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ओपिनियन

कर्नाटक सरकार के भविष्य पर अनिश्चितता

Monday, April 15, 2019 11:30 AM
कर्नाटक विधानसभा

कर्नाटक में लोकसभा चुनावों के नतीजे राज्य में कांग्रेस, जनता दल-स की लगभग एक साल पुरानी सरकार का भविष्य  तय करेंगे। इसलिए राज्य में तीनों प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस, बीजेपी और जनता दल-स बेसब्री से राज्य की 28 लोकसभा सीटों के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। राज्य में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान दो चरणों में 18 अप्रैल और 23 अप्रैल को होगा। जबकि मतों की गिनती एक महीने बाद यानि 23 मई को होनी है। इसलिए नतीजे आने तक इन सभी दलों के नेताओं के दिल की धड़कने बढ़ी रहेगी।

राज्य में वर्तमान कांग्रेस और जनता दल-स की साझा सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा। सरकार चलाने  को लेकर दोनों दलों में टकराव होता रहता है। जनता दल-स से अधिक कांग्रेस पार्टी के विधायकों में पिछले 6 महीने असंतोष   बढ़ रहा है। विधानसभा चुनावों में 225 सदस्यों वाले सदन में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई थी।

राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के नेता के रूप में बीजेपी के येदियुरिअप्पा को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। लेकिन उनकी सरकार दो दिन से अधिक नहीं चल सकी क्योंकि वह सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने में असफल रही। कुल 78 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी। जबकि जनता दल-स को 37 सीटें मिली थी। बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के  लिए कांग्रेस और जनता दल-स में समझौता हुआ। जिसमें कांग्रेस ने बड़ा दल होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद जनता दल-स के एचडी कुमारस्वामी को देना मान लिया।

कुछ दिन तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा लेकिन जैसा की आम तौर पर साझा सरकारों में होता है दोनों दलों में कई मुद्दों को लेकर टकराव होने लगा। एक समय तो ऐसा आया कि कुमारस्वामी  को यह कहना पड़ा कि वे मर्जी से नहीं बल्कि मजबूरी से सरकार चला रहे हैं। मंत्री नहीं बनाए जाने के कारण कांग्रेस में असंतोष पनपने लगा जो लगभग 6 महीने पहले इतना बढ़ गया कि पार्टी के लगभग एक दर्जन विधायक बागी हो गए। उनके बीजेपी के खेमे में जाने की ख़बरें आनी लगी। बीजेपी नेता तथा मुख्यमंत्री पद के दावेदार येद्दियुरिअप्पा ने सार्वजनिक रूप से कहना शुरू किया कि राज्य में कांग्रेस, जनता दल-स सरकार अब कुछ  दिनों की मेहमान है।

लेकिन कांग्रेस पार्टी किसी न किसी तरह  असंतुष्टों को काफी हद तक मनाने में सफल रही। लेकिन इसके बाबजूद 4 ऐसे विधायक थे जो खुले तौर पर बीजेपी का साथ दे रहे थे। इसके साथ ही उन दो निर्दलीय विधायकों ने सरकार को अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। इसी बीच लोकसभा चुनावों की घोषणा के चलते सरकार गिराने का मामला नेपथ्य में चला गया और सभी दल राज्य में अधिक से अधिक सीटें जीतने पर केन्द्रित हो गए। लेकिन सरकार पर यह संकट अभी टला नहीं बस दब सा गया है। चार बागी कांग्रेस विधायकों में से एक ने तो सदन की अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है और बीजेपी ने उसे लोकसभा चुनावों में अपना उम्मीदवार भी बना दिया है।

2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 18, कांग्रेस को 8 तथा जनता दल-स को 2 सीटें मिली थी। कांग्रेस पार्टी ने जनता दल-स को समर्थन देते समय यह आश्वासन दिया था कि वह सरकार में भागीदरी में कोई शर्त नहीं लगाएगी तथा  दोनों दल लोकसभा का चुनाव मिलकर लड़ेंगे। लेकिन राजनीति समझौता में इसका कोई मतलब नहीं होता। बड़े दल के रूप कांग्रेस मंत्रिमंडल और सरकार में अधिक भागीदारी चाहती थीं।  जब लोकसभा की सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू  हुई तो कांग्रेस पार्टी जनता दल को अधिक से अधिक 6 सीटों  देना चाहती थी जबकि जनता दल-स कम से कम 12 सीटें मांग रहा था। फिर मामला कई दिन तक 18 और 10 अटका रहा।

आखिर में बात 20 और 8 पर जाकर पूरी हुई। लेकिन इससे साझा सरकार के हिस्सेदारों का संकट कम नहीं हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों दलों के नेताओं की यह शिकायत बनी रही। जमीनी स्तर पर दोनों दलों के कार्यकर्ता  एक दूसरे के उम्मीदवार के लिए काम नहीं कर रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के बड़े नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री  सिद्धारामिया और जनता दल-स के राष्टय अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा ने कुछ संयुक्त चुनावी सभा की।

लेकिन जमीनी स्तर पर इसका अधिक असर नजर नहीं आया।  कांग्रेस के एक लोकसभा क्षेत्र में तो जनता दल-स के लोगों ने मोदी मोदी के नारे बोलते सुनाई दिए। यानी जमीनी स्तर पर दोनों दलों में जो एकता और एक जुटता होनी चाहिए थी उसका अभाव दोनों दलों के नेताओं को चिंतित करता रहा। राज्य में इन लोकसभा चुनावों के नतीजे क्या रहेंगे? ऐसा कहना अभी मुश्किल है लेकिन राजनीतिक हलको में यह धारणा  सी बन गई है कि जनता दल-स राज्य में अधिक सीटें नहीं जीत पाएगा तथा इसका परोक्ष लाभ बीजेपी को मिलेगा। अभी तक जो चुनावी सर्वेक्षण सामने है

उसके अनुसार बीजेपी को पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में कोई अधिक नुकसान नहीं होगा तथा इससे कांग्रेस और जनता दल-स की सीटों से कुछ ही अधिक सीटें ही मिलेगी। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगर कांग्रेस और जनता दल-स को राज्य में अपनी सरकार बचानी है तो दोनों को मिलकर बीजेपी से अधिक सीटें जीतनी होंगी। तभी यह राजनीतिक संकेत जाएगा कि राज्य में बीजेपी की हवा खत्म होती जा रही है। इसका अन्य और एक सीधा असर यह भी होगा कि जो असंतुष्ट कांग्रेस विधायक  अपनी पार्टी छोड़े बीजेपी के खेमें में जाने की सोच रहे हैं उन्हें  अपने इस निर्णय पर फिर से विचार करना पड़ेगा।

दूसरी और बीजेपी के नेताओं को विश्वास है राज्य में मोदी की हवा के करना पार्टी को पहले से भी अधिक सीटें मिलेगी   जो इस बात का संकेत होगा कि राज्य में पार्टी का दबदबा लगातार बढ़ रहा  है। जो कांग्रेस विधायक अपने आपको पार्टी में असहज महसूस करे रहे है। वे बीजेपी में शामिल होने की सोचेंगे। कांगेस, जनता दल-स के पास विधायकों का आकड़ा बीजेपी से बहुत अधिक नहीं है और केवल एक दजर्न  कांग्रेस विधायकों के पाला बदलने से सांझा सरकार का पतन हो जाएगा। अधिक लोकसभा सीटें जीतकर कांग्रेस-द, जनता दल इस स्थिति को रोकना चाहते है जबकि बीजेपी के नेताओं को पूरा विश्वास है कि इन लोकसभा के चुनावों के बाद राज्य में फिर बीजेपी की सरकार बनेगी।
 

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