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ओपिनियन

तीसरे मोर्चे की फिर सुगबुगाहट

Monday, May 13, 2019 10:30 AM
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनावों के नतीजे आने में दो सप्ताह से भी कम समय रहने के साथ ही एक बार फिर गैर एनडीए और  गैर यूपीए  तीसरा मोर्चा बनाने की  सुगबुगाहट एक बार फिर शुरू हो गयी  है। ऐसा मोर्चा, जिसे फेडरल फ्रंट का नाम दिया गया है, बनाने के प्रयास तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव काफी समय से कर रहे है लेकिन उनको अपने इन प्रयासों में सफलता नहीं  मिली क्योंकि जिन क्षेत्रीय दलों को मिलकर वे ऐसा मोर्चा   बनाना चाहते उनके अपने स्थानीय राजनीतिक निहित स्वार्थ  है। एक बार फिर राव को यह लग रहा है कि बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व वाले दोनों गठबन्धनों में से किसी को भी लोकसभा चुनावों में बहुमत नहीं  मिलेगा इसलिए तीसरा मोर्च केन्द्र में अगली सरकार बनाने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

दिसम्बर में तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनावों में राव, जिन्हें केसीआर के नाम से पुकारा जाता है, की तेलंगाना  राष्टÑ  समिति भारी बहुमत से फिर सत्ता में आई थी। इन चुनावों के बाद उन्होंने तीसरा मोर्चा बनाने के प्रयासों को तेज कर दिया  था। वे तमिलनाडु में जाकर प्रमुख विरोधी दल  द्रमुक  के नेता स्टालिन से मिले, जनता दल-स के नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी, भुवनेश्वर जाकर वहां के बीजू जनता दल के नेता और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को भी   मिले। इसके अलावा उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी से कोलकता जाकर भेंट की। पर उनके तीसरा मोर्चा बनाने के प्रयासों को उस समय झटका लगा जब समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने उनसे मिलने का समय नहीं दिया।

बताया जाता है क्षेत्रीय दलों के जिन नेताओं से वे मिले उन्होंने  ऐसे तीसरे मोर्च के कल्पना को तो सही बताया लेकिन साथ में यह भी कह दिया ऐसा होना काफी कठिन है। पर फिर भी वे इस बात पर सहमत थे कि लोकसभा चुनावों के बाद ही इस बारे में बात को आगे बढ़ाना अधिक बेहतर होगा। इस क्रम में वे पिछले हफ्ते सबसे से पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनराई और राज्य के सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के नेता से मिले। लेकिन उनका कहना था कि इस बारे में कोई भी निर्णय पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही कर सकता है।

इसके बाद उन्होंने द्रमुक नेता स्टालिन से मिलने चेन्नई जाना था लेकिन  उनके दो विधानसभा उपचुनावों में व्यस्त रहने के कारण मिलने का कार्यक्रम को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। केसीआर इस सप्ताह के मध्य में अपने परिवार के साथ तमिलनाडु के कुछ मंदिरों में जाने वाले है वे इसी दौरान स्टालिन को मिलना चाहते है। वैसे भी तमिलनाडु में द्रमुक के तीसरे मोर्चे में शामिल होने की संभावना बहुत कम है। इसका कारण यह है कि द्रमुक का  इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन है।

इसके अलावा स्टालिन सार्वजनिक रूप से कह चुके है उनकी पार्टी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी स्वीकार है। ठीक ऐसी ही स्थिति कर्नाटक में जहां जनता दल-स की कांग्रेस के साथ सांझा सरकार है। हालांकि कर्नाटक के राजनीतिक  हलकों में यह कहा जा रहा कि लोकसभा चुनावों के वहां  राजनीतिक हवा कुछ बदल सकती है क्योंकि बड़े दल के रूप में कांग्रेस पार्टी अब खुद का मुख्यमंत्री बनाना चाहेगी। लेकिन ऐसा होगा या नहीं ऐसा कहना समय से पूर्व होगा।

तेलंगाना के पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राष्ट समिति ने लोकसभा तथा वहां की विधानसभा के चुनावों में जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। तेलंगाना में लोकसभा की 17 तथा आंध्र प्रदेश में 25 सीटें है। इन दोनों राज्यों में चुनाव हो चुके है। वहां के चुनावों का आकलन इस और संकेत कर रहा है कि तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट समिति ही अधिकांश  सीटों पर जीतेगी।

इसी प्रकार आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली कांग्रेस वर्तमान सत्तारूढ़ दल तेलगु देशम पार्टी से बहुत आगे। रेड्डी की पार्टी को कुल 25 लोकसभा सीटों में अधिकांश सीटें मिल सकती  है। इसी प्रकार उसे विधानसभा में भी बहुमत मिलने की संभावना है। हालांकि इस राज्य दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा है लेकिन इस बात की संभावना बन रही है कि चुनावों के बाद केसीआर और जगन मोहन रेड्डी  की रहें अलग-अलग हो सकती हैं।

कुछ समय पूर्वे तक जगन मोहन रेड्डी को बीजेपी के कुछ अधिक ही नजदीक माना जाता था। लेकिन अब वैसा नहीं है। वे  पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस पार्टी के नेताओं के संपर्क में भी हैं। कई अन्य बड़े नेताओं की तरह से उनको भी यह लगता कि केंद्र में दोनों में से शायद ही कोई एक गठबंधन बहुमत पा सके। जगन मोहन रेड्डी के पिता वाई राजशेखर रेड्डी अपने समय में मुख्यमंत्री के अलावा कांग्रेस के बड़े नेताओं की श्रेणी में आते थे। एक विमान दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो गया था। जगन मोहन रेड्डी उनका स्थान लेने की भरसक कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

धीरे-धीरे उनके और कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद बढ़ते चले गए और आखिर में उन्होंने अपने पिता के नाम से राज्य में अलग कांग्रेस पार्टी बना ली। कांग्रेस के कुछ केन्द्रीय नेता यह मानकर चल रह रहे कि जरूरत पड़ने पर जगन मोहन रेड्डी बीजेपी के बजाए उनका साथ देंगे। इस सारे संभावित राजनीतिक परिदृश्य में केसीआर का   तीसरा मोर्चा बनने की आसार नहीं के बराबर हैं। चूंकि वे कभी  खुद बीजेपी के गठबंधन का हिस्सा थे

इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि वे खुद बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ जा सकते है। लेकिन फिलहाल उनका यही प्रयास है कि अगर तीसरा मोर्चा नहीं बनता तो कम से कम जगन मोहन रेड्डी उनके साथ रहें। चूंकि दोनों राज्यों में कुल 42 सीटें है और अधिकांश  सीटों पर उनकी और रेड्डी की पार्टी को ही जीत मिलेगी। इस प्रकार वे दोनों मिलकर किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं। दोनों दल मिलकर केंद्र में नई सरकार में सत्ता की भागेदारी को लेकर अपनी शर्तें मना सकेंगे।

- लोकपाल सेठी
 

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