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ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, July 29, 2019 18:25 PM

चर्चा में चंबल का पानी
इन दिनों सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में चंबल के पानी को लेकर चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों ना, चंबल के पानी पीने वालों ने अपना असर जो दिखा रखा है। नाथद्वारा से आने वाले सरपंच साहब भी समझ नहीं पा रहे कि आखिर इस बार चंबल के पानी में इतना उबाल क्यों है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि राज की नंबर एक और दो कुर्सियों के बीच जो चल रहा है, उसका सीधा असर नंबर चार की कुर्सी पर दिखाई दे रहा है। गुजरे जमाने में कुत्तों को गोली लेकर पंचायत में उधम मचाने वाले भाईसाहब इस बार कभी गाय, तो कभी नमोजी का नाम लेकर सामने वालों को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। अब उनको कौन समझाए कि चंबल का पानी भी एक उम्र तक ही असर करता है, पिचेहतरवें साल में शांति से बैठने में ही फायदा है।

दिल्ली से दिल्लगी
राज का काज करने वाले कई साहबों को अचानक दिल्ली से दिल्लगी हो गई। जबसे उनका दिल दिल्ली पर आया है, तब से दिन का चैन और रातों की नींद फुर्र हो गई। सूबे के दो दर्जन से ज्यादा बड़े साहबों को दिल्ली से प्रेम हो गया। वे दिल्ली के लिए हाथ पैर भी मारने के साथ जोड़ तोड़ भी बिठा रहे हैं, लेकिन राज की मंशा ठीक नहीं है। हमने भी पता लगाया तो माजरा समझ में आया कि कई बड़े साहब किसी न किसी बहाने अभी सूबे के राज से दूर और नमो मंडली से नजदीकियां बनाने के जुगाड़ में हैं। इसके लिए दिल्ली सबसे बढ़िया जगह है। अभी डेपुटेशन करा कर दिल्ली में बैठो और नमो मंडली से मेल मुलाकात करो। बाद में वापस आकर मनमाफिक कुर्सी के मजे लो।

कब मरेगी सासू...
इन दिनों हाथ वाले कई भाई लोग दुबले होते जा रहे हैं। उनका दिन का चैन और रात की नींद गायब है। देवी-देवताओं के देवरे धोकने के साथ ही दिल्ली दरबार में हाजरी देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। जब भी केबिनेट रिशफलिंग का शगूफा उठता है, बेचारों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। अब देखो ना किसी ने इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने किसी ने शगूफा छोड़ दिया कि भाईसाहब देवऊठनी के बाद ही अपनी टीम बढ़ाएंगे। जब से यह शगूफा छोड़ा है, तब से ही लाइन में लगे भाई लोग आपस में बतियाते हैं कि कब मरेगी सासू और कब आएंगे आंसू।

मीटिंग, सिटिंग एण्ड ईटिंग
सचिवालय में इन दिनों मीटिंग, सिटिंग और ईटिंग का जुमला जोरों पर है। जुमला है कि अब ब्यूरोक्रेसी रोड मैप तैयार करने में बड़ी कंजूसी कर रही है, जबकि इतिहास गवाह है कि हर कोई साहब राज को नई योजनाएं देकर जाते हैं, जिनसे सूबे की तकदीर तक बदलती है। राज का काज करने वाले बतियाते हैं कि गुजरे जमाने में ब्यूरोक्रेसी ने मरु प्रदेश को तीस जिला-तीस काम, अपना गांव-अपनी योजना और अन्त्योदय जैसी नई योजनाएं दी हैं, जो पड़ोसी सूबों के लिए रोल मॉडल भी बनी हैं। अब मीटिंग तो होती है, लेकिन सिटिंग और ईटिंग तक ही सिमट जाती है।  

बदले-बदले से
इस बार सिविल लाइन्स स्थित बंगला नंबर आठ के हालात कुछ बदले-बदले से हैं। हो भी क्यों ना, मामला ई-गवर्नेंस से जुड़ा हैं। अब देखो ना साहब की गोपनीयता को लेकर उनके आसपास रहने वाले भोपे तक परेशान है। पहले तो ऐलान से पहले भोपे के जरिए बात बाहर तक आ जाती थी, लेकिन इस बार ऐनवक्त तक भी कयास लगाना बमुश्किल हैं। भोपे भी इधर-उधर ताक-झांक करने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहे। यह दीगर बात है कि बाहर आकर वे ढींग हांकने में कोई कसर नहीं छोड़ते, ताकि लोगों की गलतफहमी बरकरार रहे और उनका काम चलता रहे।

उत्कंठा फ्रंट लाइन की
सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में जीरो हॉवर में उत्कंठा को लेकर भी काफी खुसरफुसर हो रही है। ऐसा ना पक्ष के बजाय हां पक्ष में ज्यादा होती है। वैसे तो खुसरफुसर तो सचिवालय में भी होती है, मगर पंचायत की जाजम पर साफ दिखाई देती है। अब देखो ना भाईसाहब के दोयम दर्जे के तीन रत्नों में से दो की नजर फ्रंट लाइन की तरफ कुछ ज्यादा ही है। फिलहाल उनकी कुर्सियां दूसरी लाइन में है। वे इस मौके की तलाश में रहते हैं कि कब फ्रन्ट लाइन वाले रत्न इधर-उधर हों और वे सामने वालों को फ्रन्ट लाइन में दिखाई दें। फ्रन्ट लाइन वाले भाईसाहब भी बड़े दिल वाले हैं और किसी न किसी बहाने अपनी कुर्सी से उठकर इन हाउस चैम्बर की ठण्डी हवा में झपकी लेने में कोई चूक नहीं करते।


एक जुमला यह भी
सचिवालय में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा मोटा नहीं, बल्कि नए सिस्टम को लेकर है। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि आखिर वो कौन है, जो राज को उल्टी-सीधी सलाह दे रहे हैं। लंच केबिनों में चर्चा है कि कुछ साहब लोगों ने राय दी है कि सिस्टम को डवलप करें, तो भाग-भाग कर काम करने में कोई परेशानी नहीं होगी और रिजल्ट भी जल्द मिलेगा। ऊपर वालों के सलाह जंचने में भी कोई देरी नहीं हुई, सो फरमान भी जारी हो गया। सो राज का काज करने वालों ने सबसे पहले नए सिस्टम को चौथे स्तंभ पर यूज किया है। राज के हुकुम की आड़ लेकर ऐसे खबरनवीसों की सूची भी बनाई जा रही है, जिनकी लेखनी कुछ ज्यादा ही खांटी है। अब राज का काज करने वालों को कौन समझाए कि सिर के बाल काटने से मुर्दे हल्के नहीं होते हैं। अब तो सोशियल मीडिया से भी सरकारें आने-जाने लगी हैं। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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