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इंडिया गेट

ईवीएम पर फिर बवाल

Tuesday, February 11, 2020 11:45 AM
संजय सिंह (फाइल फोटो)

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा जब मतदान होने और नतीजे आने के बीच के समय में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की गड़बड़ी को लेकर बहस तेज हो गई हो। दिल्ली में शनिवार को विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के बाद से यही एक बार फिर से ईवीएम में गड़बड़ी का सवाल जेरेबहस है। आम आदमी पार्टी (आप) ने दावा किया है कि कुछ अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को अनधिकृत रूप से ले जाने की कोशिश की है। संजय सिंह ने अपने फोन पर एक वीडियो भी दिखाया, जिसमें एक चुनाव अधिकारी डीटीसी की बस में हाथ में ईवीएम लिए दिखाई दे रहा है। सिंह ने आगे कहा कि यह बदरपुर के शांति निकेतन का वीडियो है। यहां लोगों ने अधिकारी को ईवीएम के साथ पकड़ा है। इसी तरह की जानकारी पूर्वी दिल्ली के शाहदरा और विश्वास नगर से मिली है। ईवीएम सील करके सीधे स्ट्रांग रूम में भेजी जाती हैं, फिर अधिकारियों को वे ईवीएम कैसे मिलीं। सांसद के मुताबिक इसके बारे में चुनाव आयोग को सूचित किया जाएगा। उनके मुताबिक आगे ईवीएम में छेड़छाड़ न हो सके, इसके लिए पार्टी के एमएलए और कार्यकर्ता स्ट्रांग रूम के बाहर मौजूद रहेंगे। वैसे देखा जाए तो ईवीएम पर संदेह के बरक्स जारी बहस को तेज करने में चुनाव आयोग ने भी भूमिका निभाई है।

आयोग को मतदान का फीसद बताने में 24 घंटे से अधिक का समय लग गया। आयोग की इस हिलाहवाली की वजह से ईवीएम पर संदेह की गुंजाइश को और बल मिला है। आम आदमी पार्टी ने आयोग की हिलाहवाली को भी ईवीएम की गड़बड़ी से जोड़ा है। हालांकि दिल्ली के मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसी किसी भी संभावना से इनकार किया है। दिल्ली में तकरीबन 24 घंटे के बाद आए आंकड़े में मतदान का फीसद 62.59 बताया गया है। बताया जाता है कि भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं ने मतदान के कुछ समय के बाद ही यह आंकड़े बता दिए थे। तो फिर आखिर चुनाव आयोग को यह आंकड़ा मुल्क को बतलाने में 24 घंटे का समय आखिर क्यों लग गया। यह सवाल उठना लाजमी भी है क्योंकि शनिवार को मतदान के दौरान हर दो घंटे पर आयोग की ओर से मतदान का फीसद बताया जाता रहा। यहां तक कि शाम पांच बजे तक चुनाव आयोग की ओर से करीब 57 फीसद मतदान होने की बात कही गई थी। ऐसे में अंतिम के चंद घंटों का मतदान जोड़ने में 24 घंटे लगने का आखिर क्या लॉजिक हो सकता है। वजह जो भी हो पर चुनाव आयोग की यह हिलाहवाली ईवीएम पर जारी संदेह की गुंजाइश को और हवा दे गई है। सवाल केवल 8 तारीख के मतदान के बाद आम आदमी पार्टी की ओर से ईवीएम पर संदेह किए जाने भर का नहीं है। यह भारत की चुनाव प्रक्रिया का तकरीबन स्थाई भाव बन चुका है कि हर चुनाव के बाद ईवीएम की वैधानिकता पर सवाल खड़े किए जाएं। खासतौर से हारने वाली पार्टी कभी खुलकर तो कभी दबे छुपे लहजे में ईवीएम में गड़बड़ी की बात करती है। ईवीएम में गडबड़ी से जुड़ी सियासत का दिलचस्प पहलू यह है कि सत्ताधारी भाजपा भी विपक्ष में रहते हुए यह काम कर चुकी है। तमाम खबरिया चैनलों पर ईवीएम के सवाल पर सरकार और आयोग का जमकर बचाव करने वाले भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव यह भूल चुके हैं कि उनने कभी ईवीएम में गड़बड़ी के सवाल पर एक विद्वतापूर्ण किताब भी लिख चुके हैं, जिसकी प्रस्तावना भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवानी ने लिखी है। ‘डेमोक्रैसी एट रिस्क: कैव वी ट्रस्ट आॅवर इलेक्ट्रॉनिक मशीन’ नाम से लिखी गई इस किताब का लब्बोलुआब यह है कि ईवीएम के चुनाव करना लोकतंत्र के लिए किस कदर खतरनाक है। किताब में ईवीएम प्रणाली के विशेषज्ञ और स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड डिल ने बताया है कि ईवीएम का उपयोग पूरी तरह से सुरक्षित तो बिल्कुल भी नहीं है।

मुमकिन है अपनी मौजूदा सियासत की वजह से जीवीएल अपनी ही इस किताब के पन्नों को पटलने में बिल्कुल ही दिलचस्पी नहीं रखते हों, लेकिन उनकी किताब की यह बात पूरी तरह सही है कि ईवीएम पर संदेह की यह गुंजाइश भारत के लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। हैरानी का सबब यह है कि यह संदेह की गुंजाइश उस सरकार के समय पैदा हो रहा है जो खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भक्त साबित करने का कोई मौका जाया नहीं होने देती। भगवान राम ने तो एक धोबी की ओर से उनकी पत्नी सीता जी के पवित्रता पर संदेह किए जाने के बाद उन्हें घर से निकाल दिया था। और बाद में उन्हें अग्नि परीक्षा तक देनी पड़ी। पर आज आलम यह है कि मुल्क का शासक चुनने की प्रक्रिया या कह लें चुनाव की मशीन की पवित्रता ही लगातार संदेह के घेरे में है और मुल्क की राम भक्त सरकार उस संदेह को दूर करने के बजाए विरोधियों का ही मजाक उड़ा रही है। कायदे से देखा जाए तो ईवीएम पर संदेह के बजाए यह प्रवृति लोकतंत्र के लिए कहीं अधिक खतरनाक है। लिहाजा दिगी चुनाव के नतीजे जो भी हो, लेकिन ईवीएम को लेकर पैदा हुए संदेह को जितनी जल्दी दूर कर ली जाए, मुल्क के लोकतंत्र के लिए उतना ही बेहतर होगा।    

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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