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राजस्थान

आरोपों के घेरे में महापौर घनश्याम ओझा, निगम परिसर को बनाया सौदेबाजी का अड्डा

Sunday, September 22, 2019 02:25 AM
जोधपुर नगर निगम ( फाइल फोटो )

जोधपुर । नगर निगम के चुनावों से एन पहले महापौर घनश्याम ओझा पर आरोपों का घेरा बढ़ गया है। खास बात यह है कि उनकी ही पार्टी के लोग आज महापौर ओझा को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा है। आम आदमी भी महापौर की कार्यशैली से खुश नजर नहीं आ रहा। लोगों का कहना है कि निगम में पारदर्शिता का उनका दावा पूरी तरह से खोखला है। वे स्वयं यह भली भांति जानते हैं। भ्रष्टाचार निगम में पिछले चार सालों में रिकॉर्ड गति से बढ़ा है। बिना दिए वहां कोई फाइल आगे बढ़ना तो छोड़ो मृत्यु प्रमाण पत्र तक नहीं बनते।


यही नहीं निगम परिसर में कथित पत्रकारों और दलालों की महापौर की शह पर ऐसी फौज खड़ी हो गई है कि उनके बिना इशारे या उनको बिना साथ लिए नगर निगम मे कोई भी काम करवाना संभव ही नहीं है। महापौर सब कुछ जानते हुए भी आंखे बंद किए हुए हैं। हालांकि वे जाहिर यह करते हैं कि उनके कुछ हाथ में ही नहीं लेकिन पिछले दरवाजे से आरोप यही उछलते हैं कि महापौर की बिना मर्जी के कुछ नहीं हो सकता। महानगर को अतिक्रमण मुक्त करने के नगर निगम के दावे हर बार खोखले साबित होते हैं। क्यों? क्या महापौर का स्वार्थ आडे आ जाता है? हर गली मोहल्लों में अतिक्रमण की भरमार के बावजूद निगम के अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहते हैं।


क्यों? आरोप है कि निगम में पिछले कुछ सालों से सौदेबाजी का खेल जमकर हावी हो गया है। जिसमें अतिक्रमण शाखा, डीओ शाखा और कथित तौर पर कुछ पत्रकारों की दखल से फाइलें दफन कर दी जाती है। सौदेबाजी के खेल को लेकर महापौर तक लगाम कसने में नाकाम ही साबित हो रहे है। नगर निगम में अतिक्रमण की शिकायतों के बाद में कार्रवाई के नाम पर ढकोसले को लेकर नवज्योति की स्पेशल रिपोर्टिंग टीम ने पड़ताल की। जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। बताया जा रहा है कि नगर निगम में अतिक्रमण की शिकायत के  बाद डीओ शाखा की ओर से कार्रवाई के लिए प्रपत्र जारी हो जाते हैं । इन कार्रवाई के प्रपत्र के जारी होने के बाद ही सांठगांठ का असली खेल शुरू हो जाता है।


हर कोशिश रही नाकाम
आलम यह है कि निगम में पनप रहे भ्रष्टाचार को लेकर निगम के पूर्व आयुक्तों ने कई प्रयास किए, लेकिन निचले स्तर पर मिलीभगत के जमकर खेल होने से प्रयास नाकाम रहे। और तो और महापौर तक ने निगम में भ्रष्टाचार को लेकर कड़े कदम उठा दिए थे। महापौर ने भ्रष्टाचार के संबंध में एसीबी तक को शिकायत कर दी थी, हालांकि बाद में राजनीतिक दबाव के चलते एसीबी की जांच को अब तक आगे नहीं बढ़ने दिया गया है।


मिलीभगत से कूट रहे चांदी
पड़ताल में सामने आया कि डीओ नोट जारी होने के बाद अतिक्रमण पर कार्रवाई के नाम पर संबंधित पक्षकार को अतिक्रमण शाखा की ओर से काफी दबाव बनाया जाता है। जिसमें कुछ तथाकथित पत्रकार भी भागीदारी निभाते हैं। अतिक्रमण से सांठगांठ और सौदा निर्धारित होने के बाद में डीओ नोट को फाइलों में दफन कर दिया जाता है और उस अतिक्रमण पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है । इसके चलते ही हजारों डीओ नोट जारी होने के बावजूद अतिक्रमण पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई । इसकी उच्च स्तर पर जांच करने पर कई परतें सामने आ सकती है।


पत्रकार और दलालों का डेरा
निगम का आलम यह हो गया है कि नगर निगम में अधिकारियों से कोई भी कार्य करवाने के लिए तथाकथित तौर पर कुछ पत्रकारों और दलालों का ही सहारा लेने की मजबूरी पेश आती है। पत्रकारों और दलालों के सहारे के बाद ही निगम में कोई फाइल आगे बढ़ पाती है। जिसकी शिकायत कई बार उच्च स्तर पर करने के बावजूद अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है । इसके चलते ही शहर में दुर्गति बनी हुई है।

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