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ओपिनियन

भारतीय कृषि क्षेत्र में महिलाएं

Friday, March 06, 2020 10:25 AM
फाइल फोटो

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं का अत्यनन्त महत्वपूर्ण स्थान है। किसान, श्रमिक और उद्यमी के रूप में महिलाएं भारत की कृषि भूमि की प्रेरक शक्ति हैं। भारत में आर्थिक दृष्टि से सक्रिय सभी महिलाओं का 80 प्रतिशत विभिन्न उप क्षेत्रों सहित कृषि में कार्यरत हैं। इनकी संख्या कृषि श्रम बल का 33 प्रतिशत और स्व-रोजगार किसानों का 48 प्रतिशत हैं। राष्ट्रीय प्रति दर्श सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 18 प्रतिशत कृषि परिवारों का मार्गदर्शन महिलाएं कर रही हैं। उपयोगी श्रमिकों की परंपरागत बाजारोन्मुखी संकीर्ण परिभाषा से हटकर, ग्रामीण भारत में लगभग सभी महिलाओं को कुछ अर्थों में किसान माना जा सकता है। इनमें खेतिहर मजदूरों के रूप में काम कर रही परिवार के खेत उद्यमों में अवैतनिक श्रमिक के रूप में कार्य कर रही अथवा दोनों का संयोजन शामिल है। खेती-बाड़ी में लगे अनेक समुदायों में महिलाएं फसलों की किस्मों की मुख्य संरक्षक हैं। राष्ट्रीय स्तर पर नमूने के तौर पर किए गए सर्वेक्षणों के साथ-साथ विभिन्न अनुभवों पर आधारित अध्ययनों से प्राप्त सबूत, ग्रामीण भारत में खेतिहरों और कृषि मजदूरों दोनों के रूप में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की जबरदस्त संख्या की ओर इशारा करते हैं। खेतिहरों और कृषि मजदूरों पर 2011 की जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 49.8 प्रतिशत पुरुष श्रमिकों के मुकाबले लगभग 65.1 प्रतिशत महिला श्रमिक खेतिहर या कृषि मजदूर के रूप में कृषि पर निर्भर हैं। एनएसएसओ द्वारा यह भी बताया गया है कि सभी महिला ‘श्रमिकों’ का 63 प्रतिशत और ग्रामीण महिला श्रमिकों का 75 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। महिलाएं रोपण से लेकर कटाई के बाद तक के कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आमतौर पर आंकड़ों के रूप में यह बात सामने नहीं आती और श्रम का दोहराव होता है। कृषि में महिलाओं की अभिन्न भूमिका के बावजूद केवल 13.96 प्रतिशत संपत्तियां महिलाओं द्वारा संचालित हैं और वह भी ज्यादातर छोटे और सीमांत किसानों के रूप में। फसल, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी और कटाई के बाद प्रौद्योगिकी में महिलाओं के जबरदस्त योगदान के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी, सेवाओं और सार्वजनिक नीतियों के पैकेज तैयार करते समय कृषि में महिलाओं की उपयोगी भूमिका की अक्सर उपेक्षा की जाती रही है। कृषि में महिलाएं कभी-कभी विस्तार सेवाओं और उत्पादन परिसंपत्तियों जैसे बीज, पानी, ऋण, सब्सिडी आदि तक पहुंचने में असमर्थ होती हैं।

अधिकांश महिलाओं के पास अपनी भूमि नहीं होती है, उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों व सेवाओं का लाभार्थी नहीं माना जाता है। इसके अलावा, परिवार और खेत में महिला की अनेक भूमिकाओं के कारण, ज्ञान और जानकारी तक उसकी पहुंच और इसलिए उसके अवसर कम हो रहे हैं! रीति-रिवाजों में लैंगिक भेदभाव व्याप्त है और यह सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधा पहुंचाता है। जबकि महिला कार्यक्रमों में स्थायी विकास के लिए निवेश महत्वपूर्ण है। फिर भी महिलाओं को विकास कार्यक्रमों से लाभान्वित होने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कृषि में महिलाओं की मौजूदगी सुनिश्चित करने और महिला किसानों की बढ़ती भूमिका के संबंध में किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति 2007 में महिला सशक्तिकरण के लिए अनेक उपायों की परिकल्पना की गई है। अन्य बातों के अलावा नीतिगत प्रावधानों में भूमि, जल, पशुधन, मत्स्य पालन और जैव संसाधनों के संबंध में संपत्ति सुधार शामिल हैं।
सहायक सेवाओं और निवेश जैसे सीमांत प्रौद्योगिकियों के प्रयोग व कृषि जैव-सुरक्षा प्रणालीय अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और रोग मुक्त रोपण सामग्री की आपूर्ति, मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्य में सुधार तथा एकीकृत कीट प्रबंधन प्रणालीय महिलाओं के लिए सहायक सेवाएं जैसे, क्रेश (शिशु सदन) बच्चों की देखभाल केन्द्र, पोषण, स्वास्थ्य और प्रशिक्षण समय पर, पर्याप्त और उचित ब्याज दरों पर संस्थागत ऋण और किसान अनुकूल बीमा प्रपत्र सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग और कृषि विस्तार को पुनर्जीवित करने के लिए किसानों के स्कूलों की स्थापना देशभर में एमएसपी के प्रभावी कार्यान्वयन, कृषि बाजार के बुनियादी ढांचे का विकास और खेती करने वाले परिवारों के लिए ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार पहल ग्रामीण ऊर्जा आदि के लिए एकीकृत दृष्टिकोण आदि शामिल है। इन प्रावधानों को विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से संचालित किया जा रहा है, जो केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों और मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित किए जा रहे हैं। किसानों की आय दोगुनी करने के बारे में अंतर-मंत्रालयी समिति ने प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कृषि में महिलाओं को सशक्त बनाने पर जोर दिया है और विस्तार कार्यक्रमों में महिलाओं के दिखाई देने और उनकी भागीदारी में सुधार लाने और सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों में लाभार्थी के रूप में रणनीतियों की सिफारिश की है। विभाग कृषि में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई उपाय और कदम उठा रहा है जो नीचे दिए गए हैं। विभिन्न प्रमुख योजनाओं का कार्यक्रमों और विकास संबंधी व्यवधानों के तहत महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत धनराशि निर्धारित करके लिंग संबंधी चिंताओं को मुख्यधारा में लाया गया। योजनाओं के दिशा-निर्देशों में विस्तार सुधारों के लिए राज्य विस्तार कार्यक्रमों को समर्थन् राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन राष्ट्रीय तिलहन और पाम आॅयल मिशन स्थायी कृषि पर राष्ट्रीय मिशन बीज और रोपण सामग्री के लिए उप-मिशन कृषि यांत्रिकीकरण पर उप-मिशन और बागवानी के एकीकृत विकास के लिए मिशन अपेक्षा करता है कि राज्य और अन्य कार्यान्वयन एजेंसियां महिलाओं पर कम से कम 30 प्रतिशत व्यय करें। विभाग विभिन्न योजनाओं कृषि-क्लिनिक और कृषि-व्यवसाय केंद्र (एसीएबीसी) एकीकृत कृषि विपणन योजना (आईएसएएम) कृषि यांत्रिकीकरण के उप-मिशन (एसएमएएम) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत पुरुष किसानों के मुकाबले महिला किसानों को अतिरिक्त समर्थन और सहायता प्रदान कर रहा है। देशभर के सभी किसानों को आय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना में, महिला किसानों सहित किसानों को शामिल किया गया है, ताकि वे कृषि संबंधी खर्चों, उससे जुड़े कार्यों और घरेलू जरूरतों पर ध्यान दे सकें।

इस योजना का उद्देश्य कुछ मानदंडों को छोड़कर प्रति वर्ष किसानों को दो-दो हजार रुपये की चार मासिक किस्तों में 6,000/- रुपये का भुगतान करना है।  प्रधानमंत्री किसान मान-धन योजना (प्रधानमंत्री-केएमवाई) का उद्देश्य महिला किसानों सहित लघु और सीमांत किसानों (एसएमएफ) को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है, क्योंकि आजीविका के नुकसान की स्थिति में उन्हें समर्थन देने के लिए वृद्धावस्था के लिए न्यूनतम अथवा कोई बचत नहीं है और योजना इन किसानों के लिए वृद्धावस्था पेंशन का समर्थन करती है। महिला स्व सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन, क्षमता निर्माण हस्तक्षेप, उन्हें सूक्ष्म ऋण से जोड़ने, सूचना तक उनकी पहुंच बढ़ाने और विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने वाले निकायों में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जा रहा है। कृषि निवेशों के वितरण, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और निरूपण आदि जैसे घटकों में महिला किसानों को प्राथमिकता दी जा रही है। राष्ट्रीय कृषि लिंग संसाधन केन्द्र (एनजीआरसीए) डीएसी और एफडब्ल्यू मुख्यधारा और विषय वस्तु निर्धारित करने की रणनीति के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है। केन्द्र लिंग संबंधी सभी गतिविधियों और कृषि संबंधी मुद्दों तथा डीएसी और एफडब्ल्यू के भीतर और बाहर संबद्ध क्षेत्रों के मुद्दों के अभिसरण के लिए केन्द्र बिंदु के रूप में कार्य करता है। कृषि नीतियों और कार्यक्रमों के लिए लिंग परिमाण की समस्या का समाधान करता है। कृषि विकास की मुख्यधारा में खेती करने वाली महिलाओं को लाने के लिए लिंग विशिष्ट हस्तक्षेप को शामिल करने के उद्देश्य से राज्यों/ संघ शासित प्रदेश वकालत/ सलाहकार सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। केन्द्र ने कृषि क्षेत्र खासतौर से प्रौद्योगिकी विकास, निवेशए ऋण और अन्य उपयोगी संसाधनों तक पहुंच बाजार हस्तक्षेप, विभाग द्वारा कार्यान्वित योजनाओं आदि में महिलाओं के सामने आने वाली दिक्कतों, आवश्यकताओं, संभावनाओं के आधार पर महिला किसानों के अनुकूल प्रकाशन/ साहित्य/ सार-संग्रह का कार्य किया है। कृषि और संबद्ध क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को स्वीकार करने और सम्मानित करने के लिए ग्रामीण महिला दिवस के रूप में घोषित किया गया है। राष्ट्रीय प्रति दर्श सर्वेक्षण (एनएसएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में कृषि में पुरुषों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। इस प्रवृत्ति को आसानी से भारतीय कृषि में महिलाओं का बढ़ता प्रभाव कहा जा सकता है। जैसे-जैसे अधिक से अधिक पुरुष औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में गैर- कृषि कार्यों की तरफ बढ़ रहे हैं, महिलाएं कृषि में पर्याप्त संख्या में बनी हुई हैं। खेती में महिलाओं के योगदान को ध्यान में रखते हुए समय की मांग है कि योजनाओं और कार्यक्रमों तथा साथ ही विकास रणनीतियों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने के लिए महिला किसानों को अधिक संख्या में शामिल किया जाए। कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग कई उपायों और पहलों के माध्यम से विकास को बढ़ावा देने और कृषि में महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है। सरकार की रणनीति पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए खेती को व्यवहार्य बनाकर महिला किसानों के सशक्तिकरण और विकास पर ध्यान केंद्रित करना है। इससे कृषि विस्तार सेवाओं सहित उपयोगी संसाधनों तक खेती करने वाली महिलाओं की पहुंच बेहतर हो सकती है, जिससे ग्रामीण महिलाओं के जीवन में समग्र सुधार आ सकता है। इससे न केवल कृषि क्षेत्र के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि और समग्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में सुधार आ सकता है, बल्कि यह महिलाओं को कार्यक्रमों और योजनाओं का लाभार्थी होने से लेकर उन्हें सशक्त बनाने में उनकी सक्रिय भागीदारी को आसान बनाएगा।

- राष्ट्रीय कृषि महिला संसाधन केंद्र (एनजीआरसीए) कृषि मंत्रालय
 

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