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मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में भी महिलाओं में बढ़ रहा करवाचौथ का आकर्षण

Wednesday, October 16, 2019 16:30 PM
कॉन्सेप्ट फोटो।

प्रयागराज। पति की दीर्घायु के लिये सदियों से मनाये जा रहे पर्व 'करवा चौथ' का आकर्षण आधुनिकता के इस दौर में भी फीका नहीं पड़ा है बल्कि जीवन संगिनी का इस व्रत में साथ निभाने वाले लोगों की तादाद हाल के वर्षो में तेजी से बढ़ी है। सुहागिन स्त्रियां पति की दीर्घायु के लिए श्रद्धा एवं विश्वास के साथ गुरूवार को करवा चौथ का व्रत रखेंगी। बदलते दौर में पत्नियों के साथ पति भी अपने सफल दाम्पत्य जीवन के लिए करवा चौथ व्रत का पालन करने लगे हैं।

मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में 'करवा चौथ' के प्रति महिलाओं में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आई बल्कि इसमें और आकर्षण बढ़ा है। टीवी धारावाहिकों और फिल्मों से इसको अधिक बल मिला है। करवा चौथ भावना के अलावा रचनात्मकता, कुछ-कुछ प्रदर्शन और आधुनिकता का भी पर्याय बन चुका है।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चौथ पर्व पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा से दमक और महक रहा है। आधुनिक होता दौर भी इस परंपरा को डिगा नहीं सका है बल्कि इसमें अब ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।     

वन अनुसंधान केन्द्र प्रयागराज की वरिष्ठ वैज्ञानिक कुमुद दुबे ने बताया कि द्वापर युग से लेकर आज कलियुग के 5 हजार से अधिक वर्ष बीत जाने पर भी यह पर्व उतनी ही आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है, जैसे द्वापर युग में मनाया जाता था। करवा चौथ व्रत की महत्ता ना केवल महिलाओं के लिए पुरूषों के लिए भी है। वह इस व्रत को पिछले कई सालों से कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पति और पत्नि गृहस्थी रूपी रथ के दो पहिए हैं। किसी एक के भी बिखरने से पूरी गृहस्थी टूट जाती है। ये सबसे कठिन व्रत में से एक माना जाता है।

इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं और छलनी से चंद्रमा को देखती हैं और फिर पति का चेहरा देखकर उनके हाथों से जल ग्रहण कर अपना व्रत पूरा करती हैं। इस व्रत में चन्द्रमा को छलनी में देखने का विधान इस बात की ओर इंगित करता है, पति-पत्नी एक दूसरे के दोष को छानकार सिर्फ गुणों को देखें, जिससे दाम्पत्य के रिश्ते प्यार और विश्वास की डोर से मजबूती के साथ बंधा रहे।

दुबे ने बताया कि पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश हो चुका है और अब यह त्योहार भावनाओं पर केंद्रित हो गया है। हमारे समाज की यही खासियत है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश लगातार करते रहते हैं। यह पर्व पति-पत्नी तक ही सीमित नहीं हैं। दोनों चूंकि गृहस्थी रुपी गाड़ी के दो पहिए है। निष्ठा की धुरी से जुड़े हैं इसलिए संबंधों में प्रगाढता के लिए दोनों ही व्रत करते हैं।       

करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, 'करवा' यानी 'मिट्टी का बरतन' और 'चौथ' यानि 'चतुर्थी'। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना करने का विधान है। माना जाता है करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है।     

वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि बदलाव आधुनिकता का जरूर है लेकिन संस्कृति और परंपराओं के निभाने की पूरी ललक विवाहिताओं में साफ दिखाई दे रही है। आजकल के मॉडर्न जमाने में भी करवा चौथ त्योहार मनाने को लेकर पीढ़ी अंतराल के बावजूद कोई खास बदलाव नहीं आया है। रिश्तों और पुरानी परंपराओं को सहेजने में नई पीढ़ी भी कोर कसर नहीं छोड़ रही है। भारतवंशियों की भागीदारी से त्याग, आस्था, प्रेम और आपसी विश्वास का यह व्रत विश्व के कई देशों में पहुंच चुका है। करवा चौथ पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत अन्य कई प्रदेशों में मनाया जाता है। इसके अलावा इस व्रत को स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको व्रत करने का अधिकार है।

गौरतलब है कि करवा चौथ का व्रत कब से शुरू हुआ इसके बारे में सही-सही कोई प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन शास्त्रों, पुराणों, महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म्य पर कई कथाओं का वर्णन मिलता है। मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ की यह कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय हासिल की। 

एक अन्य पौराणिक कथा सावित्री और सत्यवान की है। जिसमें यमराज सावित्री के पति के प्राणों को ले जाते हैं और सावित्री उनके पीछे-पीछे पति के प्राणों की भीख मांगते और करूण क्रदंन करते हुए जाती हैं। सावित्री के विलाप से विचलित हो यमराज ने उन्हें सत्यवान के जीवन को छोड़कर कुछ भी मांगने का वचन देते हैं। सावित्री ने यमराज से पुत्रवती होने का आर्शीवाद मांग लिया और यमराज ने तथास्तु कह दिया। इस पर सावित्री ने यमराज से पूछा जब आप मेरे पति के प्राणों को ले जा रहे हैं तब मैं पुत्रवती कैसे हो सकती हूं। वचन में बंधने के कारण यमराज ने सत्यवान के प्राणों को वापस लौटा दिया। कहा जाता है तभी से स्त्रियां अन्न और जल का त्यागकर पति की लम्बी आयु के लिए इस व्रत को करती हैं।       

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार देवताओं और असुरों में युद्ध छिड़ गया। असुर देवताओं पर भारी पड़ रहे थे। देवताओं को असुरों को हराने का उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। सभी देवता असुरों को हराने के लिए ब्रह्मा जी के पास गए। उन्होने देवताओं से कहा कि वे अपनी-अपनी पत्नियों से कहें अपने पति की मंगल कामना और असुरों पर विजय के लिए उपवास करें। इससे निश्चित ही देवताओं की विजय होगी। इसके बाद जब देवियों ने यह व्रत किया, जिससे देवताओं की असुरों पर जीत हुई।