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ओपिनियन

लोकतंत्र पर सरकार का एकाधिकार?

Thursday, July 25, 2019 10:00 AM

भारत में जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन जैसी लोकतंत्र की पहचान का आदर्श तब इसीलिए था कि हम अपनी चुनी हुई सरकारों को जनता के लिए पारदर्शी, जवाबदेह और संवेदनशील बना सके। हम गर्व से कह सकें कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता और संविधान ही सर्वोपरि है । यानि की 1947 तक हमने भारत की लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया और जनता के बुनियादी सवालों को अपने मौलिक अधिकारों में बदला, क्योंकि देश का विकास और परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आगे बढ़ानी पड़ती है। समय और समाज का ये आंदोलन ही सूचना आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, लोकपाल जैसे अनेक संस्थानों का स्वरूप लेकर आया और अधिकारों की इसी मुहिम से महात्मा गाांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी (मनरेगा) और सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार कानून हमें मिला।
भारत का संविधान, हम भारत के लोगों के लिए आजादी (1947) के साथ, अधिकार और कर्तव्यों के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता को लेकर भारत निर्माण का नया सपना और सवेरा लेकर आया था। लोकतंत्र को मजबूत और सार्थक बनाने के लिए 2005 से लेकर 2014 तक हमने अनेक छोटे-बड़े जन अधिकारों के आंदोलन और संघर्ष से अनेक बुनियादी अधिकार, संविधान की मूल भावना के अनुसार सूचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार, भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, मानवाधिकार जैसे अनेक अधिकार लगातार मिलकर और लड़कर प्राप्त किए थे। इसलिए 2004 के बाद 2014 तक का समय-भारत के लोकतंत्र में अधिकारों का युग (समय) कहलाता है।

इस दौरान कांग्र्रेस की सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में जनता को संसद से कानून बनाकर ये खुशी और ताकत दी थी कि इस देश का आम नागरिक सम्मान और अधिकार प्राप्त कर सके। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के इस दौर में ही हमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता की एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था मिली थी कि हमें समता, आजादी और न्याय के अनेक जन आंदोलन पूरे देश में सुनाई और दिखाई पड़ने लगे थे और हमारी नौकरशाही और जन प्रतिनिधियों को लोक शासन के कठघरे में अपने कर्तव्य निभाने के लिए बाध्य करने को विवश बनाया गया था। इसी दौरान एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) भी बनी थी। जो जनता को अधिकारों से लैस करने की रीति-नीति पर काम करती थी। ये पृष्ठभूमि का जन संघर्ष ही था कि भारत में संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अन्तर्गत लोगों ने गांधी, आम्बेडकर और नेहरू के सपनों का भारत बनाने की आजादी की दूसरी लड़ाई आगे बढ़ाई थी और अनेक संवैधानिक संस्थानों का महत्व स्थापित किया था। रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग, योजना आयोग और भारत के महालेखाकार जैसे अनेक संस्थान इसी स्वायत लोकतंत्र के हिस्सेदार बने थे।

भारत में जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन जैसी लोकतंत्र की पहचान का आदर्श तब इसीलिए था कि हम अपनी चुनी हुई सरकारों को जनता के लिए पारदर्शी, जवाबदेह और संवेदनशील बना सके। हम गर्व से कह सकें कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता और संविधान ही सर्वोपरि है । यानि की 1947 तक हमने भारत की लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया और जनता के बुनियादी सवालों को अपने मौलिक अधिकारों में बदला, क्योंकि देश का विकास और परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आगे बढ़ानी पड़ती है। समय और समाज का ये आंदोलन ही सूचना आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, लोकपाल जैसे अनेक संस्थानों का स्वरूप लेकर आया और अधिकारों की इसी मुहिम से महात्मा गाांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी (मनरेगा) और सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार कानून हमें मिला। लेकिन 2014 के बाद हमारे सामने एक दूसरी तरह का लोकतंत्र आया है जो अपने चेहरे, चाल और चरित्र में तथा उद्देश्यों में सर्वथा भिन्न है।

भारत में लोकतंत्र का ये दूसरा और संशोधित पाठ्यक्रम अब हमारे संविधान की एक नई व्याख्या इस तरह स्थापित कर रहा है कि लोकतंत्र को टुकड़ों-टुकड़ों में अधिनायकवादी शासन प्रणाली में बदला जा रहा है। इसीलिए हमारे लोकतंत्र में अब लगातार एक ईश्वर, एक राजा, एक व्यक्ति, एक चुनाव, एक धर्म और एक नागरिक संहिता और एक रूप- एक ध्वनि की राष्ट्रवादी धुन बजाई जा रही है ताकि आम आदमी के लोकतंत्र को तानाशाही में बदला जा सके और सबके अधिकारों को सत्ता और व्यवस्था के एकाधिकार में बदला जा सके।

ये नया जनादेश लगातार जन अधिकारों को जहां प्रतिबंधित कर रहा है। संविधान की व्याख्याएं बदल रहा है। स्वायत्तताओं को दासता में बदल रहा है वहां अभिव्यक्ति और समानता के सभी न्यायिक अधिकारों पर भी रोक लगाने के साथ जासूसी और चौकीदारी का माहौल बना रहा है। ताकि लोकतंत्र और आजादी को महज एक लाचारी और विफलता में बदला जा सके और फिर से जॉर्ज आखैल के उपन्यास 1984 की तरह पुलिस राज, गोपनीयता और बड़े भाई के शासन में रूपान्तरित किया जा सके।आप अभी हाल लोकसभा में सूचना के अधिकार कानून 2005 में, जो संशोधन पारित किए गए हैं। उसका सीधा मतलब ये ही है कि सूचना का अधिकार कमजोर हो जाए और जनता के लाखों प्रश्नों का जवाब देने से सरकार और नौकरशाही को मुक्त किया जा सके।

ये एक संकेत है जो मानवाधिकार, पारदर्शिता और जवाबदेही को समाप्त करता है ताकि आम आदमी सरकार से जनहित के सवाल पूछना बंद कर दे। इसलिए जनता के सभी मौलिक अधिकार छीनने वाली ये मानसिकता लोकतंत्र और संविधान की मूल ताकत को समाप्त करने का प्रारंभ है ताकि न तो बांस रहे और न ही बांसुरी बजे।हमारा वर्तमान लोकतंत्र अब आजादी से पाबंदियों की ओर तो समानता से गैर बराबरी की ओर तो उजालों से अंधेरों की ओर कुछ इस तरह जा रहा है कि प्रचण्ड बहुमत का जनादेश ही जनता के जीवन को लाचारी और भय की दुनिया में धकेल रहा है। सूचना का अधिकार राजस्थान से ही निकला था और अरूणा राय के साथ हम सभी ने लड़ा था।                  (ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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