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राजस्थान

#TeachersDay: शिक्षक ने बदल दी जिंदगी

Thursday, September 05, 2019 12:25 PM
शिष्य और उनके शिक्षक।

कोटा। 'दिया ज्ञान का भंडार हमें, किया भविष्य के लिए तैयार हमें। हैं आभारी उन गुरुओं के हम, जो किया कृतज्ञ अपार हमें।' आज शिक्षक दिवस यानि टीचर्स-डे है। हर स्कूल, कॉलेज और शैक्षिक संस्थानों में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। एक गुरु के लिए और एक विद्यार्थी के लिए शिक्षक दिवस का बहुत अधिक महत्व होता है। ये तो सभी जानते हैं कि गुरू अपने शिष्य को सही मार्ग पर चलने का रास्ते दिखाते हैं। गुरु -शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का एक अहम् हिस्सा रही है। कहा जाता है कि जीवन में सबसे पहले गुरु  हमारे माता-पिता होते हैं। लेकिन जीने का असली सलीका हमें शिक्षक ही सिखाते हैं। शहर में कुछ ऐसे ही शिक्षक हैं जिन्होंने शिक्षा के माध्यम से अपने शिष्यों की जिंदगी बदल दी। जीवन में एक सफल मुकाम हासिल कर चुके कुछ लोग आज भी अपने उन शिक्षकों को याद करते नहीं थकते जिनकी वजह से उनकी जिंदगी को नया मोड़ मिला।

 
अज्ञान को मिटा कर, ज्ञान का दीपक जलाया है। गुरु कृपा से मैंने, ये अनमोल शिक्षा पाई है। शिक्षक दिवस के अवसर पर दैनिक नवज्योति ने ऐसे ही कुछ सफल शिष्यों से जाना कि किस तरह उनके शिक्षक ने उनकी जिंदगी बदल दी।
 
एमबी इंटरनेशनल स्कूल के एमडी दिनेश विजय का कहना है हमारे गुरु ने हमें तीन बातें सिखाई। ईमानदारी, इंसानियत रखो और अनुशासन। इन तीनों बातों को लेकर अब तक के सफर में काम किया। लोगों का विश्वास जीता और आगे बढ़ते गए। जो अपने गुरु से सीखा शिक्षा, संस्कार और अनुशासन वहीं हम अपने बच्चों को भी प्रदान कर रहे हैं। व्यक्तिगत कार्य व्यवहार में भी ईमानदारी, इंसानियत और अनुशासन रखते है।
 
डीएवी पब्लिक स्कूल की प्रिंसीपल सरिता रंजन का कहना है अपनी शिक्षिका से प्रेरित होकर ही आज मैं भी शिक्षिका हूं। कॉन्वेंट स्कूल से शिक्षा ग्र्रहण की। जब सातवीं क्लास में थी, तभी निश्चय कर लिया था कि मैं टीचर बनूंगी। मैंने अपनी शिक्षिकाओं को देखा और महसूस किया कि स्कूल टीचर बनना एक नोबल प्रोफेशन है। आप एक साथ कितने बच्चों का भला कर सकते हो। उनका जीवन संवार सकते हो। बच्चे इनोसेंट होते है। यह भविष्य बदल सकते हैं देश का। मेरी दो शिक्षिकाओं से मैं बहुत प्रभावित थी। एक ज्योग्र्राफी की मिस मैकडोनल्ड और हिंदी की मेहता मैडम। यह मेरी आइडियल रही है। हिन्दी की टीचर 8वीं क्लास में मेरी क्लास टीचर थी। दिल से वह बच्चों से बहुत स्नेह करती थी। एक दिन अनाउंस हुआ कि वह रिजाइन कर रही है। हमें समझ नहीं आया कि वह क्यों कर रही है। रिजाइन से पहले उन्होंने पूरी क्लास को अपने घर लंच पर बुलाया। पूरी क्लास तो नहीं गई पर कुछ बच्चे गए। वहां उन्होंने हमें अपनी बेटी से मिलवाया। उनकी एक ही बेटी और वह भी स्पास्टिक थी। तब हमें उनके रिजाइन करने का कारण समझ में आया। अपने घर में ऐसा बच्चा होने के बाद वह हमें इतना प्यार देती थी। वह मेरी जिंदगी की सर्वश्रेष्ठ टीचर है। दूसरी मिस मैकडोनल्ड जिनकी वजह से मैंने अंग्र्रेजी विषय लिया। उन्होंने मेरी राइटिंग में देखा और क्रिएटिविटी डवलप की।
 
सुधा हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ.आर.के. अग्रवाल का कहना है एक स्टूडेंट अपने टीचर से बहुत कुछ सीखता है। मेरी पृष्ठभूमि गांव की रही है। अपने शिक्षक की काफी चीजें फॉलो करते थे । जो भी वह कहते थे उसी को व्यवहार में लाते। उसी से ही इम्प्रूवमेंट आया। बहुत कुछ टीचर से सीखा है। आठवीं में था जब मेरे गांव के टीचर ने मेरे पिताजी को कहा कि यह पढ़ाई में बहुत अच्छा है। मुझे वह टीचर एप्रीशिएट करते थे। उन्होंने कहा इसे मेडिकल के क्षेत्र में भेजे। उन्होंने ही मेरे पिता को प्रेरित किया मुझे मेडिकल में भेजने के लिए। उन्होंने ही गाइड किया। वह मेरे जीवन का नया मोड़ था। उन्हीं शिक्षक की प्रेरणा से मैं डॉक्टर बना।
 
मेहता डेंटल केयर की डेंटिस्ट डॉ. रिद्घि मेहता का कहना है मेरे जीवन में दो लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है। पहली मेरी मां जिन्होंने जीवन में मार्गदर्शन किया। आज डॉक्टर  मां की वजह से हूं। उन्होंने मुझे प्रेरित किया। दूसरे, मेरे फिजिक्स के टीचर। जब मैं कोचिंग में थी। मेरी साइंस कमजोर थी। फिजिक्स में मां को बहुत चिंता होती थी। कोचिंग में ही फिजिक्स के टीचर थे। एक-डेढ़ माह क्रेश कोर्स किया। उन टीचर ने मुझे पढ़ाया और बहुत अच्छे से विषय को समझाया। फिजिक्स में इतनी अच्छी गाइडेंस में विषय मेरा स्ट्रांग हुआ। उन्हीं के गाइडेंस में ही एक-डेढ़ माह में ही विषय संबन्धी मेरी जो भी कमी थी वह दूर हो गई।
 
कंट्रोलर आॅफ डिफेंस अकाउन्ट सिकंदराबाद में  डिप्टी कंट्रोलर प्रेमसागर मीणा बताते है बहुत ही साधारण परिवार से हूं।  पीपल्दा तहसील के छोटे से गांव में मेरे माता-पिता, दादाजी  रहते है।  वह किसान है। पिता आठवीं कक्षा तक पढ़े हुए हैं। शिक्षक उमेशचंद शर्मा जिन्हें मैं गुरुजी कह कर संबोधित करता हूं। अभी वह महात्मा गांधी स्कूल रामपुरा में प्रिंसिपल है। उस समय वह पीपल्दा में विज्ञान के अध्यापक थे। पांचवीं तक की शिक्षा मेरी गांव के स्कूल में ही हुई। उसके बाद पीपल्दा में आगे की पढ़ाई के लिए गया। वहीं गुरुजी से संपर्क हुआ। पढ़ने में मेरी रुचि थी। गुरूजी ने भी मोटिवेट किया। जब मैं सातवीं कक्षा में आया तब उन्होंने कहा कि आगे की पढ़ाई के लिए कोटा रखेंगे वहीं रहकर शिक्षा प्राप्त करना। घर में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं था। परिवार वालों की सोच भी ऐसी नहीं थी कि गांव से बाहर शहर में पढ़ने के लिए भेजें। लेकिन मेरे परिवार को गुरुजी पर विश्वास था। उन्होंने कहा गुरुजी से कि आप जैसा उचित समझे वह करें। वह मुझे कोटा लेकर आए और अपनी बहन के घर में उन्होंने रखा। यहां रहकर मैंने 12वीं तक शिक्षा प्राप्त की। 12वीं मैंने मल्टीपरपज स्कूल से की। गुरुजी  मोटिवेट करते रहते थे। उन्होंने आईआईटी के लिए मोटिवेट किया।  गुरूजी के मार्गदर्शन में आईआईटी जेईई परीक्षा की तैयारी की। मेरा पढ़ा-लिखा परिवार होता तो मुझे गाइड करता, लेकिन ऐसा नहीं था। गुरुजी जो रास्ता बताते गए उस पर चलते रहे। मेरा आईआईटी मुंबई में सलेक्शन हो गया और वर्ष 2007 में वहां से बी.टेक पास आउट किया। कैम्पस सलेक्शन से आईओसीएल में अच्छी जॉब लग गई। आईआईटी में स्कॉलरशिप मिलती थी। बाकी पढ़ाई का खर्चा मेरे परिवार ने ही उठाया। जॉब भी अच्छा था लेकिन गुरुजी का मानस था मैं आईएएस की तैयारी करूं। उन्होंने कहा यह तुम्हारी मंजिल नहीं है। तुमको आगे तक जाना है। चाहे तुम्हें नौकरी छोड़नी पड़े तो छोड़ो। मैंने नौकरी छोड़कर दिल्ली जाकर आईएएस की तैयारी की। गुरुजी का पूरा मार्गदर्शन मिला। मैं वर्ष 2012 बैंच का आॅफिसर हूं। वर्ष 2015 से कंट्रोलर आॅफ डिफेंस अकाउंट सिकंदराबाद में कार्यरत् हूं। गुरूजी के बारे में शब्दों में बयान करना मुश्किल है। ऐसे गुरु सभी को मिले। वह सिर्फ गुरुजी  ही नहीं है। बल्कि कुलगुरू की तरह है। उन्होंने उस स्तर पर मुझे पहुंचाया जहां पहुंचने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।  मेरी पत्नी भी सिविल सर्विस में है। गुरुजी से अभी भी निरंतर संपर्क है आज भी कोई भी सलाह लेनी हो उन्हीं से लेते है। भगवान का शुक्रगुजार हूं कि ऐसे गुरू मिले जिन्होंने जीवन ही बदल दिया। 
 
भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, वैमानिक संचार केन्द्र प्रतापगढ़ में वरिष्ठ प्रबंधक परसराम बताते है पीपल्दा तहसील के चखखेड़ली गांव का रहने वाला हूं। छोटी क्लास तक शिक्षा गांव के ही स्कूल में हुई। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए पीपल्दा आया। नवीं कक्षा में पीपल्दा के सरकारी स्कूल में था। वहीं गुरुजी उमेशचन्द शर्मा पढ़ाते थे। क्लास में ही उनसे इंटरेक्शन हुआ। वह समय के पाबंद थे और अच्छा पढ़ाते थे। वह विज्ञान के अध्यापक थे। मेरे घर में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था। पिताजी 8वीं-9वीं तक पढ़े थे  गुरुजी पढ़ाई में पूरी मदद करते। जब 11वीं में था तब वह कोटा ले आए। यहां मकान दिलाया वहां रहकर पढ़ा। 11वीं में यह समझ नहीं थी कि क्या विषय लिया जाए। उस समय गुरुजी का गाइडेंस बहुत महत्वपूर्ण रहा।  11वीं में मल्टीपरपज में उन्होंने एडमिशन करवाया और गणित विषय लेने के लिए गाइड किया। 12वीं कक्षा में आया तब कहां और किस जगह से कोचिंग करनी है उसके लिए मार्गदर्शन किया।12वीं के बाद मुझे बहुत लोगों ने कहा एसटीसी कर लो। लेकिन गुरुजी  ने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग दिलवाई। यह वर्ष 1998 की बात है। उस समय पीईटी में राजस्थान में मेरा तीसरा नंबर था। उस समय आईआईटी मुंबई में भी मेरा चयन हुआ। काउंसलिंग करके आया वहां भी एडमिशन मिल गया, लेकिन घर के लोगों ने नहीं भेजा। गुरुजी ने परिवार के लोगों को बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वहां नहीं जा सका। फिर जयपुर से मालवीया इंजीनियरिंग कॉलेज से बीई इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्यूनिकेशन में वर्ष 2002 में किया। बीई के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। रेलवे आदि में भी चयन हुआ। फिर मैंने भारतीय विमान प्राधिकरण की परीक्षा दी उसमें पास हो गया और दिल्ली में इन्टरव्यू था वहां मेरा चयन हो गया। मेरा कम्यूनिकेशन नेवीगेशन टेक्नीकल जॉब है। पहली पोस्टिंग  अमृतसर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुई।  उसके बाद अहमदाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कार्य किया। वर्तमान में प्रतापगढ़ (राजस्थान) में पोस्टिंग है कम्यूनिकेशन विभाग है। एक विद्यार्थी को आगे क्या करना है कैसे करना है इसकी सही गाइडेंस मिल जाए तो वह तरक्की करता है। गुरुजी का मार्गदर्शन पूरे समय रहा। अभी महात्मा गांधी स्कूल रामपुरा कोटा में वह प्रिंसिपल है। उनसे अभी भी संपर्क है। गुरु-शिष्य का रिश्ता ऐसा है यदि गुरु गाइड करें और शिष्य भी उनके बताए रास्ते पर चले तो  आगे बढ़ना निश्चित है। आज के परिवेश में ऐसे गुरु का मिलना मुश्किल है। मां के बाद बालक स्कूल में गुरु के संपर्क में जाता है और वहीं से उसे ज्ञान प्राप्त होता है। गुरुजी की वजह से ही इंजीनियरिंग की। 
 
स्टेटिस्टिकल डाटा ऐनेलिसिस्ट आशुतोष कुमार कहते है टीचिंग का घर में पूरा माहौल था। पापा साइंटिस्ट रहे हैं। मेरे रोल मॉडल तो पिता ही रहे है। लेकिन लाइफ में जैसे-जैसे आगे बढ़ा कुछ लोग इस तरह से जुड़ गए कि उन्होंने जिंदगी के कई मोड़ पर  मेरे गुरु बनकर शिक्षित किया। वर्ष 2002 में जब एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था तब वहां मेरे प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर विशाल कुलश्रेष्ठ थे। उन्हें मैं अपना गुरु मानता हूं। मैं शुरू से ही बहुत ही अंतर्मुखी रहा हूं। वर्ष 2002 और 2003 से पहले मेरे अंदर कॉन्फिडेंस नहीं था। उन्होंने मुझमें सॉफ्ट स्किल, टेक्नो स्किब्स डाले। उन्होंने मुझे गाइड किया और मेरा नेचर बहिर्मुखी (एक्सट्रोवर्ट) बनाया। उन्हीं की वजह से मैं आज कॉन्फिडेन्स से बात कर रहा हूं। वो नहीं होते तो मैं एक्सट्रोवर्ट नहीं होता। पब्लिक स्पीकिंग और मास कम्यूनिकेशन कर पाया हूं। दूसरे गुरु डॉ. गुरुदत्त कक्कड़ है। टीचिंग प्रोफेशन में मुझे लाने का श्रेय उन्हें जाता है। उन्होंने मुझे ब्रेक दिया। उनसे मैंने टीचिंग सीखी, कैसे पढ़ना है और कैसे पढ़ाना चाहिए। मैं पीएचडी स्कॉलर्स की कक्षाएं लेता हूं। स्वयं भी पीएचडी कर रहा हूं। अभी मैं जिस लेवल के सॉफ्टवेयर पर काम कर रहा हूं उस पर राजस्थान में कोई काम नहीं कर रहा है। राजस्थान में स्टेटिस्टिकल डाटा एनिलिसिस्ट मैं ही हूं। मेरे पिता अब नहीं है। पिता के बाद मेरे गुरु कक्कड़ सर है। मैं जब भी कोई काम करता हूं तो उनको कंसल्ट करता हूं। उन्होंने मुझे जिंदगी जीना सिखाया। 
 
जम्मू एंड कश्मीर में बीएसएफ कमांडेंट संदीप खत्री बताते है मेरे पिताजी राजकीय महाविद्यालय कोटा में प्रिंसीपल थे। गुरु संजय चावला उस समय कॉलेज में पढ़ते थे।  बाद में वह लेक्चरर हो गए। वर्तमान में वह संस्कृत महाविद्यालय कोटा में इंग्लिश के लेक्चरर है। मैंने उनसे कॉम्पटीटिव इंग्लिश सीखी। वर्ष 1994 में पैरा मिलिट्री फोर्स की परीक्षा दी थी। उस समय सौ मार्क्स का इंग्लिश का पेपर था। उस समय इंग्लिश बहुत कठिन आती थी। गुरु संजय चावला ने मुझे गाइडेंस दिया। जब मेरी परीक्षा थी उससे एक-दो दिन पहले उन्होंने मुझसे कहा कि एनवायरमेंट पॉल्यूशन भी पढ़ लो। करंट विषय है। सौ अंक का निबंध लिखने को आता था। उन्होंने कहा शायद यह भी आ जाए इसे पढ़ लो और परीक्षा में उसी विषय पर लिखने को आया। मैंने परीक्षा में अच्छा स्कोर किया और सीधे ही गजेटेड अधिकारी की जॉब मिली। बीएसएफ ज्वाइन किया। गुरु संजय का अपने विषय पर होल्ड है वह इतना ज्यादा टच में चीजों के रहते है कि पेपर वगैरह में क्या आ सकता है क्या नहीं आ सकता इस पर पकड़ बहुत अच्छी है। उन्हें पता लग जाता है कि स्टूडेंट की कमजोरी क्या है, फिर वह उसी डायरेक्शन में गाइड करते है। वह तब तक स्टूडेंट को नहीं छोड़ते जब तक वह सीख ना लें। उनके स्टूडेंट के प्रति प्रयास जनरेशन व सोसायटी को चेंज करते है। बच्चे की कॉम्पटीटिव वीकनेस क्या है यह मालूम करके उसे गाइड करके सोसायटी के लिए काम कर रहे है वह अनमोल है। उनसे संपर्क आज भी है।
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