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करवाचौथ के व्रत का सावित्री और द्रौपदी से है खास जुड़ाव

Sunday, October 13, 2019 18:40 PM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

जयपुर। करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह पर्व सुहागिन स्त्रियां मनाती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। यह व्रत 12 वर्ष तक व 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियां आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नहीं है। अतः सुहागिन स्त्रियां अपने सुहाग की रक्षार्थ इस व्रत का सतत पालन करें।

ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी औरतें करवाचौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन करना चाहिए। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की अर्चना की जाती है। करवाचौथ में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।

 

अखंड सौभाग्य के प्रतीक करवाचौथ के व्रत से पति-पत्नी के संबंध भी गहरे होते हैं

सुहागिन महिलाओं को करवाचौथ का इंतजार होता है क्योंकि यह व्रत बेहद खास माना जाता है। इस बार 17 अक्टूबर (गुरुवार) को महिलाओं का महापर्व करवाचौथ है। करवाचौथ का व्रत न सिर्फ महिलाओं के अखंड सौभाग्य का प्रतीक है बल्कि इससे पति-पत्नी के संबंध भी गहरे होते हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति के सौभाग्य, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए व्रत करती हैं। ये व्रत निर्जला होता है यानी इस दिन महिलाएं पानी भी नहीं पीती हैं। चतुर्थी पर रात में चौथ माता की पूजा की जाती है और चंद्रोदय के बाद चंद्र को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद ही महिलाएं भोजन करती हैं।

करवाचौथ की सबसे पहले शुरुआत प्राचीन काल में सावित्री की पतिव्रता धर्म से हुई। सावित्री ने अपने पति की मृत्यु हो जाने पर भी यमराज को उन्हें अपने साथ नहीं ले जाने दिया और दृढ़ प्रतिज्ञा से अपने पति को फिर से जीवित कराया। दूसरी कहानी पांडवों की पत्नी द्रौपदी की है। वनवास काल में अर्जुन तपस्या करने नीलगिरि के पर्वत पर चले गए थे। द्रौपदी ने अर्जुन की जान बचाने के लिए अपने भाई भगवान कृष्ण से मदद मांगी। उन्होंने पति की रक्षा के लिए द्रौपदी से वैसा ही उपवास रखने को कहा जैसा माता पार्वती ने भगवान शिव की रक्षा के लिए रखा था। द्रौपदी ने ऐसा ही किया और कुछ समय के बाद अर्जुन वापस सुरक्षित लौट आए।