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ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, September 30, 2019 10:05 AM
राजकाज में क्या है खास?

बुरे फंसे राज के रत्न
राज ने अपने नुमाइन्दों को इधर-उधर करने का रास्ता क्या खोला, कइयों के गले में हड्डी फंस गई। वो न तो इसे निगल पा रहे और न ही उगल पा रहे। बेचारे सोच-सोच कर दुबले होते जा रहे हैं। और तो और अपना दुख किसी को बता भी नहीं पा रहे। आठ महीने तक तक बदलियां खोलने का राग अलापते रहे और जब खुली तो रातों की नींद और दिन का चैन काफूर हो गया। सबसे ज्यादा नींद माडसाहबों की आड़ में उड़ी हुई। पीसीसी में चर्चा है कि चुनावी दंगल के दौरान सबको धर्म भाई बना कर सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचे भाई लोगों के सामने संकट यह है कि केवल 25 की लिस्ट में किसको भैय्या को शामिल किया जाए। अब बेचारे डिजायर तो हर आने वालों की करने में कोई कंजूसी नहीं कर रहे, मगर सीडी में उनके नाम का अक्षर तक शामिल नहीं कर पा रहे हैं। अब जिनका नाम सीडी वाली सूची में नहीं होगा, वो धर्म भाई तो रिश्ता तोड़ने में देर तक नहीं लगाएंगे।

असर बुध का
कभी-कभी शनि के साथ बुध भी अपना खास असर दिखाता है। उसके असर की लपेट में आने वालों को गुरु और मंगल भी नहीं बचा सकते। कुछ ऐसा ही बुध का असर इन दिनों सूबे के खाकी वालों में कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है। असर को कम करने के लिए खाकी वालों ने हवन में आहूतियां देने के साथ ही गायत्री मंत्र का जाप भी कर लिया, लेकिन कोई पार नहीं पड़ी। और तो और भविष्य में बुध से कुर्सी नहीं संभालने की भी कसमें खा ली। अब देखो ना जुलाई से शुरू हुआ बुध का असर 54 दिन बाद भी कम नहीं हुआ। अब सलाहकारों ने मुंह खोला है कि बुध का असर कम करने के लिए गयाजी में पिण्ड दान के साथ बुध ईट की पूजा के सिवाय कोई चारा ही नहीं है।

चर्चा डीप इनसाइड की
सूबे में इन दिनों डीप इनसाइडर की चर्चा जोरों पर है। इससे सरदार पटेल मार्ग पर बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ ही इंदिरा गांधी भवन में पीसीसी चीफ का दफ्तर भी अछूता नहीं है। राज का काज करने वाले भी लंच टाइम में डीप इनसाइडर को लेकर खुसरफुसर करते हैं। डीप इनसाइड जोधपुर वाले भाईसाहब से ताल्लुकात रखता है। भाई साहब ने सरकार के एक प्रोग्राम के जरिए जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की तो सामने वालों ने मीन मेख निकालने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। और तो और राज का काज करने वालों ने भी कई बहानों की आड़ ली। लेकिन शेखावाटी के बाद मेवाड़ और हाड़ौती में जो ग्राउण्ड रियलिटी पता चली तो राज करने वाले भी चकरा गए। एसी कमरों में कागजी आंकड़े बना कर राज के सामने पेश करने वालों के चेहरे भी शर्म से झुक गए। अब ब्यूरोक्रेट्स को कौन समझाए कि अशोकजी ने ग्राउण्ड रियलिटी जानने की ठान ही ली, तो कागजी घोड़े दौड़ाने से कोई फायदा नहीं है।

एक जुमला यह भी
इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ के ठिकाने पर इन दिनों एक जुमला हर आने वालों की जुबान पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि शुगर लेवल से जुड़ा है। जुमला है कि मंत्री बनने की आस में एक दर्जन से भी ज्यादा भाई साहबों का शुगर लेवल बढ़ता ही जा रहा है। अब तो डॉक्टरों के पास जाने से भी शरमाने लगे हैं। आठ महीनों से कई बार अग्नि परीक्षा के दौर से गुजर चुके इन भाइयों की सेहत का पाया उस वक्त बिगड़ जाता है, जब मजे लेने वाले उनको नंवबर में शहरों की सरकार के चुनावों की याद दिला देते हैं।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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