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ओपिनियन

इसरो, ये देश आपके साथ है

Tuesday, September 10, 2019 10:25 AM
इसरो चीफ को गले लगाते पीएम मोदी।

चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का चांद पर उतरते समय जमीनी स्टेशन से संपर्क टूट गया। जिसके बाद पीएम मोदी ने शनिवार को इसरो सेंटर से देश को संबोधित किया। पीएम ने वैज्ञानिकों से कहा, ‘हर मुश्किल’ हर संघर्ष, हर कठिनाई, हमें कुछ नया सिखाकर जाती है, कुछ नए आविष्कार, नई टेक्नोलॉजी के लिए प्रेरित करती है और इसी से हमारी आगे की सफलता तय होती हैं। विज्ञान में विफलता नहीं होती, केवल प्रयोग और प्रयास होते हैं। हमें सबक लेना है, सीखना है। कामयाबी हमारे साथ होगी हम निश्चित रूप से सफल होंगे। उन्होंने कहा कि आज पूरा देश इसरो के वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है। इसरो कभी न हार मानने वाली संस्था है। आज इसरो दुनिया के अग्रणी संस्थानों में से एक है। देश को आप पर गर्व है। पीएम मोदी ने इसरो चीफ के सिवन को उन्होंने गले लगा लिया। इस बीच सिवन रो पड़े, खुद पीएम भी भावुक हो गए। वाकई वह क्षण पूरे देश के लिए भावुकता का पल था।

चन्द्रयान-2 को इस साल 22 जुलाई को इसरो ने चन्द्रमा की दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए छोड़ा था। भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है जिसने चांद की सतह पर लैंडिंग करने के लिए मिशन शुरू किया है। यह पहला मौका है जब कोई यान पहली बार चंद्रमा के जटिल हिस्से में पहुंचने की कोशिश कर रहा था। चंद्रयान-2 को तीन हिस्सों में बांटा गया है। इसका पहला भाग ऑर्बिटर है जो इसे धरती की कक्षा से बाहर भेजता है। चांद की सतह पर इसे लैंड कराने हेतु विक्रम लैंडर तथा चांद की सतह पर चलने हेतु एक प्रज्ञान रोवर है। जिसका उद्देश्य वहां पानी की मौजूदगी, चट्टानों और मिट्टी की संरचना, आयन मंडल के संबंध में जानकारी जुटाना था। हालांकि इसरो को चांद के दक्षिण ध्रुव मिशन में पहले ही प्रयास में आंशिक सफलता हाथ लगी है जो बहुत बड़ी उपलब्धि है। अमेरिका और रूस जैसे विकसित देशों ने कुल मिलाकर 64 मिशन चांद पर भेजे, जिसमें 20 बार से ज्यादा असफलता हाथ लगी।

भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की प्राथमिकता हमेशा अंतरिक्ष विज्ञान का प्रयोग आम आदमी के जीवन में सुधार लाने की रही है। विक्रम साराभाई ने अपने एक चर्चित भाषण में कहा था, यह भारतीय वैज्ञानिकों के महत्वाकांक्षी नहीं होने या निराशावादी होने की निशानी नहीं है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में दबदबे के लिए जरूरी है कि कोई देश चांद या अंतरिक्ष के मानव मिशनों से अपनी योग्यता व क्षमता लगातार साबित करता रहे। पिछले कुछ सालों में इसरो ने तमाम कामयाबियों से अपनी क्षमता दुनिया के सामने रखी है। इससे पूरे अंतरिक्ष कारोबार के बाजार में खलबली मची हुई है। इसरो की कामयाबी की बात करे तो 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की स्थापना की गई। 1972 में अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग का गठन किया गया, जिसने अंतरिक्ष की शोध गतिविधियों को मजबूती प्रदान की। सत्तर के दशक में आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी और एपल जैसे प्रयोगात्मक उपग्रह कार्यक्रम चलाए गए। 1975 में  देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट लॉन्च किया।

2013 में इसरो ने भारतीय क्षेत्रीय नैविगेशन सैटेलाइट प्रणाली (आईआरएनएसएस) जो नाविक के नाम से भी जाना जाता है को प्रक्षेपित किया। इसके साथ ही भारत ने अमेरिका की तर्ज पर अपना जीपीएस सिस्टम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। 2014 में इसरो ने सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजा। मंगल मिशन से भारत और इसरो ने अपने नाम एक और रिकॉर्ड दर्ज किया। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी देश ने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक कदम रखा था। वर्ष 2017 में इसरो ने  एकल लांच में पीएसएलवी-सी37 के जरिए 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर विश्व रिकॉर्ड कायम किया। इसी वर्ष पीएसएलवी-सी 38 पर 31 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया। इसरो ने पीएसएलवी-सी 43 की मदद से कुल 31 सैटेलाइट प्रक्षेपित किए। जिसमें भारत का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट (हाइसिस) भी शामिल है। इसका उपयोग वायुमंडलीय गतिविधि और जलवायु परिवर्तन, कृषि, वानिकी, जल प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों का अध्ययन और खनिजों की तलाश से लेकर सैन्य निगरानी तक सभी तरह के कार्यों के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा वायु सेना की संचार प्रणाली को मजबूत बनाने हेतु जीसैट-7, पूरे भारत में तेज इंटरनेट की सुविधा हेतु जीसैट-11, संचार सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु जीएसएटी-6, उपग्रह आदि प्रक्षेपित किए गए। इसके अलावा एक सैन्य उपग्रह एमीसैट लॉन्च किया गया जिससे दुश्मन देश की छोटी से छोटी इलेक्ट्रॉनिक और मानवीय गतिविधियां भी इसकी नजरों से बच नहीं पाएगी। इसके अलावा पूर्णतया स्वदेशी रूप से विकसित क्रायोजनिक इंजन से देश का सबसे भारी वजन का उपग्रह जीसैट-19 को प्रक्षेपित किया गया।

हाल ही में दुश्मन देश की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल शक्ति का डीआरडीओ की सहायता से सफल प्रक्षेपण किया। जिसने विकसित देशों की नींद उड़ा दी है। इसके अलावा मछुआरों को मछलियों की अधिक संख्या वाले स्थानों के बारे में बताने हेतु इसरो ने एक एप डिजाइन किया है। इसरो अपने जीएसएलवी-3 लांचर की वजन उठाने की क्षमता पर भी काम कर रहा है, ताकि भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जा सके। इसके अतिरिक्त इसरो ने वैज्ञानिक तौर पर कचरा ठहरा जाने वाले व मृत रॉकेट के पुन: उपयोग पर शोध शुरू किया है। भारत 2022 में अपने तीन यात्रियों को इसरो के बनाए ‘गगनयान’ से अंतरिक्ष में भेजेगा। इस अभियान का मकसद देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक नए स्तर पर ले जाना है। इससे अंतरिक्ष में शोध के नए रास्ते खुलेंगे। सबसे अहम बात है कि यह अभियान स्वदेशी होगा। इस तरह इसरो की उपलब्धियां अनगिनत है।   
नरेन्द्र जांगिड़ (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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