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अभिव्यक्ति की आजादी की एक और बहस

Wednesday, March 24, 2021 11:15 AM
अरविंद सुब्रमण्यम (फाइल फोटो)

तो अब मुल्क में अशोका विश्वविद्यालय के बरक्स अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल जेरेबहस है। बहस के केन्द्र में जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता और पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का इस्तीफा है। हरियाणा के सोनीपत में स्थित यह विश्वविद्यालय इस हफ्ते तब विवादों में आया, जब बीते मंगलवार यानी 16 मार्च को जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया। अशोका यूनिवर्सिटी में वे जुलाई 2017 से जुलाई 2019 के बीच वाइस चांसलर रहे। बाद में उनने ये पद छोड़ दिया, लेकिन यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर बने रहे और पढ़ाने का काम जारी रखा। अब उन्होंने इस पद से भी इस्तीफा दे दिया है। मेहता ने इस्तीफा देते हुए कहा कि संस्थापकों ने यह ‘खुलकर स्पष्ट’ कर दिया है कि संस्थान से उनका जुड़ाव ‘राजनीतिक जवाबदेही’ था। मेहता ने दो साल पहले विश्वविद्यालय के कुलपति पद से भी इस्तीफा दिया था। इसके दो दिन बाद यानी 18 मार्च को अरविंद सुब्रमण्यम, जोकि नरेंद्र मोदी सरकार में चार साल मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) रहे थे, उनने भी मेहता के साथ एकजुटता दिखाते हुए दो दिन बाद विश्वविद्यालय से इस्तीफा दे दिया।

सुब्रमण्यम ने अपने इस्तीफे में कहा कि यूनिवर्सिटी में प्रताप भानु मेहता पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया गया, जिस कारण वे भी इस्तीफा दे रहे हैं। बात आगे बढ़ाने से पहले मेहता का मुख्तसर परिचय जान लेना लाजिम है। मेहता मुल्क के जाने-माने बुद्धिजीवियों में हैं। उन्हें राजनीति, राजनीतिक सिद्धांत, संविधान, शासन और राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे विषयों का जानकार माना जाता है। उनने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की है। अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली है। वे अशोका यूनिवर्सिटी से पहले तमाम प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में पढ़ा चुके हैं। इनमें अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और दिगी स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे चर्चित संस्थान शामिल हैं। केंद्र सरकार के थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। मनमोहन सरकार में बने नेशनल नॉलेज कमीशन के सदस्य भी रहे हैं। प्रताप भारत के विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्र संघ चुनावों की गाइडलाइंस तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई लिंगदोह कमेटी में भी शामिल रह चुके हैं। इसके अलावा, वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की काउंसिल ऑफ ग्लोबल गवर्नेंस में वाइस चेयरमैन रह चुके हैं। वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। देश-विदेश के अखबारों में उनके लेख छपते रहते हैं। मुमकिन है उनकी यह तमाम काबलियत ही फिलहाल संकट का सबब बनी है।

मेहता अपने कई लेखों और राजनीतिक टिप्पणियों में मौजूदा मोदी सरकार के कामकाज, नीतियों और तौर तरीकों की तीखी आलोचना करते रहे हैं। हाल में भी वे विवादित कृषि कानूनों के बरक्स सरकार की आलोचना करते रहे हैं। अपने साक्षात्कार में वे मोदी सरकार को फासीवादी बता चुके हैं। वे मोदी सरकार को 1975-77 की इंदिरा गांधी सरकार से भी ज्यादा धूर्त बता चुके हैं। हाल ही में उन्होंने हरियाणा की भाजपा और जेजेपी गठबंधन सरकार की नई आरक्षण नीति की आलोचना करते हुए इसे संवैधानिक रूप से गलत और राजनीतिक स्वार्थ करार दिया था। बताया जा रहा है कि हाल ही में अशोका यूनिवर्सिटी के संस्थापकों ने मेहता से मुलाकात की थी। मुलाकात में संस्थापकों ने मेहता से कहा था कि यूनिवर्सिटी उनके बौद्धिक हस्तक्षेप की अब और रक्षा नहीं कर सकती। इस मुलाकात के बाद ही मेहता ने वाइस चांसलर मालाबिका सरकार को अपना इस्तीफा भेज दिया था। इसमें उन्होंने लिखा था कि मेरा सार्वजनिक लेखन सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान से जुड़े संवैधानिक मूल्यों के लिए समर्पित राजनीति का समर्थन करता है, जिसे यूनिवर्सिटी के लिए खतरा पैदा करने वाला माना गया है। ये साफ है कि मेरे लिए अशोका यूनिवर्सिटी छोड़ने का समय आ गया है। एक उदार विश्वविद्यालय को आगे बढ़ने के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से उदार परिस्थितियों की जरूरत होगी। मैं उम्मीद करता हूं कि यूनिवर्सिटी उस माहौल को बचाए रखने में एक भूमिका निभाएगी।

इस बीच, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबाई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी बात रखी है। उन्होंने लिंक्डइन पर 3 पेज का लेटर लिखा। इस लेटर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें लिखीं, जो चारों ओर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वे लिखते हैं कि सच्चाई यह है कि प्रोफेसर मेहता किसी संस्थान के लिए कांटा थे। वह कोई साधारण कांटा नहीं हैं, बल्कि वह सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए अपनी जबरदस्त दलीलों से कांटा बने हुए थे। राजन लिखते हैं कि मुझे नहीं पता कि अशोका यूनिवर्सिटी के फाउंडर्स की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्हें हाथ खींचने पड़े। प्रोफेसर मेहता हमेशा सरकार में बैठे लोगों और विपक्ष दोनों को लेकर बराबर ही क्रिटिकल रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि वे आगे भी लिबरल भारत के इंटेलेक्चुअल लीडर बने रहेंगे। रघुराम राजन ठीक कह रहे है। अपन भी मेहता को लगातार पढ़ते रहे हैं। मनमोहन सरकार की भी वे लगातार तीखी आलोचना करते थे। वे मुल्क के उन बुद्धिजीवियों में शामिल रहे हैं, जो नरेन्द्र मोदी को लेकर बेहद आशान्वित थे। मगर गुजरते समय के साथ वे मोदी सरकार की नीतियों के प्रमुख आलोचकों में शामिल हो चुके हैं। लिहाजा, मोदी सरकार के नुमाइंदों को यह सोचने की जरूरत है कि मेहता सरीखे बुद्धिजीवी अगर आज उनके आलोचक है तो आखिर क्यों?
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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