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‘टाइम’ के इस कवर पेज के मायने

Saturday, May 11, 2019 09:30 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ के कवर पेज फोटो।

- शिवेश गर्ग
चुनावी माहौल में आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक तमाम कोशिशों के बाद भी उनकी सरकार की पांच साल की उपलब्धियों को गिना नहीं पाते, तो देसी मुद्दों को छोड़कर विदेश पर चले जाते हैं। और दलील आती है कि उनने और कुछ किया हो या नहीं किया हो, पिछले पांच साल में उनने विदेशों में भारत का नाम रौशन किया है। मुमकिन है जानी-मानी अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ के कवर पेज को देखकर अब उनकी यह दलील भी कमजोर पड़ जाए।

इस अमेरिकी पत्रिका ने अपने कवर पेज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ (भारत को बांटने वाला प्रमुख) बताया है। पत्रिका ने अपनी कवर स्टोरी के तहत यह हेडिंग दी है। कवर पेज पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर भी देखी जा सकती है। ‘टाइम’ ने अपने 20 मई के प्रिंट एडिशन के लिए यह कवर पेज तैयार किया है, फिलहाल यह स्टोरी उसकी वेबसाइट पर देखी जा सकती है। इसकी हेडिंग है, ‘क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार को पांच साल और झेल सकता है?’ इसमें मोदी पर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर विफल रहने और सांप्रदायिक माहौल खराब करने के आरोप लगाए गए हैं।

स्टोरी में लिखा है, ‘मोदी सरकार (के कार्यकाल) में उदारवादियों और निचली जातियों से लेकर मुसलमानों और ईसाइयों तक पर हमले हुए हैं... मोदी न सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर विफल रहे, बल्कि उन्होंने भारत में विषैला धार्मिक राष्ट्रवादी माहौल बनाने में मदद भी की। बताने की दरकार नहीं कि यह वही ’टाइम’ मैगजीन है जिसने चार साल पहले 2015 में भी नरेन्द्र मोदी को अपने कवर पेज पर जगह दी थी। तब लिखा था कि नरेन्द्र मोदी का मतलब व्यापार। तब के कवर पेज पर प्रधानमंत्री का एक प्रफुल्लित चेहरा लगया गया था। आने वाले ताजा कवर पेज पर उनका मुरझाया और मलीन चेहरा दिख रहा है।

तब प्रधानमंत्री के समर्थक यह बताते नहीं अघाते थे कि उनने किस कदर विदेशों में अपने नाम का डंका बजाया है। बहरहाल, जो लोग अमेरिकी की सियासत और टाइम मैगजीन की बाजीगरी को समझते हैं वे तब भी उस कवर पेज से उत्साहित न थे और न वे आज के कवर पेज को ही भारत और भारत के प्रधानमंत्री के लिहाज से एक झटका मानते हैं। क्योंकि अमेरिका अपने हितों के मुताबिक टाइम के कवर पेज का इस्तेमाल करता रहा है

मुमकिन हो पांच साल पहले उसे लगा हो कि तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तुलना में नरेन्द्र मोदी कहीं उसके हितों के लिहाज से अधिक मुफीद हो सकते हैं। क्योंकि  2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी मोदी ‘टाइम’ के कवर पेज पर आ चुके हैं। यानी अमेरिका ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ही नरेन्द्र मोदी के नाम पर दांव लगाना शुरू कर दिया था। बहरहाल, यह तो अलग अध्ययन के विषय है कि वह कौन ही वजहें हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में अमेरिकी मोहभंग का कारण बना है। जहां तक अपन समझ पाए हैं

वजह नरेन्द्र मोदी की विफलता से कहीं अधिक उनके शासन काल में अमेरिकी हित का पूरी तरह न सध पाना होगा। और वह हित सीधे तौर पर व्यापार से जुड़ा होगा। वैसे यह वक्ती हकीकत भी है कि मुल्क की अर्थव्यवस्था बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है जो अमेरिकी हितों के लिहाज से कतई मुफीद नहीं मानी जा सकती। हालांकि जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार ने अपने शासन के दौरान नोटबंदी और जीएसटी जैसे जो फैसले लिए वे अमेरिकी हितों को ही ध्यान में रख कर लिए गए थे। मोदी सरकार के दोनों ही फैसले भारत के असंगठित क्षेत्र पर बड़ा हमला था।

अमेरिका की नजर हमेशा से ही भारत के बाजार पर रही है। वह हर लिहाज से भारत के बाजार का दोहन करना चाहता है। इस लिहाज से भारत का असंगठित क्षेत्र उसकी राह का एक बड़ा रोड़ा है। लिहाजा, उसकी हमेशा से भारत में कोशिश असंगठित क्षेत्र के दायरे को कम करना और संगठित क्षेत्र को बढ़ाना है। यानी संगठित क्षेत्र जितना मजबूत होगा, अमेरिकी हित उतने ही सध सकेंगे। जानकारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी ने पांच साल के शासनकाल में नोटबंदी और जीएसटी जैसे महत्वाकांक्षी फैसले लिए उनका मकसद अमेरिका के बाजारी हित को साधना भी था।

क्योंकि इन दोनों फैसलों को भारत के असंगठित क्षेत्र पर एक बड़े हमले के रुप में देखा गया। नोटबंदी ने जहां छोटे मझोले किस्म के व्यापार को चौपट किया। वहीं, जीएसटी ने व्यापार के रोजमर्रा की तकलीफों और दुश्वारियों को ही बढ़ाया। इन दोनों फैसलों का खामियाजा अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है। मुल्क की अर्थव्यवस्था आज मंदी के कगार पर खड़ी है। मुमकिन है इन दोनों फैसलों के बरक्स क्रियान्वयन की नाकामियां नरेन्द्र मोदी में अमेरिकी मोहभंग की वजह बनी हो। बहरहाल, वजह जो भी हो।

पर आज चुनावी मौसम में टाइम मैगजीन के इस कवर पेज से मोदी समर्थकों के हाथ से वे चंद दलीलें भी छिटकती नजर आ रह हैं। जिनमें नरेन्द्र मोदी की तमाम नाकामियों के बावजूद विदेशों में खुद का और मुल्क का नाम नाम रौशन करने की दलीलें दी जाती रही हैं।
 

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