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ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, August 12, 2019 10:30 AM

जश्न वहां, आफत यहां

जे एण्ड के को लेकर पिछले मंडे को जश्न क्या मना, पिंकसिटी के सबसे चौड़े रास्ते में पेड़े वाले सेठजी के गले में आफत आ गई। सेठजी भी छोटे-मोटे नहीं, बल्कि आजादी से पहले की दुकान के मालिक हैं। बेचारे सेठजी को थोड़े ही पता था कि धारा 370 को हटाने की खुशी में संघ निष्ठ मोदी जी की ओर से मंगल को बांटे गए पेड़े उनके लिए आफत बन जाएंगे। राज का काज करने वाले बतियाते हैं कि किसी भी बड़े साहब को पेड़े खिलाने से पहले उनकी निष्ठा को सतौलने में ही फायदा है। अगर इस पर अमल होता तो पेड़े खिलाने वाले दामोदर जी की आड़ में आंच ताड़केश्वर जी के मंदिर तक कतई नहीं पहुंचती।


चर्चाएं पावरफुल होने की:
इंदिरा गांधी भवन में हाथ वाली पार्टी के दफ्तर में पॉवरफुल को लेकर इन दिनों कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। चर्चाएं भी बोर्ड और निगमों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों में पॉवरफुल को लेकर है। छोटे पायलट साहब जब भी दफ्तर में आते हैं, तो चर्चाएं जोर पकड़ लेती हैं। पिछले दिनों एयरपोर्ट पर एक लिफाफा हवा में लहराने के बाद तो चर्चाओं ने और भी जोर पकड़ लिया था। अब बिना सिर पैर की बातें बनाने वाले हाथ वाले भाइयों को कौन समझाए कि पॉवरफुल तो वो ही होता है, जो सरकार चलाता है।


कुण्ठा में हैं नए नेता:
पिछले दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत की जाजम पर प्रतिपक्ष में जो लुकाछिपी का खेल चला, वह कइयों के समझ के बाहर था। ना पक्ष के साथ ही हां पक्ष लॉबी में भी चर्चा रही कि प्रतिपक्ष खेमे में पीछे की लाइनों में बैठने वाले भाई लोग कुण्ठा से ही भरे रहे। वे फ्रन्ट लाइन के नेताओं की मर्जी के बिना जुबान तक नहीं खोल सके। एकबारगी तो हालात यहां तक बने कि उनमें वरिष्ठों के खिलाफ विद्रोह की भावना भी पैदा हुई। चर्चा है कि फ्रन्ट लाइन में बैठने वाले नेता कतई नहीं चाहते थे कि सदन में भ्रष्टाचार के मामले उठाए जाएं। उनको डर था कि कहीं वे पुराने प्रकरणें के फेर में नहीं आ जाएं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि प्रतिपक्ष की आगे दो पंक्तियों को उदयपुर और चूरू वाले वाले भाईसाहबों ने पूरी तरह कवर कर लिया था। तभी तो उन्हीं के व्यंग्य बाणों को आधार बना कर सामने वालों ने लपेट- लपेट कर मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


हौसलों की उड़ान का जोश थमा:
गुजरे जमाने में परों से नहीं हौसलों से उड़ान भरने वाली भगवा पार्टी के भाईसाहबों का जोश अब कुछ ठण्डा नजर आ रहा है। सदन में 73 का आंकड़ा रखने वाले भाइयों ने राज्यसभा चुनाव से दूरियां बना ली। मंगाए गए दो फॉर्म भी मुड़े के मुडेÞ रह गए। अब उनको कौन समझाए कि 39 साल पहले 1980 में जसवंतसिंह को राज्यसभा में भेजते समय भगवा वालों के पास केवल 32 और 1986 में दूसरी बार मात्र 38 का ही आंकड़ा था, लेकिन येनकेन प्रकारेण बाबोसा ने अपने हौसलों से लड़ाई को जीतकर दिखा दिया था।


एक जुमला यह भी
राज का काज करने वालों की जुबान पर आजकल दो नाम चढ़े हुए हैं। इनमें एक सबसे बड़े सरकारी साहब हैं, तो दूसरे वे अफसर हैं, जिन्होंने राज के खजाने की चाबी संभाल रखी है। दोनों की तारीफ करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। बड़े साहब किसी फाइल को अटकाने में कम ही विश्वास करते हैं। सरकार के खजाने का मामला इस बार उल्टा है। विभागों के सचिवों को खुद फोन कर फाइल लेकर आने की ताकीद करते हैं। खजाने वाले अफसर साहब की इस दरियादिली से राज-काज निपटाने वाले वे अफसर कायल हैं, जो पहले फाइलों के साथ पुराने वालों के यहां चक्कर लगाते थक चुके हैं।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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