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Thursday 14th of November 2019
 
कोटा

दस्त से तीन माह में हुई 10 भैंसों की मौत

Thursday, November 07, 2019 01:10 AM
मोड़क स्टेशन। बीमार पशु की देखभाल करते उपसरपंच दशरथ मीणा।

 मोड़क स्टेशन। कस्बे में तीन माह के अंतराल में उपसरपंच दशरथ मीणा की एक-एक कर  10 व्यस्क भैंसें तथा उनके पाड़ा-पाड़ी दस्त के चलते मौत के शिकार हो गए। परिवार को तकरीबन चार लाख रुपए की आर्थिक क्षति हुई है।

     कस्बे से महज 2 किमी की दूरी पर मोड़क गांव में स्थित पशु चिकित्सालय के पशु चिकित्सक ने बार बार भैंसों की बीमारी के बारे में सूचना दिए जाने पर भी स्वयं आकर भैंसों की जांच कर उपचार करने की जहमत नहीं उठाई। दशरथ मीणा ने कोटा स्थित पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर को सूचना दिए जाने के बाद भी उन्होंने उपचार के लिए कोई प्रभावी कदम उठाने के निर्देश नहीं दिए।े 
       25 के कुनबे में से बची 15 भैंसें, एक अभी भी बीमार...  
दशरथ मीणा का पूरा परिवार बरसों से पशुपालन का काम करता रहा है। इसी के चलते इस परिवार के पास 25 भैंसों और उनके पाड़ा-पाड़ी का बड़ा रेवड़ था जो संभवतया उपखण्ड में किसी भी परिवार के पास नहीं होगा। पशुपालन से परिवार को अच्छी आय हो रही थी। परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रतिदिन सुबह से भैंसों की देखरेख में लग जाया करता था। 
      भैंसों को नहलाना, उनके बाड़े की साफ-सफाई करना जैसे तमाम काम परिवार के सदस्यों द्वारा किए जाते थे। भोजन के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रु. का भूसा और 3 लाख रु. की खल डलवाई जाती थी। 1 लाख रु. सालाना का एक श्रमिक रखा गया था। तीन माह की अवधि में कुनबे में से 10 सदस्य कम हो गए। दुर्भाग्य की बात ये है कि एक पाड़ा इस वक्त बीमारी की उसी स्थिति से गुजर रहा है, जिससे गुजरकर 10 भैंसें मौत का शिकार बनी थीं। 
        एक भैंस को दस्त लगने से हुई बीमारी की शुरूआत... 
सुनने में शायद आश्चर्यजनक लगे लेकिन बीमारी की शुरूआत एक भैंस को दस्त लगने से हुई। दस्त खाना कम होने लगा। इसका पता दशरथ मीणा को तीन दिन बाद लगा। उसने तुरंत मोड़क गांव स्थित पशु चिकित्सालय से संपर्क किया। 
    पशु चिकित्सालय से नंदकिशोर नाम का कर्मचारी आया, जिसने भैंस को देखकर उपचार लिख दिया। 15 दिन तक चले उपचार के बावजूद भैंस नहीं बच पाई। उपचार के दौरान चार और पशु बीमारी का शिकार हुए और अगले 15 दिनों में चारों मौत का शिकार हो गए।
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   नंदकिशोर नाम का कार्मिक जो भैंसों को देखने आता था, उसने जो भी उपचार बताया मैंने वो दवा कोटा तक से मंगवा कर भैंसों को दी। लेकिन तीन महीने में इलाज  के बावजूद हम पशुओं को नहीं बचा सके। मोड़क गांव अस्पताल से डॉक्टर या कम्पाउंडर कभी आया नहीं। जिसके चलते दस्त बंद नहीं हुए और एक एक करके पशु मरते चले गए। मैंने रामगंजमंडी में सीनियर डॉ. अनिल मीणा और कोटा में डिप्टी डायरेक्टर को भी स्थिति से अवगत करवाया।  
-दशरथ मीणा, उपसरपंच  
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  यदि पशु अस्पताल लाने की स्थिति में नहीं है, तो मैं स्वयं जाकर देखता हंू और जो दवाएं अस्पताल में उपलब्ध होती हंै वे देते हंै। जरुरत पड़ने पर बाजार से मंगवाते हंै। दशरथ मीणा से मैंने उनके द्वारा करवाई जांचों की रिपोर्ट लेकर आने के लिए कहा था, लेकिन वे आए ही नहीं। कल मैं खुद जाकर उनके पशुओं की जांच करूंगा और उपचार दूंगा। 
-डॉ. हेमंत राठौड़, पशु चिकित्सक