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ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, September 23, 2019 10:20 AM
राजकाज।

डैमेज कंट्रोल
पॉलिटिकल पार्टियां अपने-अपने हिसाब से डैमेज कंट्रोल के रास्ते निकालती हैं। इस मामले में भगवा वाले अमित शाह का तो कोई सानी नहीं, लेकिन सूबे में जो रास्ता हाथ वाले दल ने निकाला है, उससे राज करने वाले भी चकित हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस बार भी हाथी वाले भाइयों ने हाथी की सवारी छोड़ कर पंजे को क्यों पकड़ लिया। अब राज करने वालों को कौन समझाए कि राजनीति में सबकुछ जायज होता है। मिनेश वंशज किरोड़ी भाईसाहब ने भी सवा पांच साल पहले अपना अच्छा करने की ठानी थी तो अब मायावती के चेले उनसे भी एक कदम आगे निकल गए। आखिर डैमेज कंट्रोल के लिए हाथ से हाथ जो मिला लिया।

भाईसाहबों की बाछें खिली
भगवा पार्टी की कमान पूनिया जी को सौंपे जाने से भाई साहबों के चेहरे खिले हुए हैं। आचार और विचार में परिवर्तन करने के साथ अब पूरी तरह सामाजिक हो गए हैं। आखिर फिर से सत्ता की दौड़ को जीतना है। कई भाईसाहबों ने तो अपने क्षेत्र और चहेतों से मेल- मिलाप भी बढ़ा लिया है। राष्ट्रीय स्तर पर नेता बनने की रेस में शामिल और विश्वव्यापी मंदी पर दो दिन पहले राजधानी में बोलने वाले भाई साहब की बाछें खिलने का राज भी यही है।   
 
अब तो राम को बख्शो
भगवा पार्टी से राम भी काफी परेशानी में हो गए होंगे। सत्ताइस साल हो गए, मन में आए जब ही राम नाम की रट लगाने लग जाती है। लगता है कि भाईसाहबों का राम बिना पेट नहीं भरता। उनको कौन कहे कि अब तो राम को बख्शो। अब देखो ना नमोजी और अमित जी ने फिर राम की रट लगानी शुरू कर दी। सोमनाथ मंदिर में जाते ही राम का भूत सवार हो गया। पिछले छह माह से आर्थिक संकट के दौर में गुजर रहे हमारे सूबे के भगवा वाले भैयाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि राम की आरती सुबह उतारी जाए अथवा शाम को।

अब खयाल आया कि
कहावत है कि सांप निकलने के बाद लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन हमारे पूर्व विधायकों को इस पर कतई विश्वास नहीं है। पांच साल तक सत्ता का सुख भोगते समय तो सूबे की प्रगति के बारे में सोचने का वक्त नहीं मिला। अब प्रगति के बारे में गहन चिन्तन मंथन हो रहा है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। एक मंच पर आकर जोरदार चिन्ता जता रहे हैं। चिन्तन के लिए अधिवेशन तक बुला रहे हैं। उसका भी बढ़-चढ़कर ढिंढ़ोरा पीटा जा रहा है। राज का काज करने वाले भी कम नहीं हैं, वो भी चटकारे लेने से नहीं चूक रहे। बोल रहे हैं कि  रही-सही कसर और पूरी करने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है।

एक जुमला यह भी
हाड़ौती में गत दिनों बरसे पानी को लेकर पूरे देश के बुद्धिजीवियों की नींद उड़ी हुई है। सत्तर साल से चिंतन-मनन में डूबे नेतागणों के चेहरों पर भी चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही हैं। कानूनविद् भी सोच में डूबे हैं। मीडिया वालों की भी रातों की नींद और दिन का चैन ही गायब हो गया है। राज का काज करने वालों की जुबान सूख गई है। उनके पास किसी भी सवाल का जवाब नहीं है। हर बार डिजास्टर मैनेजमेंट को सुदृढ़ करने का ढ़िंढोरा फिर पीटा जा रहा है। कोई सा भी बड़ा हादसा हो जाए, ज्योतिष के ज्ञाताओं के बीच बहस छिड़े बिना नहीं रहती। इस घटना पर ज्योतिषी बढ़-चढ़कर बोल रहे हैं। उनका दावा है कि पिछले दिनों बदले मंगल के रास्ते ने हाड़ौती में अपना असर दिखा दिया।  हमने पहले ही कहा था कि मंगल का रास्ता बदलने से मेघों की गर्जन बढ़ने के साथ बादल भी अपना असर दिखाएंगे।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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