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ओपिनियन

इस तरह कब तक लड़ेंगे ?

Friday, November 01, 2019 11:25 AM
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (फाइल फोटो)

हम भगवान राम की रामलीला और भगवान कृष्ण की रासलीला मनाते-मनाते हजारों साल से, धर्म और आस्था की एक ऐसी महाभारत में फंसे हुए कि आज का लोकतंत्र भी विकास और परिवर्तन का कोई ऐसा सामाजिक-आर्थिक और न्याय का आधार नहीं बना पा रहा है कि जिससे ये कहा जा सके कि भारत में अब राजा, रंक, फकीर सभी सुख-शांति से जी रहे हैं।

साल में 365 दिन कोई न कोई दिवस मनाने और अभियान चलाने की हमारी आदत पड़ गई है और व्रत, त्यौहार, पर्व की झांकियां सजाने की कोई भी परम्परा अब हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। ये एक ऐसा सांस्कृतिक उन्माद है कि जिसमें गांव-शहर का बाजार भी मुस्करा रहा है तो खाली पेट और खाली जेब का सपना भी छटपटा रहा है तो सीमा पार से युद्ध और बुद्ध का संदेश भी आ रहा है तो लोकतंत्र के कंधों पर बैठकर राष्ट्रवाद का धर्म संगीत भी सुनाया जा रहा है। आस्था और धर्म के इस अश्वमेघ यज्ञ में हम मंगलयान और चन्द्रयान भी उड़ा रहे हैं। महात्मा गांधी को 150 साल बाद भी भुना रहे हैं तो दुनिया को खुद छठी आर्थिक महाशक्ति भी बता रहे हैं तो अमेरिका और चीन के बीच शुभ-मंगल की शहनाई भी बजा रहे हैं तो पड़ोसी पाकिस्तान को हुक्का-पानी बंद करने की आंख भी दिखा रहे हैं। अयोध्या में 500 करोड़ रुपये खर्च करके और 5 लाख दीपक जलाकर भी हमें ये पता नहीं चल रहा है कि यदि रामराज्य आ भी गया तो फिर इस कल युग में उस त्रेता युग का संविधान निर्माता कौन होगा? बहरहाल सब कुछ आस्था और कल्पनाओं के सहारे हम एक ऐसा धर्म युद्ध रच रहे हैं कि जिसमें कोई नहीं जानता कि फिर नए भारत की एकता का निर्माता कौन सरदार पटेल बनेगा? ऐसे में हजारों साल बाद भी हमारा सवाल यही है कि हमारी इस 21वीं शताब्दी की संसद और संविधान का क्या होगा? और सीता, हनुमान, लक्ष्मण, भरत और विभिषण को किन प्रदेशों का राज्य प्रमुख बनाया जाएगा? क्यों श्रीराम यदि एक यथार्थ है तो फिर ये लोकतंत्र भी एक यथार्थ है और आस्था का सुरमा अब 135 करोड़ भारत के देवी-देवताओं की आंखों में धर्म के नाम पर अब कौन और क्यों लगा रहा है? नए भारत की राजनीति करने वालों को अब ये बताना चाहिए कि आखिर हजारों साल बाद भी क्या हम धर्म और आस्था के नाम पर ही अपने विकास और परिवर्तन का रोड मैप बनाना चाहते हैं या फिर आज के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ की चुनौतियों से जूझना चाहते हैं। क्योंकि फैजाबाद और अयोध्या तो राष्ट्रीय एकता का पहला प्रश्न है और इसके बाद भारी विजय- संकल्प यात्रा का अगला प्रश्न क्या होगा- ये भी हमें दिखाई देता है। क्योंकि भारत भूमि पर तुलसीदास, कबीरदास और सूरदास का भक्ति संगीत गंगा-यमुना और सरस्वती की तरह एक ही दिशा में हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक बहता है। ये समय है कि  जब हम समझें कि जिस तरह से एक राजा राम, हजारों साल से एक भगवान के रूप में आस्था और धर्म बना दिए गए हैं उसी तरह यहां लोकतंत्र की खोज का विश्वास भी इस तरह नूतन और पुरातन भारत की एकता का अमरगान है। विज्ञान और ज्ञान-प्रज्ञान के युग में भारत की खोज का ये महाअभियान ही हमें बताता है कि इस पृथ्वी पर मनुष्य और प्रकृति पहले आए हैं और धर्म और देवी-देवता और आस्था और काल्पनिक अंध विश्वास बाद में ही मनुष्य ने बनाए हैं। श्रीराम और अयोध्या से पहले भी इस पृथ्वी पर कई भगवान हमने खोजे हैं और अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की हमारी ये सनातन रथ यात्रा कोई पांच हजार साल की विकास की संस्कृति को बनाती है। ऐसे में भारत की पहचान कोई हिन्दू-मुसलमान की पहचान नहीं है, अपितु एक विश्व मानवता की वैदिक प्रस्तावना है। आप कभी ये सत्य भी जान लें कि हमारे वेद-पुराण और उपनिषदों में कहीं एक बार भी हिन्दू और राष्ट्रवाद तथा मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई जैसा कोई शब्द तक नहीं है। इस तरह हमारे मन में भय, भाग्य और भगवान को लेकर ही आस्था और आत्म सुरक्षा और धर्म, जाति के सुरक्षा कवच बनाए गए हैं और ये सब अज्ञान के अंधा युग की पहचान है। लेकिन अब जब हम राम कृष्ण के दौर से आगे बढ़कर जश्न-विज्ञान और प्रज्ञान के लोकतंत्र में आए हैं तो हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि सुर-असुर संग्र्राम के बाद भी राम-रावण और कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ है। हमने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का भीषण दौर भी देखा है और भगवान महावीर और बुद्ध हुआ है। हमने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का भीषण दौर भी देखा है और भगवान महावीर और बुद्ध को भी खोजा है और अभी-अभी स्वतंत्रता का महासमर जीतकर महात्मा गांधी के प्रार्थना प्रवचन सुने हैं। अत: आस्था के और धर्म-आडम्बर और बहुमत और अल्पमत के मखौटे लगाकर हमें 21वीं शताब्दी में लोकतंत्र और संविधान की आधारशिला को तोड़ने का कोई अधिकार नहीं है। ये समय ज्ञान-विज्ञान की और विकास की हमारी नई चुनौतियों को सुलझाने का अवसर है। अपने बीते हुए इतिहास का अब एक ही गीता संदेश हमें दोहराना जरूरी है कि मनुष्य को आस्था और धर्म-जाति की बेड़ियों से मुक्त करो और एकता तथा सहिष्णुता को भारत की पहचान बनाओ। आज सरदार पटेल का जन्म दिन और इंदिरा गांधी का बलिदान दिवस मनाने वाले नए भारत को अब ये दीवार पर लिखा सच भी पढ़ना होगा कि लोकतंत्र ही अब हमारी पहली और अंतिम आस्था है- क्योंकि रामलीला और रासलीला तो दोनों ही अब एक राजनीति का हथियार बन गए हैं।

- वेदव्यास, (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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