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ओपिनियन

अभिमत : पशुधन स्वास्थ्य की चुनौती से निपटने की तैयारी

Thursday, November 11, 2021 16:15 PM
फाइल फोटो

हमारे देश के विकास में जितना योगदान देश की जनता का है लगभग उतना ही देश के पशुधन का भी है। याद कीजिए वो दौर जब कृषि के लिए ट्रेक्टर और अन्य यंत्र नहीं थे, तब बैलों की जोड़ी ही खेत तैयार कराती थी। जब तिलहन से तेल निकालने के लिए मशीनें नहीं थीं, तब गाय, बैल, भैंस जैसे पशु ही काम आते थे। परिवहन के साधनों का अभाव था ऊंट, बैल, घोडेÞ ही हमें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। माल ढोने के लिए ट्रक नहीं थे तो पशुओं की पीठ पर लादकर ही सामान ले जाया जाता था। यानी कहा जा सकता है कि यदि आज हम विकास की यात्रा तय करते हुए यहां तक पहुंचे हैं तो उसमें हमारे सहभागी हमारे पशु भी रहे हैं और आज भी इनका महत्व कहीं कम नहीं हुआ है। यह सही है कि कृषि और सहायक गतिविधियों के लिए विभिन्न उपकरण आ गए हैं, परिवहन के अत्याधुनिक संसाधन आ गए हैं, लेकिन आज भी दूध और इससे बनने वाले विभिन्न पोषक तत्वों के लिए पशु ही हमारे स्रोत हैं। राजस्थान जैसे प्रदेश जहां अकाल जैसी विभीषिकाएं हर दूसरे वर्ष आ जाती हैं, वहां पशुधन ही है जो किसान का सहारा बनता है। किसान के लिए उसके मवेशी किसी जायदाद से कम नहीं होते, इसलिए इन्हें पशुधन कहा गया है। यही कारण है कि पशुओं का स्वास्थ्य और सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है और इसके लिए पर्याप्त सुविधाएं जुटाना एक अहम मुद्दा है।


किसान और पशुपालक आमतौर पर दुधारू पशु ही पालते हैं, क्योंकि अकाल या अन्य आपदाओं में ये पशु ही आय का प्रमुख साधन बनते हैं। दुधारू पशुओं में आमतौर पर सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंतरू व ब्रह्मा परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण तथा शरीर के अंदर की चयापचय (मेटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि प्रमुख कारणों से रोग होते हैं। इनमें से कई रोग जानलेवा है तो कई बीमारियां पशु के उत्पादन पर कुप्रभाव डालती हैं। कुछ बीमारियां एक पशु से दूसरे पशु को लग जाती है जैसे मुंह व खुर की बीमारी, गल घोंटू आदि। कुछ बीमारियां पशुओं से मनुष्यों में भी आ जाती है जैसे रेबीजÞ (हल्क जाना) क्षय रोग आदि। इन्हें जुनोटिक रोग कहते हैं। हर वर्ष लाखों पशु इन रोगों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं और इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पशुओं का समय पर उपचार नहीं मिल पाता। हर गांव में पशु चिकित्सालय खुल सकें यह सम्भव नहीं है और बीमार पशु को हर किसान या पशुपालक पशु चिकित्सालय तक ला सकें, यह भी सम्भव नहीं है। यही कारण है कि कई बार पशुओं की असमय मौत होती है और इसका सीधा असर किसान की आय पर पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए हाल में केन्द्र सरकार ने पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मोबाइल वैन के जरिए पशुओं के उपचार की व्यवस्था करने की योजना लागू की है। यानी जिस तरह एक एम्बुलेंस या मोबाइल वैन इंसानों के उपचार के लिए पहुंचती है, वैसे ही पशुओं के उपचार के लिए भी एम्बुलेंस या मोबाइल वैन पहुंचेगी।इस योजना का प्रावधान विशेष पशुधन सेक्टर पैकेज के तहत किया गया है, जिसका लाभ पशुपालन क्षेत्र से जुड़े 10 करोड़ किसानों को मिलेगा। इस पैकेज के तहत केंद्र सरकार अगले पांच वर्षों के दौरान 54,618 करोड़ रुपये का कुल निवेश जुटाने के लिए 9800 करोड़ रुपये की सहायता देगी। पैकेज के तहत रोग नियंत्रण कार्यक्रम का नाम बदलकर पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) रख दिया गया है। इसमें मौजूदा पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण तो है ही, लेकिन इसके साथ राष्टÑीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम और अवसंरचना विकास निधि को भी इसमें शामिल किया गया है।


केन्द्र सरकार द्वारा पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा की ओर से विशेष ध्यान दिया जाने के पीछे अहम कारण है। आंकडेÞ बताते हैं कि भारत में पशु धन क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) वर्ष2014-15 से 2019-20 की अवधि के दौरान 8.15 प्रतिशत है। पशुधन क्षेत्र की विकास दर यानी सीएजीआर अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सर्वाधिक है। मुर्गी पालन क्षेत्र की विकास दर भी 10.5 प्रतिशत रही है जो काफी अच्छी है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आजीविका सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।


वहीं केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (पीएसओ) के आंकलन के अनुसार कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों की कुल मूल्य संवर्धन प्रतिशतता में पशुधन क्षेत्र का योगदान 2014-15 में 28 प्रतिशत के मुकाबले 2019-20 में बढ़कर 34 प्रतिशत हो गया। 2018-19 में डेयरी क्षेत्र की उत्पादन की कुल कीमत 7,72,705 रुपए रही, जबकि इसी दौरान गेहूं और धान की कुल उत्पादन की कीमत 4,99,653 करोड़ रुपए रही। डेयरी क्षेत्र का विकास तेज गति से हो रहा है। वर्ष 1970 में जहां देश में कुल 22 मिलीयन मीट्रिक टन दुग्ध उत्पादन होता था वहीं 2019 में यह क्षमता बढ़कर 198 मिलीयन मीट्रिक टन हो गई।
राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो पशुधन स्वास्थ्य और सुरक्षा का यहां के लिए बहुत बड़ा महत्व है। राजस्थान में अकाल पड़ना सामान्य बात है और ऐसे समय में राजस्थान के कई हिस्सों विशेषकर पश्चिमी राजस्थान में पशुधन ही आय का प्रमुख स्रोत है। राजस्थान के सर्वाधिक पशुधन वाले राज्यों में शामिल है। प्रदेश की इस वर्ष जारी आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार देश की सर्वोत्तम गौवंश, भेड़, बकरी, घोड़ा, उंट की नस्लें राजस्थान में हैं। पशु गणना 2019 के अनुसार राजस्थान में कुल 5.68 करोड़ से ज्यादा पशुधन है जो देश के कुल पशुधन का 10.58 प्रतिशत है। यहां देश का 7.20 प्रतिशत गौवंश, 12.47 प्रतिशत भैंस, 13.99 प्रतिशत बकरियां, 10.64 प्रतिशत भेड़ और 98.43 प्रतिशत ऊंट हैं। दूध उत्पादन में राज्य का योगदान 12.72 प्रतिशत और उन उत्पादन में 34.46 प्रतिशत है।    

        -मनीष गोधा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था में पशुधन का क्या महत्व है, लेकिन इनके स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से उपलब्ध सुविधाओं को देखा जाए तो यह अभी भी काफी कम है। आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में दिसम्बर 2020 तक सिर्फ 35 बहुउद्देश्यीय पशु चिकित्सालय, 786 प्रथम श्रेणी पशु चिकित्सालय, 1709 पशु चिकित्सालय, 198 पशु औषधालय, 5638 पशु चिकित्सा उप केन्द्र है। प्रदेश में उपलब्ध 5.68 करोड़ से ज्यादा पशुधन की चिकित्सा के लिए यह सुविधाएं पर्याप्त नहीं कहीं जा सकतीं और यही कारण है कि गांव-गांव पहुंचने वाली मोबाइल वैन या एम्बुलेंस की योजना का राजस्थन जैसे राज्य में बहुत महत्व है। राज्य सरकार हालांकि 102 मोबाइल वैन चला रही है, लेकिन जब इसमें केन्द्र सरकार की योजना का सहयोग मिल जाएगा और इनकी संख्या बढ़ जाएगी तो पशुपालकों को अपने पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए चिंतित नहीं रहना पड़ेगा। केन्द्र सरकार द्वारा पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा की ओर से विशेष ध्यान दिया जाने के पीछे अहम कारण है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में पशु धन क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) वर्ष2014-15 से 2019-20 की अवधि के दौरान 8.15 प्रतिशत है। पशुधन क्षेत्र की विकास दर यानी सीएजीआर अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सर्वाधिक है।

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