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इंडिया गेट

चुनाव में भाजपा की कवायद

Wednesday, March 03, 2021 11:05 AM
फाइल फोटो।

तो पांच सूबों के विधानसभा चुनावों का ऐलान पिछले सप्ताह हुआ। मगर केन्द्र की सत्तारुढ़ भाजपा ने पूरी आक्रामकता के साथ इसकी तैयारी बहुत पहले से ही कर ली थी। जिन सूबों में उसका सीधा शै है, वहां भी और जहां नहीं है वहां भी। दक्षिण के सूबे तमिलनाडु और पुड्डुचेरी की सियासत में भाजपा का कोई खास दखल नहीं है। मगर इन सूबों में भी भाजपा की आक्रामकता चरम पर है। जहां एक ओर सियासी जोड़तोड़ का सिलसिला जारी है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने धड़ाधड़ तमाम परियोजनाओं का ऐलान किया है। पिछले दिनों केन्द्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में भी भयानक सियासी उठापटक का दौर चला। भाजपा ने दलबदल के खेल को अंजाम देते हुए कांग्रेस के कुछ विधायकों का इस्तीफा करवा दिया, नतीजतन कांग्रेस की वी. नारायण सामी सरकार गिर गई। इससे पहले सूबे के उपराज्यपाल किरण बेदी को अपने पद से अचानक हटा दिया गया और उनकी जगह तेलंगाना की राज्यपाल और तमिलनाडु की भाजपा नेता तमिलिसाई सुन्दरराजन को सूबे का उपराज्यपाल बना दिया है। किरण बेदी को हटाने से पहले उनसे बात तक नहीं की गई। उनसे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मांगा गया। किरण बेदी और नारायण सामी की खींचतान जगजाहिर थी। बेदी को हटाकर सुन्दरराजन को सूबे का पदभार दिए जाने का मकसद समझा जा सकता है।  

दोनों ही सूबों में तमिलनाडु की सत्ताधारी एआईएडीएमके के साथ भाजपा का गठबंधन है। एआईएडीएमके भाजपा की मदद से तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में जुटी है। पड़ोसी सूबे केरल की सियासत में भी फिलहाल भाजपा की कोई हिस्सेदारी नहीं है। मगर पिछले दिनों मेट्रो मैन के नाम से प्रसिद्ध ई. श्रीधरन को पार्टी में शामिल कर भाजपा ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। अब 89 साल के श्रीधरन केरल की सियासत में भाजपा की हिस्सेदारी को कितना बढ़ा पाएंगे, यह तो देखने वाली बात है। मगर भाजपा की महत्वाकांक्षा काबिलेगौर है। प्रधानमंत्री दोनों ही सूबों में तमाम विकास परियोजनायों का ऐलान कर आए हैं, वहीं उनकी पार्टी भाजपा इस कवायद को ‘देशभक्त और देशद्रोहियों’ के बीच लड़ाई के रूप में परिभाषित करने में जुटी है। पूर्वी सूबे पश्चिम बंगाल में भी भाजपा ऐसी ही कवायदों में काफी पहले से लगी है। पिछले लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद भाजपा की महत्वाकांक्षा चरम पर है। वह साबित करने में जुटी है कि सत्ताधारी तृणमूल के मुकाबले प्रमुख विपक्ष भाजपा ही है। संख्याबल के लिहाज से बंगाल विधानसभा में यों तो वाम दलों और कांग्रेस के मुकाबले भाजपा की कोई हैसियत नहीं है। मगर तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को तोड़कर पार्टी खुद को प्रमुख विपक्षी दल साबित करने पर आमादा है।

पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह सूबे के सियासी घटनाक्रमों पर खास नजर रख रहे हैं। सूबे में उनकी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां आयोजित की जा रही हैं। मगर पिछली एक रैली ने भाजपा के रणनीतिकारों को चिंतित कर डाला है। कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में रविवार को हुई रैली ने सूबे की सियासत में अब तक गढ़ी गई सियासी धारणाओं को संदिग्ध साबित कर दिया है। ब्रिगेड मैदान की रैली फिलहाल राजनीतिक विश्लेषकों के बीच जेरबहस है। रैली में जमा जनसमूह ने न केवल बंगाल, अलबत्ता बाकी के चार चुनावी सूबों के बरक्स योजनाबद्ध तरीके से तैयार किए गए एकतरफा नैरेटिव को भी बदल दिया है। ब्रिगेड मैदान जो बंगाल में केवल मैदान के नाम से जाना जाता है, मुल्क का सबसे बड़ा सभा स्थल है। जिसकी क्षमता तकरीबन 10 लाख की बताई जाती है। जानकारों के मुताबिक अब तक यह जब भी भरा है तब केवल सीपीएम या उसकी अगुआई वाले वाम मोर्चे ने ही ने भरा है। रविवार की रैली में यह न केवल पूरा भरा था बल्कि मैदान के बाहर भी बड़ी तादाद में लोग जमा थे। यह रैली यों तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बेहद चिंता का सबब है। मगर उनसे अधिक चिंतित भाजपा के रणनीतिकार है। क्योंकि सूबे में भाजपा को जहां नेता टीएमसी से उठाकर लाने पड़ रहे हैं, वहीं वह मतदाता वामपंथ से जुटा रही है।

भाजपा की इस रणनीति के बरक्स ब्रिगेड मैदान की रैली गंभीर चुनौती पैदा करने वाली है। साम, दाम, दंड और भेद के आधार पर भाजपा तृणमूल के नेताओं को तो अपने खेमे में शामिल कर लेगी। मगर मतदाताओं की लामबंदी आखिर कैसी होगी? दूसरी ओर, भाजपा के मुकाबले वाम-कांग्रेस मोर्चे की मजबूती ममता बनर्जी के लिए फायदेमंद है, मगर एक सीमा तक ही। बहरहाल, ब्रिगेड मैदान की रैली ने भाजपा और तृणमूल दोनों के लिए परेशानी का सबब बना है। वैसे, पांचों चुनावी सूबों में भाजपा की सबसे बेहतर स्थिति असम में ही नजर आती है। हालांकि सीएए और एनआरसी जैसे फैसलों की वजह से भाजपा को नुकसान हुआ है। मगर सत्ताधारी दल के मुकाबले विपक्ष को निर्णायक बढ़त नहीं मिल पाई है। वहां कांग्रेस की अगुवाई में 6 दलों ने विपक्षी महागठबंधन तैयार किया गया है। फिलहाल गठबंधन में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी शामिल हो गए। चुनाव से ठीक पहले बीपीएफ का साथ छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है। मगर जानकारों के मुताबिक सूबे में भाजपा को सियासी बढ़त अब भी हासिल है।
-शिवेश गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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