेष पैकिंग की जाती है
दुर्ग के प्रथम द्धार पाड़नपोल एवं गांधी चैक में सीजन के समय सुबह करीब 6 बजे से ही दुर्ग से सीताफल तोड़ने के बाद यहां बिक्री के लिए व्यवसायी पहुंच जाते हैं। बाहर भेजने वाले सीताफलों की विशेष रूप से पैकिंग की जाती है।

सीताफल व्यापारियों के अनुसार, एक समय वह भी था, जबकि यह सीताफल 10 से 20 रुपए किलो भी बिका करते थे, लेकिन जब से ठेका महंगा छूटने लगा है, तब से आम लोगों की पहुंच से भी यह दूर होने लगा है। दूरदराज तक लोगों द्वारा यह सीताफल भिजवाए जाने की वजह से व्यापारियों को प्रतिदिन कई कार्टून की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिसके अंदर सीताफल के पेड़ के पत्तों के साथ इसकी पैकिंग इस तरह की जाती है, जिससे चार-पांच दिनों तक सीताफल का आनंद लिया जा सके।

इन दिनों सवेरा होते ही यहां गांधी चौक पर भी सीताफल लेने वालों का तांता लग जाता है, जहां विक्रेता सवेरे जल्दी आ कर सीताफल के टोकरे सजा देते हैं।