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जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, November 04, 2019 11:55 AM
जानिए, राजकाज में क्या है खास?

माजरा-ए-वतन
भगवा वाली पार्टी के नेता पहले जयचंदों की करतूतों से उबर भी नहीं पाए कि अब स्काइलैब नेताओं ने संकट बढ़ा दिया है। ऊपर से थोपे गए स्काइलैबों के सामने सालों से एड़ियां रगड़ने वालों की कोई पूछ नहीं है। स्काइलैब नेता खुद भले ही विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में जीत दिलाने का दावा भर रहे हैं। जिन लोगों ने विधानसभा के चुनावों में उनके सामने टिकट मांगे, उनसे भी खुन्नस निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। राजधानी के साथ सूर्यनगरी और चंबल के पानी वाले शहर में दो-दो महापौरों को लेकर एक जाति विशेष के वोटों को अपने पक्ष में करने का प्रयोग तो बढ़िया किया है, लेकिन भाई लोगों ने निपटाने का अभियान भी शुरू कर दिया है। स्काइलैबों और सालों एड़ियां रगड़ने वालों के बीच पनपी गुटबाजी के चलते बड़े नेताओं के पसीने नहीं सूख पा रहे। वे माजरा-ए-वतन को देख चिंता में डूबे हैं।

संघ बना संकट का सबब
आजकल भगवा  पार्टी के नेता संघ के बड़े भाईसाहब के छपास रोग से परेशान हैं। वो घर में समझाने के बजाय मीडिया के जरिए निर्देश दे रहे हैं। इसका असर हमारे सूबे में भी दिखाई दे रहा है। सूबे के चुनावों में हार चुकी पार्टी निकाय चुनावों में भी संकट में दिखाई दे रही है। इनमें भी उन्हें हाथ वालों के बजाय संघ वालों से जूझना पड़ रहा है। संघ वाले भाई लोग भी दंभ भर रहे हैं कि वक्त आने दो हम देख लेंगे।

रैळा धौळे कपड़ों वालों का
इन दिनों धौळे कपड़े वालों का रैळा कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं। चर्चा भी क्यों ना हो, उनकी चमचमाती गाड़ियां पिंकसिटी की सड़कों पर जो दौड़ रही है। और तो और एमएलएज के बंगलों के बाहर भी सड़कों पर आड़ी-टेढ़ी खड़ी हो रही हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ इंदिरा गांधी भवन में पीसीसी के ठिकाने पर धौळे कपड़े वालों की लंबी लाइनें लगती हैं। राज का काज करने वाले बतियाते हैं कि इस महीने शहरी सरकार के होने वाले चुनावों की तरफ आज कल जमीन से जुड़े इन चमचमाती लग्जरी कारों के मालिकों का रुझान कुछ ज्यादा ही है। हमें भी भाईसाहब ने बताया कि लाल आंखें दिखाकर कुछ लीक से हटकर करने के लिए कम से कम पार्षद का तमगा मिल जाए तो भाग दौड़ करने में बुराई भी नहीं है।

कब होगा सपना पूरा
सूबे के किसान पुत्र कई सालों से सपना देख रहे है, लेकिन वह मुंगेरीलाल के सपनों की तरह अभी तक पूरा नहीं हो पा रहा। हर तरह के हथकंडे अपनाने के बाद भी उसे पूरा करने के लिए ऐड़ी से चोटी तक जोर लगाना पड़ रहा है। अब देखो ना पहले नंबर वन सीट के लिए जोधपुर वाले अशोकजी को किनारे लगाने के लिए जाड़ों की रातों में देवी-देवताओं के देवरों के धोक लगाई थी, पार नहीं पड़ी। और अब देवनारायण के वंशज ने लंगड़ी फांसने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सीधे साधे किसान पुत्रों ने अपनी मन की बात भी उगलने में कोई कंजूसी नहीं की। दिवाली की रामा-श्यामा के दौरान जब जोधपुर वाले भाईसाहब के सामने मुंह खुला तो वे भी  बगलें झांकने लगे। भाईसाहब ने तो हाल-चाल ही पूछा था कि किसान पुत्रों के मुंह से निकल पड़ा कि उनका सपना पूरा होते दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा, आप तो सीधे सादे हो, मगर ये तो आपसे भी एक कदम आगे हैं।

एक जुमला यह भी
इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी बिना हड्डी वाली जीभ से ताल्लुकात रखता है। वह कब और कहां फिसल जाए, उसका कोई भरोसा नहीं है। इस बार नेताओं की जीभ कुछ ज्यादा ही फिसल रही है। सूबे के नेता भी जीभ फिसलने की बीमारी से बचे हुए नहीं हैं। अब देखो ना दो सप्ताह पहले नेता की जीभ क्या फिसली, इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकानेदार को दुहाई पर दुहाई देनी पड़ी। बेचारे दो नंबर वाले नेताजी के पास कोई और चारा भी नहीं था, चूंकि लोगों ने एक नंबर वाले नेता की बात को दिल्ली दरबार से जोड़ने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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