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राजस्थान

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस: हौसलों को सलाम, हर इंसान के लिए प्रेरणा है इनके संघर्ष की कहानी

Tuesday, December 03, 2019 10:25 AM
हुनरमंद दिव्यांग

कोटा। जीवन जीना एक कला है और जो इस कला को जान लेता है उसे कोई भी परिस्थितियां अपने लक्ष्य से नहीं भटका सकती हैं। कुछ लोग अपनी शरीरिक अक्षमताओं के कारण जीवन को निरर्थक मान लेते हैं, लेकिन कुछ लोग होते हैं जो अपनी इन अक्षमताओं के बावजूद जिंदगी जीने की कला में इतने पारंगत हो जाते हैं कि जिंदगी भी उन्हें सलाम करती है।

भौतिकी के क्षेत्र में मशहूर वैज्ञानिक हॉकिन्स भी शारीरिक रूप से अक्षम होने के वजह से मशीन से ही सुनते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में अदभुद कार्य किया। शहर में कुछ ऐसे ही लोग हैं, जिन्होंने अपनी अक्षमता को दरकिनार करते हुए अपने साहस के दम पर जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त किया और पूरे समाज को बता दिया कि अक्षमता अभिशाप नहीं है,
नजरिया सकारात्मक हो तो अक्षमता भी वरदान लगने लगती है। इन लोगों ने साबित कर दिया की दिल में हौसले और मजबूत इरादे हों तो हर मंजिल तक पहुंचना और उसे पाना आसान हो जाता है। पंखों से उड़ान नहीं होती बल्कि हौसलों से उड़ान होती है जानिए ऐसे ही दूसरे लोगों के बारे में जिन्होंने कभी शारीरिक अक्षमता को अपने लक्ष्य के आड़े नहीं आने दिया। लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। इस कहावत को अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से चरितार्थ कर दिखाया कुछ ऐसी जिंदादिली और जीवन की खूबसूरती को बयां करती इन अद्भुत लोगों की कहानी है जो समाज के हर इंसान के लिए प्रेरणा है।

हमेशा पॉजिटिव विजन रखें
अडानी फाउंडेशन के राजस्थान में सीएसआर हैड गोपाल सिंह देवड़ा ने बताया जन्म के दो साल बाद पोलियो हो गया था। मेरे पिता फार्मर हैं। उन्होंने मुझे बहुत अच्छी शिक्षा दी। उनको मुझ पर पूरा कॉन्फीडेंस था। जब स्कूल गया तो दोस्तों ने स्कूल में बहुत मदद की और कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि मैं डिसेबल हूं। स्कूल और कॉलेज लेवल की कमेटी में लीड भी किया। बड़ौदा की महाराज सयाजी राव यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और वहीं से ही एमएसडब्ल्यू किया। सभी ने मुझे सपोर्ट किया। कैम्पस प्लेसमेंट से सलेक्शन होकर बड़ौदा में ही एक कंपनी में जॉब शुरू किया। उसके बाद वर्ष 2011 में अडानी ग्रुप में सीएसआर प्रोजेक्ट आॅफिसर के पद पर नियुक्ति हुई। अडानी ग्रुप की राजस्थान की जितनी भी सीएसआर एक्टिविटी होती है उसका हैड हूं। मैं इसका श्रेय अडानी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अडानी को देता हूं। उनके विश्वास की वजह से मैं आज यहां हूं। उन्होंने मुझ पर ट्रस्ट व कॉन्फीडेंस किया। मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी। मुझे सारे प्लेटफॉर्म दिए कि मैं अपनी क्षमता को दिखा सकूं। उन्होंने मेरी क्षमता को निखारा और एक्सप्लोर किया। मेरी क्षमता को देखते हुए रेस्पॉन्सबिलिटी देते गए। उन्होंने मुझे इंसपायर किया। मुझे जिला और राज्य स्तर पर कई अवॉर्ड मिल चुके है। कोई भी सीएसआर का प्रोग्राम होता है उसमें सीएम आदि आते है उस प्रोग्राम में मैं ही लीड करता हूं। मैं सेल्फ मोटीवेटर हूं। हमेशा पॉजिटिव साइड देखता हूं। रोने के लिए तो बहुत कुछ है लेकिन जो आपके पास है उसे डवलप कीजिए और आगे बढ़े। मैं जिस पोजीशन पर काम कर रहा हूं कई लोगों की जिंदगियां चेंज हो चुकी है। काफी चेहरों पर मुस्कान ला चुके है। मेरा विजन क्लीयर है मुझे समाज के लिए काम करना है। समस्या सबकी लाइफ में आती है, लेकिन आगे बढ़ना है। मानसिक रूप से आपको अच्छी तरह तैयार होना चाहिए। हर चीज में ओपरचुनिटी देखता हूं। मैं खुश हूं और जीवन का आनंद ले रहा हूं। जितने भी डिसेबल लोग है उनसे मैं कहता हूं कि आपकी क्षमता के अनुसार आप आगे बढ़िए आपको कोई नहीं रोकेगा। हीरा अपनी खुद कीमत नहीं कहता उसकी लोग कीमत लगाते है।

कॉन्फिडेंस लेवल बिल्डअप करें

कोटा थर्मल में अधिशासी अभियंता गोविंद सिंह राजपुरोहित ने बताया जब मैंने होश संभाला अपने को पोलियो ग्रस्त पाया। चलने में दिक्कत होती थी। गांव के बच्चों के साथ खेल नहीं सकता था। भाग- दौड़ नहीं कर सकता था। मेरे छोटा भाई और बहन प्रेरणा देते थे। हम एक ही स्कूल में पढ़ने जाते थे। उनकी मदद से मैंने स्वयं में हिम्मत पाई। जैसे-जैसे बड़ा होता गया परिपक्वता आती गई यह हिम्मत बढ़ती गई। कभी मैंने स्वयं को दिव्यांग महसूस नहीं किया। परेशानियां तो हर स्तर पर आती गई। स्कूल में कभी कोई बच्चा कटाक्ष कर देता तो टीस होती थी। नवीं, दसवीं क्लास में मेरे में भी दबंगता आ गई थी।
परिपक्वता भी आ गई थी। फिर मेरा इंजीनियरिंग में सलेक्शन हो गया और जोधपुर से इंजीनियरिंग की। मुझे मेरे बड़े भाई ने इंजीनियरिंग करवाई। उन्होंने हमेशा हौंसला बढ़ाया। मुझे मेरे पेरेन्ट्स और भाई-बहन ने संबल दिया और मैं स्ट्रांग बना। संघर्ष तो शुरू से था। लेकिन धीरे-धीरे एलाइड ग्रुप में आ गए तो सारी चीजें नेग्लेजेबल हो गई। मेंटली बहुत मजबूत हो गया। कॉलेज में मेरा एक्सीडेंट हो गया था। जो पैर मेरा सही था वह भी टूट गया था। चल फिर नहीं पा रहा था। तब मेरे दोस्त गोदी में उठाकर कॉलेज लेकर जाते थे। मैंने स्वयं को आइसोलेट नहीं किया। जॉब लगी तो वहां भी संघर्ष था। कोई भी काम करने के लिए टीम बनती तो मेरा नाम लिस्ट में नहीं पाता तो अफसरों से लड़ जाता था कि मैं किस वजह से कमजोर हूं। मेरा नाम क्यों नहीं है। कोई काम करने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। काम में मेरी दक्षता है मैंने काम पर कभी शारीरिक कमजोरी हावी नहीं होने दी। मेहनत से आगे बढ़ते हुए और आज इस पद पर पहुंच गए। स्पोर्ट्स से भी जुड़ाव है। क्रिकेट को लेकर एक संगठन बना रखा है। परेशानियों का सामना तो मेंटल, फिजिकली और डिस्क्रिमिनेशन लेवल पर करना पड़ता है। अधिकारों के लिए लड़ते थे तो कंपनी से कई बार ट्रांसफर कर दिया जाता था। ऐसे लोगों को सोसायटी की तरफ से संबल दिया जाए तो यह बच्चे अपने आप में बहुत कुछ कर सकते है। सामान्य बच्चे हो या दिव्यांग उनसे कभी यह नहीं कहे कि तुम यह काम नहीं कर सकते। उनका मनोबल टूट जाता है। उस मनोबल को बनाए रखने के लिए बच्चों के हौंसले बुलंद रखने चाहिए। कॉन्फिडेंस लेवल बिल्डअप करना बहुत बड़ी बात है। मैंने स्वयं में कॉन्फिडेंस पाया अब आत्मविश्वास बढ़ गया। आज उस लेवल पर आ गया हूं कि चीजों को ऑर्गेनाइज्ड करना आसान हो गया है।

कमजोरी को अपने पर हावी नहीं होने दें
सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग में संयुक्त निदेशक मुकेश विजय - मुकेश विजय और उनकी पत्नी संजीवनी रेड्डी दोनों ही दिव्यांग है। लेकिन आज वह दोनों अपनी जिंदगी सामान्य लोगों की तरह व्यतीत कर रहे हैं। उन्होंने अपनी अक्षमता को दरकिनारा करते हुए आत्मविश्वास के साथ सफलता की दिशा में कदम बढ़ाया। मुकेश बताते है कि उनके दोनों पैर पोलियो से ग्रस्त है। उनकी पत्नी के बाएं हाथ में पोलियो है वह सरकारी स्कूल में अंग्रेजी विषय की वरिष्ठ अध्यापिका है। मुकेश बताते है कि हर डिसेबल व्यक्ति से जीवन में संघर्ष होता है। बारह वर्ष की उम्र तक मेरी कोई शिक्षा भी नहीं हुई थी। घर में सभी पढ़े-लिखे है। घर में सभी सदस्यों व पेरेन्ट्स का पूरा सहयोग रहा। सातवीं और आठवीं की पढ़ाई घर पर बैठ कर की। बड़े भाई ने पढ़ाया। सत्रह साल की उम्र तक कैलीपर्स नहीं थे इसलिए घर में ही रहता था। कहीं जा नहीं सकता था। प्राइवेट स्टूडेंट रह कर पढ़ाई की और सीधे ही बोर्ड की परीक्षा दी। उस परीक्षा में टॉपर रहा। मैरिट में नाम आया। इग्नू से एमसीए किया। कभी न स्कूल गया और ना ही कॉलेज गया। वर्ष 1992 में चार पहिए का स्कूटर आया तब सोशल लाइफ डवलप हुई। 19 साल की उम्र में जॉब लग गई। वर्ष 2000 में शादी हुई। पत्नी भी बहुत सहयोगी है। हर काम में उनका सहयोग रहता है। उन्होंने भी अपनी लाइफ में संघर्ष देखा है। लेकिन आज हम बहुत अच्छी लाइफ जी रहे है। किसी चीज की कमी नहीं है। अपनी जिंदगी को नॉर्मल लोगों की तरह व्यतीत कर रहे है। पेरेन्ट्स भी साथ रहते है। उनकी भी देखभाल
करते है। मेरे दोनों पैरों में कैलीपर्स है और हाथों में बैसाखी रख कर चलता हूं। कार भी ड्राइव करता हूं। कार को अन्दर से डिजाइन इस तरह करवा रखा है कि चलाने में दिक्कत नहीं आती। हम दोनों पति-पत्नी आॅल इंडिया विकलांग मित्र एसोसिएशन से जुड़े है। जो अक्षम लोग है उन्हें मोटीवेट करते है, जिससे वह भी आत्मनिर्भर बनें। मेरी कई हॉबी है। पियानो बजाना, शायरी लिखना, टेबिल टेनिस खेलना। राजस्थान टेबिल टेनिस एसोसिएशन के तत्वावधान में स्टेट लेवल पर पैराकैटेगरी में विजेता रह चुका हूं।  शारीरिक कमी भगवान की देन है। शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी जो लोग घर के लिए बोझ है वह भी दिव्यांग है। समाज में डिसेबिलिटी कई रूपों में मौजूद है। दिव्यांग व्यक्तियों के सामने कैसी भी परिस्थितियां हो किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएं। आत्मनिर्भर बनें और आत्मविश्वास रखें। कभी भी अपनी दिव्यांगता को अपने पर हावी नहीं होने दें। दिव्यांगता अभिशाप नहीं है आत्म सम्मान के साथ दिव्यांग को समाज की मुख्यधारा में रखें। उसे हीन भावना से नहीं देखें। समाज में बदलाव आ रहा है, लेकिन और बदलाव की जरूरत है।

कभी भी अपने को अलग मत समझिए
द्वारका इलेक्ट्रिकल्स के प्रोपराइटर वैभव गुप्ता और उनकी पत्नी डॉ. गीता गुप्ता दोनों के ही दोनों पैरों की लोअर लिंब्स पोलियो से ग्रस्त है। लेकिन दोनों ने ही शारीरिक रूप से अक्षम होने के बाद भी अपने हौसलों को अक्षम नहीं होने दिया। हर कदम पर दोनों पति-पत्नी ने एक-दूसरे को समर्थन दिया। वैभव ने इंजीनियरिंग की है। उनकी पत्नी डॉ. गीता एक निजी संस्थान में प्रिंसीपल के पद पर कार्यरत है। दोनों के एक बेटी है जो बारहवीं कक्षा में है। दोनों सामान्य लोगों की तरह एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे है। वैभव ने बताया कि उन्हें परिवार का पूरा सपोर्ट रहता है। उनके पेरेन्ट्स ने उनकी नॉर्मल बच्चे की तरह ही परवरिश की। परिवार ने यह विश्वास जाग्रत किया कि कोई भी ऐसा काम नहीं है, जो आप नहीं कर
सकते है। पेरेन्ट्स ने इंडीपेन्डेंट बनाया। स्कूल में टीचर्स ने भी नॉर्मल बच्चे की तरह ट्रीट किया। कोटा इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल एण्ड कम्यूनिकेशन ब्रांच में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। स्कूल और कॉलेज में कभी किसी ने अहसास ही नहीं होने दिया कि मैं दिव्यांग हूं। कैलीपर्स और क्रचिस के साथ ही स्कूल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। वह बताते है कि जब डेढ़ साल का था तभी अटैक आया था और दोनों पैरों के लोअर लिब्स में पोलियो हो गया। इंजीनियरिंग के तृतीय वर्ष में 1994 में शॉप शुरू की। इसमें वायर, केबल, स्विचिज, स्विच गेयर्स का काम करते है। शॉप शुरू करने में किसी बाहरी व्यक्ति से कोई मदद नहीं ली और ना ही पार्टनरशिप में काम शुरू किया। फ्रेड्स और परिवार का सहयोग हर कदम पर
मिला और आज भी पूरा सपोर्ट है। मेरी पत्नी भी कैलीपर्स व क्रचिस के साथ काम करती है। उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। मैं डिसेबल लोगों से यही कहूंगा कि कभी भी अपने को अलग मत समझिए। टीचर्स और मित्र अगर आपकी जिंदगी में है तो आप सब कुछ कर सकते है। अपनी जिंदगी में अपना काम खुद करें। अगर आपके साथ एज्यूकेशन है तो सब चीजें पीछे छूट जाती है। फिर यह मायने नहीं रखता कि आप फिजिकली चैलेन्जड है। कई बार मैंने महसूस किया कि सरकार को दिव्यांगों के लिए कुछ काम करना बाकी है। एटीएम है, वहां रैम्प नहीं होता है।

हौसले मजबूत हो तो हर मंजिल आसान
एसबीबीजे के रिटायर्ड चीफ कैशियर ज्ञानेन्द्र विजय ने बताया जब 2-3 साल का था तब एक पैर पोलियो ग्रस्त हो गया था। उसके 2-3 साल बाद दूसरे पैर पर भी असर आ गया था। कभी भी मेरे मन में गिल्ट नहीं आया। हर क्षेत्र में आगे रहा। चाहे पढ़ाई हो या मैनेजमेंट हो। कॉलेज की छात्र राजनीति में भी रहा। पेरेन्ट्स का पूरा सपोर्ट रहा। मेरी शारीरिक कमजोरी किसी काम में आड़े नहीं आई। कैमेस्ट्री विषय से वर्ष 1971 में एमएससी किया। उसके बाद एक साल शिक्षा विभाग में कार्य किया। 1973 में बैंक की नौकरी में आ गए। 1974 में विवाह हुआ। दो बेटे है एक आईआईटी जोधपुर में प्रोफेसर हैं और दूसरा कोटा
में अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर है। 1974 में गायत्री परिवार से जुड़ा और उनके कार्यों में सक्रिय रहा। मेरे 5-6 एक्सीडेंट भी हुए। पैरों और हाथों में चोटें भी आई लेकिन हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2001 में बैंक की नौकरी से वीआरएस ले लिया। उसके बाद वर्ष 2003 से गायत्री परिवार समिति की गौशाला में सेवा दे रहा हूं।

वहां पूरा मैनेजमेंट और कोऑर्डिनेशन का काम देखता हूं। पांच सौ से अधिक वहां गायें हैं। मुझे हर जगह लोगों का सहयोग मिलता रहा। वर्ष 2010 मेें एक्सीडेंट हुआ उसके बाद से चलने-फिरने में दिक्कत आ गई। इस समय 81 प्रतिशत डिसेबिलिटी है। उसके बाद भी कोई परेशान नहीं है। गायत्री परिवार का सहयोग, प्रेम, सम्मान मिला। दूसरे लोगों की अपेक्षा ज्यादा सपोर्ट मिला। इससे आत्मविश्वास बना रहा। परिवार, समाज और सब जगह सम्मान और प्रेम मिला। लोगों से यहीं कहूंगा कि अपने अन्दर कॉन्फिडेंस को बढ़ाने का काम करें। गायत्री उपासना करें इससे आत्मबल बढ़ेगा। कॉन्फिडेंस रहे तो इंसान बहुत कुछ कर सकता है। इंसान का दिल और दिमाग स्वस्थ है तो कोई दिक्कत नहीं है। दिल में हौंसले और मजबूत इरादे हो तो हर मंजिल तक पहुंचना और उसे पाना आसान हो जाता है।


 

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