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ओपिनियन

जानिए राज काज में क्या है खास

Monday, May 13, 2019 11:35 AM
राज काज

चर्चा में भोजन पॉलिटिक्स
पिंकसिटी में दस दिनों से भोजन पॉलिटिक्स की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यूं ना, पहली बार हाथ के साथ कमल वालों ने भी भोजन कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तर में पापड़ के हनुमान से लेकर दक्षिण में देहलास वाले बालाजी और पूर्व में खोले के हनुमान जी से लेकर पश्चिम में झारखंड महादेव मंदिर तक चली भोजन के बहाने पॉलिटिक्स का यह फार्मूला तकिए के नीचे चाबी रख कर सोने वाले धन्ना सेठों ने निकाला है। चर्चा है कि भोजन पॉलिटिक्स के बहाने देसी घी की रसोई खाकर डकारें लेने वाले भाई लोगों ने ईवीएम का बटन दबाते समय भी अपनी बिरादरी का ख्याल रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चूंकि मामला दाना-पानी के साथ ही नमक से ताल्लुकात जो रखता है।

असर निगेटिव ग्राउंड रिपोर्ट का
दिल्ली दरबार के लिए सूबे में हुई चुनावी जंग के बाद अलग-अलग ग्राउण्ड रिपोर्ट्स ने दोनों दलों के नेताओं की नींद उड़ा दी है। उड़े भी क्यों नहीं, वोटर्स ने भी अबकी बार लीडर्स की अग्नि परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पांच साल तक मन की बात सुन सुनकर अपने कान पकवाने वाले पांच फीसदी साइलेंट वोटर्स ने भी अपने मन की बात नहीं बताई। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के ठिकाने पर ग्राउण्ड रिपोर्ट को लेकर रोजाना कानाफूसी हो रही है। उनके समझ में नहीं आ रहा कि यह रिपोर्ट उनके पक्ष में निगेटिव है या पॉजीटिव।

गणित वोटरों की, परेशान नेता
दिल्ली दरबार के लिए हुए मतदान के बाद हाथ और भगवा वाली पार्टियों के नेताओं की जुबान पर ताला सा लग गया है। मतदान से पहले तक बड़े-बड़े दावे करने वाले नेताओं को मतदान के बाद यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर मतदाताओं ने उन्हें गणित का कौन सा पाठ सिखाया है। मतदान से पहले तक बीस से ज्यादा सीटों पर अपने झण्डे लहराने का दावा करने वाले नेता अब चुप्पी साधे हुए हैं। किसी भी दल का नेता बारह से आगे के बाद अटकने लगता है। दोनों दलों के पास बारह का आंकड़ा तो ठीक-ठाक है, लेकिन बाकी बचे 13 ठिकानों के बारे में वे 23 तारीख का इंतजार कर रहे हैं। राज के कारिन्दे भी जोड़-बाकी करने में व्यस्त हैं। फर्क इतना सा है कि नेता दो और दो पांच बताते हैं।

हठ के फेर में फंसे मंत्री
बाल-हठ और त्रिया-हठ दोनों ही ठीक नहीं होते हैं। हठ करने वाले तो हठ कर लेते है, लेकिन परेशान दूसरों को होना पड़ता है। इस बार दिल्ली दरबार के लिए हुए चुनावों में बाल-हठ और त्रिया-हठ दोनों को पूरा करने के लिए कइयों को पसीने बहाने पडेÞ। बाल-हठ तो समझने वाली बात है, लेकिन त्रिया-हठ को पूरा करने के लिए हमारे सड़क वाले मंत्री के साथ इंजीनियरों तक को जूझना पड़ा। राज में काज करने वाले भाई इसका अर्थ अपने-अपने हिसाब से निकालने में जुटे हैं। कहते हैं कि सड़क वाले इंजीनियरों को आगे के साढ़े चार साल जो दिख रहे हैं।

नब्ज़ टटोलने वालों का इलाज
राज की चाकरी से मन भरने के बाद उससे मुक्ति के लिए नौकर अपने जतन में जुट जाते हैं। इसके लिए कई देवताओं के सवामणी भी बोलते हैं। पार नहीं पड़ती है, तो और कोई जुगाड़ बिठाते हैं। इस बार बीमारों की नब्ज देखने वाले भगवान के रूप में माने जाने वालों ने चुनावी माहौल में चाकरी छोड़ने के लिए एक जुगाड़ बिठाया। चुनाव लड़ने के बहाने दो दर्जन से ज्यादा डाग्दर साहिबों ने वीआरएस की अर्जी लगाई, परन्तु ऊपर बैठे अफसरों ने उनकी मंशा को भांप मनाही कर दी। अफसरों ने नब्ज़ टटोली तो पता चला कि इनमें से कइयों को परदेस की हवा खाने की लगी है।

फार्मूला पड़ सकता है महंगा
हाथ वाली पार्टी ने दिल्ली दरबार के चुनावों में नया फार्मूला अपनाया है। यह है जातीय आधार पर प्रत्याशी घोषित कर वोट बटोरने का। जब मैदान में उतरे तो उसके नेताओं के होश उड़ते नजर आए। अन्य जातियों के मतदाताओं ने इस फार्मूले को नकार दिया और नमो मंत्र का जाप करने के साथ ही एंटीकास्ट वोट की हवा चला दी। बाड़मेर से चली यह हवा सीकर होते हुए जयपुर ग्रामीण तक जा पहुंची। राज करने वालों में चर्चा है कि नेताओं को इस फार्मूले की कीमत सीटें खोकर चुकानी पड़ सकती है। अब इन नेताओं को कौन समझाए कि मतदाता काफी समझदार हो चुका है। वह जमीन दिखाने में वक्त नहीं लगाता है।
 

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