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ओपिनियन

ह्यूस्टन महारैली और राजनीति

Friday, September 27, 2019 10:10 AM
हाउडी मोदी कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएं हमेशा चर्चा में रही हैं। खासतौर पर राजनेताओं से उनका गले मिलना और विदेशों में बसे भारतीयों से उनका संवाद। पहले भी वे जब-जब विदेशों में भारतीय मूल के लोगों से मिले हैं, उसे भारत में नागरिकों द्वारा बड़े कौतुहल और प्रशंसा की दृष्टि से देखा गया है। लेकिन इस बार अमेरिका-यात्रा के दौरान ह्यूस्टन में हुआ भव्य आयोजन विशेष रूप से चर्चा में है। चर्चा सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह विदेश में बसे भारतीयों का अब तक का सबसे बड़ा जमावड़ा था, बल्कि इसलिए भी कि यह पहली बार है जब अमेरिका के ताकतवर राष्ट्रपति ने किसी विदेशी नेता के साथ इस तरह मंच साझा किया।

निश्चित रूप से ह्यूस्टन की यह विशाल रैली, जिसमें पचास हजार से अधिक लोग एकत्र हुए थे, भारतीय विदेश- नीति की एक ‘सफलता’ के रूप में बखानी जाएगी। इस तरह के आयोजनों में जो कहा जाता है वह महत्वपूर्ण तो होता है पर माहौल और संबंधित नेताओं के हाव-भाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं होते। इस आयोजन के श्रोताओं ने जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी का अभिनंदन किया और जिस तरह राष्ट्रपति ट्रंप को अपने कहे-किए का प्रतिसाद मिला, ये दोनों ही आयोजन की सफलता का दावा करने का एक आधार बनेंगे। लेकिन, यह भव्य आयोजन अमेरिका में बसे चालीस लाख से अधिक भारतीयों के लिए ही नहीं था। ऐसे आयोजनों का उद्देश्य स्वदेश की जनता को भी ध्यान में रखकर किया जाता है। हमारे प्रधानमंत्री अच्छी तरह जानते हैं कि इन आयोजनों पर भारत की जनता की भी निगाह होती है। जिस तरह देश में ह्यूस्टन वाली इस रैली को लेकर चर्चा हो रही है और इसे एक शानदार सफलता बताया जा रहा है, वह किसी भी राजनेता के लिए संतोष का विषय होना चाहिए।

प्रधानमंत्री की इस विदेश यात्रा का सम्यक आंकलन तो पूरी यात्रा के परिणामों पर ही आधारित होगा, पर कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर आज भी चर्चा की जा सकती है। प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन के अपने प्रभावशाली भाषण के दौरान एक बात को भारत की कई भाषाओं में रेखांकित किया था- उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीयों को हिंदी, गुजराती, बांग्ला, कन्नड़ आदि कई भाषाओं में यह आश्वासन देना जरूरी समझा कि भारत में सब ठीक है। यह बात उन्होंने भारत की विविधता में एकता के संदर्भ में कही थी। और साथ ही साथ यह भी बताना जरूरी समझा था कि उनकी सरकार देश की जनता की जरूरतों के प्रति पूरी तरह सावधान है। लेकिन सब ठीक है। एक जुमला मात्र बनकर न रहे जाए। इसलिए जरूरी है कि देश में जो कुछ हो रहा है, उसे भी पूरे संदर्भों में देखा-समझा जाए। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा दूसरी बार चुनाव में शानदार सफलता पाकर सत्ता में आई है और सत्ता में आने के बाद बड़ी तेजी से एक साथ कई मोर्चों पर सरकार सक्रिय हो गई है। संसद के भीतर और संसद के बाहर, दोनों जगह, सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, इनमें से जिस बात की चर्चा प्रधानमंत्री ने अपनी ह्यूस्टन की रैली में विशेष रूप से की थी-वह थी जम्मू- कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने की कार्रवाई।

जहां तक संविधान की इस व्यवस्था को निरस्त करने का सवाल है। देश में कुल मिलाकर इसका स्वागत ही हुआ है। हां, इस काम को करने के तरीके पर सवाल जरूर उठे हैं, और इस बारे में सरकार के दावों पर भी संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ने अपने रैली में सब ठीक है। कहा तो यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या कश्मीर में भी सब ठीक है? गृह मंत्री ने दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति तेजी से सामान्य होती जा रही है। तो फिर जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी बड़े नेता और बड़ी संख्या में वहां के नागरिक भी जेलों में बंद क्यों हैं या नजरबंद क्यों हैं? स्कूलों में बच्चे क्यों नहीं जा पा रहे? मीडिया स्वयं को बंधा हुआ क्यों महसूस कर रहा है? वैसे तो प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के संदर्भ में ऐसे सवाल नहीं उठने चाहिए, पर चूंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिर से मध्यस्थता करने की बात कहीं है, इसलिए ऐसी बातें सामने आना स्वाभाविक है। सामने यह बात भी आएगी कि यदि देश में सब ठीक है तो बेरोजगारी कम क्यों नहीं हो रही? महंगाई क्यों बढ़ रही है? बलात्कार और लिंचिंग की घटनाएं क्यों घट रही है? अर्थ व्यवस्था क्यों चरमराती लग रही है?

जहां तक भारत-अमेरिका के रिश्तों का सवाल है, प्रधानमंत्री की इस यात्रा का सकारात्मक परिणाम निकलने की आशा की जानी चाहिए। यूं तो हर देश अपने हितों को देखते हुए ही अपनी विदेश नीति को बनाता है, फिर भी दूरगामी परिणामों के मद्देनजर कुछ ऐसे फौरी कदम भी उठा लिए जाते हैं जो देश विशेष के पक्ष में जाते दिखाई दें। इसलिए, प्रधानमंत्री की इस अमेरिका- यात्रा में भारत-अमेरिकी संबंधों के मजबूत होने की आशा की जा सकती है। यहीं इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि हमारा भारत अमेरिका के लिए बहुत बड़ा बाजार है। अमेरिका इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। इसलिए, राष्ट्रपति ट्रंप यदि अपने हाव-भाव में भारत को अच्छा लगने वाला कुछ अप्रत्याशित करते हैं तो इसे सामान्य बात ही माना जाना चाहिए। यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात की सावधानी बरती है कि दोनों देशों के बीच व्यवहार धरातल पर दिखाई दे। हाउदी मोदी ने नाम से आयोजित ह्यूस्टन का यह भव्य आयोजन दोनों देशों की आंतरिक राजनीति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
विश्वनाथ सचदेव (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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