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Tuesday 19th of November 2019
 
ओपिनियन

टीपू सुल्तान : अत्याचारी या आजादी का योद्धा

Monday, November 04, 2019 10:45 AM
टीपू सुल्तान (फाइल फोटो)

इतिहासकारों, शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के मैसूर के सुल्तान टीपू के बारे में अलग राय रही है। इन लोंगो को एक बड़ा वर्ग यह मानता है टीपू सुल्तान ने केवल देशभक्त थे बल्कि उन्होंने ने ही ब्रिटिश शासकों के खिलाफ पहली आजादी की लड़ाई लड़ी थी। वे एक कुशल प्रशासक थे तथा उन्होंने अपने कार्यकाल में जो सुधार किए वे आज भी सराहे जाते है। इस तबके के दूसरे वर्ग का कहना है कि वह एक निरंकुश और अत्याचारी शासक था। उसने अपने कार्यकाल में न केवल बड़ी संख्या में मंदिरों और चर्चों को तोड़ा बल्कि बड़े स्तर पर हिन्दूओं और ईसाइयों को इस्लाम कबूल करने के किए मजबूर किया। जिन्होंने इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया। उन्हें मौत के घाट उतारने का आदेश दिया। उनका दावा है कि इस नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। इसके लिए वे कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज भी पेश करते हैं। आमतौर में स्कूली स्तर के पाठ्यक्रम में टीपू सुल्तान को ब्रिटिश शासकों के खिलाफ  लड़ने वाले एक बड़े योद्धा के रूप में पढ़ाया जाता हैं। उनके लिए सभी ऐसी किताबों में उन्हें टाइगर ऑफ मैसूर के नाम से संबोधित किया जाता है।

कर्नाटक में राजनीतिक स्तर पर सियास दल पूरी तरह से बंटे हुए हैं। वर्तमान सत्तारूढ़ दल बीजेपी और इसके नेता इस बात को कहने में गुरेज नहीं करते कि टीपू सुल्तान न केवल हिंदू विरोधी था बल्कि ईसाइयों के भी खुलकर खिलाफ था। उनका कहना है कि मैसूर का ऐसा शासक राज्य की जनता का हीरो नहीं हो सकता। उसका महिमामंडल किया जाना ठीक नहीं। उधर विरोधी दल कांग्रेस और जनता दल-सेकुलर का मानना है कि टीपू सुल्तान एक धर्म निरपेक्ष शासक था तथा उसने अपने शासनकाल के दौरन न केवल कई मंदिर बनवाए बल्कि पुराने मंदिरों को खुले हाथों दान भी दिया। ऐसे शासक को सदा याद किया जाना चाहिए। उसकी जयन्ती सरकारी तौर पर मनाई जानी चाहिए। इस पर सबसे पहला विवाद आज से लगभग तीन दशक पहले शुरू हुआ उस समय मुख्यमंत्री जेएच पटेल के नेतृत्व वाली सरकार ने टीपू सुल्तान के 200वीं जयंती मनाने का फैसला किया। लेकिन इसको लेकर हुए विवाद के चलते सब खटाई में पड़ गया।

2015 तक राज्य में कुछ सामाजिक संगठन, जो मुस्लिम जमातों से जुड़े हुए हैं। टीपू सुल्तान की जयंती मनाते थे। उनके समारोह केवल मैसूर और बंगलुरु तक ही सीमित रहते थे। 2015 में जब राज्य में कांग्रेस सरकार थी तो इसके मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया ने घोषणा की कि इस बार टीपू सुल्तान की जयंती सरकारी तौर पर मनाई जाएगी। बंगलूर में राज्य स्तर का समारोह होगा तथा जिला मुख्यालयों पर भी ऐसे आयोजन किए जाएंगे। केवल इतना ही नहीं उन्होंने कोलकाता में रह रहे टीपू के वंशजों में से अपने आपको टीपू सुल्तान के परिवार का मुखिया कहे जाने वाले ‘सुल्तान’ को जयन्ती समारोह में आमंत्रित कर सम्मानित करने की घोषणा भी की। इसका सबसे पहले पहला और बड़ा विरोध वर्तमान मैसूर इलाके के कोडवा समुदाय के लोगों ने किया। इसके साथ ही यहां रहने वाले अय्यंगार पंडितों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में सबसे अधिक अत्याचार उन पर किए थे तथा उनके पूर्वजों को मुसलमान बनने पर मजबूर किया था। इस इलाके के अय्यंगार पंडित दिवाली से एक दिन पहले राज्य में मनाई जाने वाली नरका चतुर्दशी के दिन अपने उन 800 पूर्वजों को याद करके उनकी पूजा करते हैं जिन्हें टीपू सुलतान के आदेश पर इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया था, क्योंकि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था।

प्रमुख विपक्षी साल बीजेपी भी इसका विरोध करने के लिए सड़कों पर उत्तर आई। इसके नेताओं का कहना था कि राज्य की कांग्रेस सरकार प्रदेश के मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए टीपू सुल्तान का महिमामंडन करने में लगी है। पार्टी ने टीपू जयन्ती के दिन विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा कर दी। कोड़वा बहुल क्षेत्र में समारोह के दिन हिंसक घटनाएं हुईं जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु भी हो गई। इन विरोधों के बावजूद कांग्रेस सरकार ने 2016 और 2017 में टीपू जयन्ती का आयोजन किया। 2018 जब कांगेस और जनता दल-स की मिलीजुली सरकार बनी तो तब भी ऐसे आयोजन सरकारी स्तर पर हुए। उधर बीजेपी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में ही कह दिया था कि अगर पार्टी सत्ता में आई तो टीपू सुल्तान की जयंती सरकारी तौर पर नहीं मनाई जाएगी। लगभग तीन महीने पहले जब राज्य में बीजेपी सरकार बनी और येद्द्युराप्पा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने साफ कर दिया कि इस बार सरकार टीपू जयंती, जो 10 नवम्बर को है, नहीं मनाएगी। हालांकि इसका कांग्रेस ने विरोध किया लेकिन सरकार अपने निर्णय पर अडिग रही। टीपू सुल्तान को लेकर बड़ा विवाद उस समय शुरू हुआ जब पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य में कक्षा 7 से 9 तक पढ़ाई जाने वाली पाठ्यक्रम की पुस्तकों में से टीपू सुल्तान की महिमामंडन करने वाले अंशो को हटाया जाएगा। इस बारे में सरकार की शिक्षा पाठ्यक्रम समिति अपनी 7 नवम्बर को होने वाली बैठक में फैसला कर सकती है।

वास्तव में कोडवा बहुल इलाके के बीजेपी के विधायक अप्पाचु रंजन, जो खुद इस समुदाय से है। पिछले महीने राज्य के शिक्षा मंत्री को एक पत्र लिखकर कहा था कि राज्य की स्कूली पाठ्यक्रम की पुस्तकों में से टीपू के नाम को पूरी तरह से हटा दिया जाए। शिक्षा मंत्री ने इस पत्र को विचार के लिए पाठ्यक्रम समिति को उसके विचारार्थ भेज दिया। उधर कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि 5 दिसम्बर को राज्य में विधानसभा के लिए जो 15 उप चुनाव होने वाले है। लगभग आधी सीटें मैसूर के कोडवा बहुल इलाके में आती है। बीजेपी में कोडवा समुदाय में अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए यह कवायद कर रही है। कांग्रेस नेताओं को आरोप है कि बीजेपी केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए शिक्षा से खिलवाड़ कर रही है। 
लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)