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Wednesday 3rd of June 2020
 
ओपिनियन

जलवायु परिवर्तन से बंजर होती जमीन

Friday, November 08, 2019 11:20 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन समूची दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन से जहां समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कई द्वीपों और दुनिया के तटीय महानगरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है, वहीं सूखे, जमी मिट्टी के ढीली होने के चलते तेजी से बिखरने, मिट्टी में कार्बन सोखने की क्षमता कम होते जाने, खारापन बढ़ने, बेमौसम बारिश के कारण बाढ़ आने, कम समय में ज्यादा बारिश आने और शुष्क भूमि पर निर्भर लोगों के लिए भोजन का संकट बढ़ने का भीषण संकट पैदा हो गया है। सबसे बड़ा संकट तो जमीन के दिनोंदिन बंजर होने का है। यदि सदी के अंत तक तापमान में दो डिग्री की बढ़ोतरी हुई तो 115.2 करोड़ लोगों के लिए जल, जमीन और भोजन का संकट पैदा हो जाएगा। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना एकदम सही है कि ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्सजन में कटौती के लक्ष्य अब भी पहुंच से बाहर हैं। यही कारण है कि जलवायु आपदा टालने में विश्व पिछड़ रहा है। उनका मानना है कि समय की मांग है कि समूचा विश्व समुदाय सरकारों पर दबाव बनाए कि वह समझ सकें कि इस दिशा में हम पिछड़ रहे हैं और हमें तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है। यदि वैश्विक प्रयास तापमान को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने में कामयाब रहे तो भी 96.1 करोड़ लोगों के लिए यह खतरा बरकरार रहेगा। फिलहाल विज्ञान कह रहा है कि ग्रीनहाउस गैसों के उर्त्सजन में कटौती की दिशा में यदि समय रहते प्रयास किए गए तो इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा बीते दिनों जारी ’’लैंड डिग्रडेशन न्यूट्रीलिटी टारगेट सेटिंग’’ रिपोर्ट के अनुसार भूमि की बर्बादी के चार बड़े कारणों में पहला सबसे बड़ा कारण जंगलों का अंधाधुंध कटान है। दूसरा आबादी में बढ़ोतरी और संरचनात्मक ढांचे में बदलाव है। तीसरा जमीन का सही तरीके से प्रबंधन न होना और खेती के पुराने तौर-तरीके। चौथा कारण है मौसम की अतिवादी घटनाएं जिनमें बाढ़, सूखा, कम समय में ज्यादा बारिश आदि प्रमुख हैं। असलियत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण मौसम के रौद्र रूप ने पूरी दुनिया को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है जिसका सबसे ज्यादा असर जमीन पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की सबसे बडी वजह मरूस्थलीकरण है। इसका असर आने वाले दिनों में विकासशील देशों के 1.3 से 3. 2 अरब लोगों पर पड़ेगा। इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता। असलियत यह है कि इसके परिणामस्वरूप बंजर और मरूभूमि में जमीन के तब्दील होने के कारण मिट्टी में कार्बन की मात्रा कम हो रही है जिससे ग्रीनहाउस गैसों के उर्त्सजन में बढ़ोतरी हो रही है। इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की मानें तो बड़े पैमाने पर कार्बन को खुद में समेटे पर्माफ्रॉस्टम या तुषार मिट्टी कहें या फिर जीम हुई मिट्टी अब ढीली पड़कर बिखरने लगी है। तुषार मिट्टी या जमी हुई मिट्टी वह है जो शून्य डिग्री तापमान होने से जम चुकी होती है या ठोस रूप अक्ष्तियार कर चुकी होती है। जो इलाके बर्फ से नहीं ढके होते हैं, वहां यह मिट्टी की एक परत के नीचे होती है। तापमान में जैसे जैसे बढ़ोतरी होती है, वैसे ही यह बिखरने लगती है। ऐसी मिट्टी कहीं भी हां, उसका असर समूचे विश्व पर पड़े बिना नहीं रहता। अगर प्रदूषणकारी तत्वों के उर्त्सजन में कमी नहीं की गई तो इसके बिखरने की प्रक्रिया और तेज हो जाएगी। इसके गिरने से उसमें समाहित कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन हवा में घुलेगी नतीजतन जलवायु परिवर्तन का खतरा और गंभीर रूप से बढ़ जाएगा। अगर प्रदूषण में कमी नहीं लाई गई तो 2100 में कम से कम 30 फीसदी तुषार मिट्टी या जमी हुई मिट्टी ढीली होकर फैल जाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों के कुल वैश्विक उर्त्सजन में कृषि, वन और भूउपयोग की हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई है। आईपीसीसी की मानें तो खेतों और घास के मैदानों की मिट्टी में कार्बन सोखने की क्षमता प्रति वर्ष 0.4-8.6 गीगीटन होती है जो अमरीका द्वारा चरम स्थिति में उर्त्सजित सालाना प्रदूषण के डेढ़ गुणा के बराबर है। लेकिन कृषि पद्धतियों एवं भूमि उपयोग में लाए जाने वाले तरीकों से इसमें बदलाव संभव है। जहां तक जंगलों के कटान का सवाल है, जंगलों के कटान के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उर्त्सजन में बढ़ोतरी होती है। भूक्षरण के कारण मिट्टी में कार्बन तत्वों के घनत्व में कमी आने के कारण उसी जमीन पर पनपने वाले वन पुराने वनों के स्तर की भरपाई कतई नहीं कर पाते। वन प्रबंधन से वन भूमि पर कार्बन के भंडार को कम करने के प्रयास से भी उर्त्सजन बढ़ता है। देखा गया है कि पारंपरिक खेती के उपयोग वाली मिट्टी लगातार होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उर्त्सजन का स्रोत बनी रहती है। जबकि कृषि भूमि की मिट्टी खेती में इस्तेमाल में लाए जाने से पहले 20 से 60 फीसदी जैविक कार्बन को खो देती है।  दरअसल औद्यौगिक क्रांति के बाद से ही पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव के कारण मिट्टी में कार्बन की मात्रा घटी है। यह सिलसिला अभी बदस्तूर जारी है। आज जिस तरह की चुनौतियां मौजूद हैं, उसके मद्देनजर इस क्षमता को बढ़ाए जाने की जरूरत है। गौरतलब यह है कि आज समूची दुनिया में करीब 40 फीसदी जमीन बंजर हो चुकी है। यदि इसमें से 6 फीसदी घोषित रेगिस्तान को छोड़ दिया जाए तो यह साफ  है कि 34 फीसदी जमीन पर करीब चार अरब लोग निर्भर हैं लेकिन मानवीय हस्तक्षेप के चलते वह बर्बाद हुई है। इस पर सूखा, यकायक ज्यादा बारिश, बाढ़, खारापन, रेतीली हवाएं आदि के चलते बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते यह खतरा दिनोंदिन और बढ़ता ही जा रहा है।
ज्ञानेन्द्र रावत (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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