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उत्तरप्रदेश के इस शहर में रावण को देखा जाता है संकट मोचक की भूमिका में

Saturday, October 05, 2019 14:55 PM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

इटावा। देश भर में आयोजित रामलीलाओं में खलनायक की भूमिका में नजर आने वाला रावण उत्तर प्रदेश के इटावा के जसवंतनगर में संकट मोचक की भूमिका में पूजा जाता है। यहां रामलीला के समापन में रावण के पुतले को दहन करने के बजाय उसकी लकड़ियों को घर ले जा कर रखा जाता है ताकि साल भर उनके घर में विघ्न या कोई बाधा उत्पन्न न हो सके। जसवंतनगर की रामलीला पर पुस्तक लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार वेद्रवत गुप्ता ने बताया कि यहां रावण की ना केवल पूजा की जाती है बल्कि पूरे शहर भर में रावण की आरती उतारी जाती है, इतना ही नही रावण के पुतले को जलाया नहीं जाता है। लोग पुतले की लकडियो को अपने अपने घरों में ले जाकर रखते है ताकि वे साल भर हर संकट से दूर रह सके। कुल मिला कर रावण यहां संकट मोचक की भूमिका निभाता चला आया है। जसवंतनगर में आज तक रामलीला के वक्त भारी हुजुम के बावजूद भी कोई फसाद ना होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

साल 2010 मे यूनेस्को की ओर से रामलीलाओं के बारे जारी की गई रिपोर्ट में इस विलक्षण रामलीला को जगह दी जा चुकी है। करीब 164 साल से हर साल मनाई जाने वाली इस रामलीला का आयोजन दक्षिण भारतीय तर्ज पर मुखौटा लगाकर खुले मैदान मे किया जाता है। शोधार्थी इंद्रानी रामप्रसाद करीब 400 से अधिक रामलीलाओ पर शोध कर चुकी है लेकिन उनको जसवंतनगर जैसी होने वाली रामलीला कहीं पर भी देखने को नहीं मिली है। यहां की रामलीला में रावण की आरती उतारी जाती है और उसकी पूजा होती है। हालांकि ये परंपरा दक्षिण भारत की है लेकिन फिर भी उत्तर भारत के कस्बे जसवंतनगर ने इसे खुद में क्यों समेटा हुआ है ये अपने आप में एक अनोखा प्रश्न है। जानकार बताते है कि रामलीला की शुरुआत यहां 1855 मे हुई थी, लेकिन 1857 के गदर ने इसको रोका दिया और फिर 1859 से यह लगातार जारी है।

यहां रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण ताम्बे, पीतल और लोह धातु से निर्मित मुखौटे पहन कर मैदान में लीलाएं करते हैं। शिव जी के त्रिपुंड का टीका भी इनके चेहरे पर लगा हुआ होता है। जसवंतनगर के रामलीला मैदान में रावण का लगभग 15 फुट ऊंचा पुतला नवरात्रि की सप्तमी को लग जाता है। दशहरे वाले दिन जब रावण अपनी सेना के साथ युद्ध करने को निकलता है तब यहां उसकी धूप-कपूर से आरती होती है और जय-जयकार भी होती है। दशहरा के दिन शाम से ही राम और रावण के बीच युद्ध शुरू हो जाता है जो कि डोलों पर सवार होकर लड़ा जाता है। रात दस बजे के आसपास पंचक मुहूर्त में रावण के स्वरुप का वध होता है और पुतला नीचे गिर जाता है। जसवंतनगर की रामलीला में लंकापति रावण के वध के बाद पुतले का दहन नहीं होता है, बल्कि उस पर पत्थर बरसा कर और लाठियों से पीटकर धराशायी कर देते हैं। इसके बाद रावण के पुतले की लकड़ियां बीन कर घरों में ले जाकर रखते हैं। लोगों की मान्यता है कि इस लकड़ी को घर में रखने से धन में बरक्कत होती है। दूसरी खास बात यह है कि यहां रावण की तेरहवीं भी मनाई जाती है, जिसमें कस्बे के लोगों को आमंत्रित किया जाता है।

विश्व धरोहर में शामिल और भाव भंगिमाओं के साथ प्रदर्शित होने वाली देश की एकमात्र अनूठी रामलीला में कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले मुखौटे प्राचीन तथा देखने में अत्यंत आकर्षक प्रतीत होते हैं। इनमें रावण का मुखौटा सबसे बड़ा होता है तथा उसमें 10 सिर जुड़े होते हैं। ये मुखौटे विभिन्न धातुओं के बने होते हैं तथा इन्हें लगा कर पात्र मैदान में युद्ध लीला का प्रदर्शन करते है। इनकी विशेष बात यह है कि इन्हें धातुओं से निर्मित किया गया है तथा इनको प्राकृतिक रंगों से रंगा गया है। सैकड़ों वर्षों बाद भी इनकी चमक लोगों को आकर्षित करती है ।

समिति के प्रबंधक का कहना है कि यहां की रामलीला पहले सिर्फ दिन में हुआ करती है लेकिन जैसे प्रकाश का इंतजाम बेहतर होता गया तो इसको रात को भी कराया जाने लगा है। यह हमारे के लिए सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि यहं की रामलीला को यूनेस्को की रिपोर्ट में जगह मिली हुई है। उनके पूर्वज सौराष्ट्र के रहने वाले थे लेकिन आजादी से पहले आए संकट के चलते भाग कर यहां तक पहुंचे और फिर यही के हो लिए। जिसके बाद रामलीला की शुरूआत हुई। रामलीला समिति के सह प्रबंधक का कहना है कि यहां की रामलीला अनोखी इसलिए होती है क्योंकि रामलीला का प्रर्दशन खुले मैदान मे होता है। दक्षिण भारतीय शैली में हो रही इस रामलीला में असल पात्रों को बनाए जाने के लिए उनके पास पूरे परंपरागत कपड़े और मुखौटों के अलावा पूरे शस्त्र देखने के लिए मिलते है।

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