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ओपिनियन

हिंसा राजस्थान को शोभा नहीं देती

Thursday, February 27, 2020 10:25 AM
फाइल फोटो

सरकार, समाज और समय की विडंबना यह है कि जिस महात्मा गांधी, आम्बेडकर, लोकतंत्र, संविधान हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और विकास की डुगडगी हम बजा रहे हैं, उसमें पीड़ित और शोषित और वंचित भारत की ये आंसू भरी व्यथा कथा कहीं सुनाई नहीं पड़ रही है। हम इस बात पर गर्व करते हैं कि आम्बेडकर ने हमें संविधान दिया, तो महात्मा गांधी ने हमें आजादी दिलाई। हमारे देश में जाति और धर्म के नाम पर अत्याचारों की एक लंबी परम्परा है और हम अब हजारों साल की सभ्यता तथा संस्कृति की दुहाई देते हुए यह मानने लगे हैं कि जिस तरह कभी आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। एक जन आंदोलन का नारा था आज उसी तरह दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करना भी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार बन गया है। 2020 की कहानी यह है कि हम संतों, महापुरुषों, राष्ट्र निर्माताओं, देवी देवताओं और वैदिक भारत के उत्सव-त्यौहार मनाते हुए इस पीड़ित मानवता को लेकर पूरी तरह मौन है, क्योंकि अब हम एक विश्व शक्ति हैं। सरकार, समाज और समय की विडंबना यह है कि जिस महात्मा गांधी, आम्बेडकर, लोकतंत्र, संविधान हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और विकास की डुगडगी हम बजा रहे हैं, उसमें पीड़ित और शोषित और वंचित भारत की ये आंसू भरी व्यथा कथा कहीं सुनाई नहीं पड़ रही है। हम इस बात पर गर्व करते हैं कि आम्बेडकर ने हमें संविधान दिया, तो महात्मा गांधी ने हमें आजादी दिलाई। लेकिन हम इस बात को कभी नहीं समझते कि आम्बेडकर ने जाति के नाम पर अत्याचारों को लेकर ही हिन्दू धर्म छोड़ा था और जीवन के अंतिम समय में बौद्ध धर्म को अपनाया था और महात्मा गांधी को भी आजादी के बाद एक हिन्दूवादी की गोली से ही शहीद होना पड़ा था।

भारत की कोई महान आत्मा यह एक छोटा सा प्रश्न आजादी के 72 साल बाद हल नहीं कर पा रही है कि दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यक (मुसलमान, ईसाई, सिक्ख आदि) के प्रति हम इतने संवेदहीन, बर्बर और असहिष्णु क्यों हैं और ये कौनसी पशु मानसिकता है जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर के लिए तो मरने-मारने को तत्पर हैं, लेकिन शोषित, वंचित समाज को लेकर ऐड़ी से चोटी तक ये मानती है कि गैर बराबरी का जीवन जीने वाले समाज से हमें क्या लेना-देना। यह जाति-धर्म के अत्याचार हिन्दी भाषा-भाषी गंगा-जमुनी संस्कृति के उत्तर भारत में सबसे अधिक है और भारत का कोई प्रदेश आज ऐसा नहीं है जो दलित महिला अत्याचारों से मुक्त हो। मजे की बात ये है कि भारत के 133 करोड़ देवी-देवताओं की मानसिकता आज ये है कि कोई इन अत्याचारों पर बात करने और बोलने को भी तैयार नहीं होता। इस तरह भारत की पांच हजार साल की सिंधु घाटी सभ्यता का ये आलम है कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता की पूर्वाग्रह से भरी मानसिकता से आज कोई मुक्त भी नहीं होना चाहता। अत्याचारों की राजनीति में हम अमेरिका से भी आगे हैं और भारत में अत्याचार अब एक कुटीर उद्योग है। नया भारत जाति-धर्म के अत्याचारों और गैर बराबरी की सामाजिक- आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीति से लहु-लुहान हैं तथा लिंग भेद और हिंसक उन्माद से भरा हुआ है क्योंकि हमारे देश में लोकतंत्र की प्रयोगशाला- तन, मन, धन से असत्य और हिंसा से ही फलफूल रही है। हम 2020 में भी जाति-धर्म की जनगणना और नागरिकता की ही खोज कर रहे हैं, क्योंकि भेदभाव और नफरत की राजनीति अब हमारे लोकतंत्र की मुख्यधारा हो गई है।

भारत का सरकारी अपराध अन्वेषण ब्यूरो भी हर साल यही कह रहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान दलित महिला, आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के गढ़ हैं और दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि भारत की संसद और विधानसभाएं तथा मीडिया और न्यायपालिका भी जाति- धर्म की इस हिंसा के प्रति संवेदनहीन है। ऐसे में किसी दलित और महिला अथवा अल्पसंख्यक का राष्ट्रपति बन जाना कोई अर्थ नहीं रखता क्योंकि भारत के सभी राज्यों और केन्द्र में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका पर आज बड़ी जातियों और बहुसंख्यक धर्म की विजय पटाकाएं फहरा रही हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग की दबंग जातियां अब गांवों में शक्ति का केन्द्र हैं। राजस्थान में दलितों और महिलाओं पर अत्याचार का जो वातावरण है, उसका सबसे बड़ा कारण ये है कि बड़ी जातियां और अन्य पिछड़ा वर्ग की दबंग जातियां राजनीतिक सत्ता-व्यवस्था को चलाती है और गरीब की जोरू को यहां सबकी भाभी समझा जाता है। दलित महिला अत्याचारों पर प्रदेश उत्सव धर्मी समाज और जाति-धर्म की राजनीति इसीलिए उन्माद में जीती है कि वह निर्भय है और संरक्षित है। यहां आरक्षण, संस्कृति को जुलूस और उत्सव तो रोज होते हैं, लेकिन यहां भारत की आत्मा और परमात्मा से कभी कोई ये एक सवाल नहीं पूछता कि हम भारत के दलित, महिला, अल्पसंख्यक और आदिवासियों ने जाति और धर्म के ठेकेदारों का क्या बिगाड़ा है, जो आप हमें चाहे जब अपमानित करते हैं और हम पर अत्याचार करते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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