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Friday 28th of January 2022
 
ओपिनियन

गरीबी के अभिशाप में स्त्री ही क्यों अभिशप्त है?

Friday, January 07, 2022 15:00 PM
कॉन्सेप्ट फोटो

हर साल हजारों की तादाद में गरीब प्रदेशों से लड़कियों और महिलाओं को खरीदने और उनसे जबरन शादी करने या तो उन्हें ऐसे नरकीय धंधे में घकेलने की खबरें मीडिया में सुर्खियां बटोरती हैं, जो एक स्वस्थ समाज के नजरिए से सबसे गंदा कार्य माना जाता है। चालीस-पचास साल पहले मेरे बचपन में मां बताती थीं, फला पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार से औरत खरीद कर लाया है, उसने अपने भाई और रिश्तेदारों के लिए भी औरत खरीदने में अगुवाई की और दलाल के रूप में पैसे वसूले। जो औरतें खरीदकर लाई गईं, उनको ये सब बहुत मारते-पीटते हैं। मां भावुक होकर कहने लगती...कितने कसाई हैं, किसी की बिटिया के साथ जानवर जैसा सुलूक करते हैं? उस समय मैं इतना जागरूक नहीं था कि मां से कहता कि क्या कोई स्त्री ‘वस्तु’ है जो खरीदी और बेची जाती है और जैसा चाहा उसके साथ बर्ताव किया? सुनकर मैं भावुक हो जाता था...बेचारी को ये कितना सताते हैं! पांच दशक गुजर जाने के बाद उसी तरह की घटनाएं जब सुनता हूं तो मन में एक टीस उठती है ....क्या समाज जैसे तब था वैसे अब भी हैं? देश में प्रगति तो हुई, लेकिन आचार-विचार में महिलाओं के प्रति नजरिया नहीं बदला है। कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ी, लोगों में जागरूकता आई। महिलाएं हर क्षेत्र में काफी आगे बढ़ चुकी हैं, फिर भी स्त्री उसी तरह बिकने के लिए अभिशप्त है? इसी के साथ यह भी सवाल है कि स्त्री आज भी वस्तु है, जैसे पचास साल पहले थी? सवाल उठता है आखिर महिलाएं ही क्यों इस स्थिति के लिए अभिशप्त हैं, पुरुश क्यों नहीं? इसी के साथ एक सवाल यह भी है कि स्त्री या लड़की स्वयं को ‘वस्तु’ के रूप में बिकने के लिए क्यों चुपचाप प्रस्तुत कर देती है? झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित देश के अनेक प्रदेशों में बाल विवाह, अनमेल विवाह और अनइच्छा विवाह का प्रचलन है। लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाली अमानवीयताएं शताब्दियों से रही हैं। संत कबीर, राजाराम मोहन राय, आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद, केशव चंद्र सेन सहित अनेक समाज सुधारकों ने इस तरह की सामाजिक विकृतियों और कुप्रथाओं के लिए कठिन और लम्बा संघर्श किए। आजादी के बाद केंद्र में काबिज सरकारों ने लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार, शोषण और जुल्म को खत्म करने के लिए कानून बनाए और उसे लागू किए। लेकिन आजादी के बहत्तर वर्षों के बाद भी न तो महिलाओं पर तरह-तरह के होने वाले जुल्म, प्रताड़Þना और शोषण बंद हुए और न तो उनके साथ होने वाली हिंसक वारदातें ही पूरी तरह खत्म हुईं। कुछ मामलों में महिलाओं के साथ गैर इंसानी बर्तावों में बढ़ोत्तरी हुई है।


इस साल कोरोना महामारी की वजह से गर्मियों में आयोजित होने वाले बाल विवाह छिटपुट चोरी-छिपे हुए होंगे, लेकिन हर साल बड़ी तादाद में होते हैं। बाल विवाह के अलावा घर बसाने के लिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त हर साल बड़ी तादाद में होता है। गरीब परिवारों को धन चुकता कर लड़कियों के साथ जबरन फेरे लिए जाते हैं। जबकि ऐसे तथाकथित विवाह या राजीनामे कानून के मुताबिक वैध नहीं होते। ऐसे खरीद-फरोख्त में लड़कों के पक्ष द्वारा लड़कियों के माता-पिता को पांच हजार से लेकर दो लाख तक चुकाए जाते हैं। इनमें 80 प्रतिशत या इससे ज्यादा लड़कियां नाबालिक होती हैं। हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली और दूसरे राज्यों में खरीद कर लाई गईं इन लड़कियों को स्थानीय लोग ‘पारो’ कहते हैं। राजस्थान के अलवर जिले के अलावा भरतपुर, धौलपुर, सीकर, झुंझुनूं, हरियाणा के मेवात सहित कई जिलों और दिल्ली में पारो की बड़ी तादाद हैं। उन परिवारों में लड़कियां खरीद कर लाई जाती हैं जिनके बेटे की शादी नहीं हो पाती है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक जो लड़Þकियां दूसरे राज्यों से लाई जाती हैं उनके माता-पिता पांच हजार से लेकर ढाई लाख तक लड़कों के माता-पिता से लिए होते हैं। ऐसी लड़कियां ससुराल आने पर कई तरह की क्रूरताएं और दुख-दर्द झेलती हैं। इनमें पन्द्रह-बीस प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जिनमें दलाल एक से दूसरे और तीसरे व्यक्ति से पैसा लेकर लड़कियों को बेच देते हैं। बेचने और खरीदने के इस घृणित कार्य में कई गिरोह सक्रिय हैं। इनका नेटवर्क देश-विदेश में फैला हुआ है। कभी-कभार गिरफ्तारियां भी होती हैं तो इनकी पहुंच ऊपर तक होने के कारण ये छूट जाते हैं। एक सामाजिक संगठन के सर्वेक्षण के मुताबिक ‘पारो’ कही जाने वाली ये लड़कियां अत्यंत गरीब परिवारों से होती हैं। गांवों में आज भी उच्च-निम्न जाति का भेदभाव है, परन्तु मजबूरी के कारण जाति का अहंकार खत्म हो जाता है। पिछले दस सालों में लड़कियों की खरीद-फरोख्त करने और उनका यौन-शोषण करके दूसरों को बेचने के मामले बहुत तेजी के साथ बढ़े हैं। इसके विरुद्ध कठोर कानून भी बनाए गए हैं, लेकिन उन कानूनों का डर माफिया-ग्र्रुपों को न के बराबर है। यही वजह है पारो खरीद-फरोख्त के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि खरीदी गई लड़कियों के मामले में वेश्या बनाकर जिस्म-फरोसी का धंधा करवाने वाले दलालों को उनके अपराध के लिए जेल की सजा दिलवाने में गरीब परिवार रुचि नहीं दिखाते हैं। जिससे मजबूर लड़Þकियों से जिस्म-फरोसी का धंधा करवाने वाले दलालों के हौसले बढ़ते रहते हैं।  

मानव तस्कर निरोधक ब्यूरो टीम ने हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब जैसे तमाम राज्यों में छापे मारकर ऐसी तमाम लड़कियों को मुक्त कराया है, जो किसी व्यक्ति की शादी कराने के लिए खरीदी गईं। पिछले दस सालों में इस तरह के तीन सौ मामले पुलिस ने दर्ज किए जिसमें दौ सौ लड़कियों को मुक्त कराया गया। सवाल यह है कि किस कारण से लोग लड़कियों को खरीद कर षादी करते हैं? क्या इनकी जाति में लड़कियों की भारी कमी हो गई है? एक सामाजिक संगठन के सर्वेक्षण के मुताबिक हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली जैसे रा’यों में लिंगानुपात बिगड़ गया है। काफी कुछ सुधरने के बाद भी अभी तमाम परिवारों को दूसरी जाति और रा’य से मजबूरीवष लड़कियां रकम देकर षादी करके लाई जाती हैं। संस्कृति, भाशा-बोली, जीवनषैली भिन्न होने के बाद भी हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व दिल्ली जैसे रा’यों के लोग दलालों के सहारे दूसरे रा’यों से गरीब परिवारों की लड़कियां ले आते हैं।


जिन सामाजिक कुप्रथाओं, गंदी परम्पराओं और अंधविष्वासों के कारण स्त्री सदियों से षोशण और जुल्म का षिकार होती आ रही है, वे कुप्रथाएं, गंदी परम्पराएं और सामाजिक विशमता आज भी स्त्री षोशण का कारण बनी हुईं हैं। बाल विवाह, अनमेल विवाह और अनिच्छा विवाह से पैदा होने वाली समस्याएं सदियों पहले जितनी और जैसी थीं उससे कम जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। बाल विवाह और अनमेल विवाह के कारण महिला का जीवन अत्यंत दुखदाई हो जाता है। उसी तरह षादी के नाम पर नाबालिक लड़कियों की खरीद-फरोख्त कर किसी का घर बसाने के नाम पर होने वाले कृत्य से भी लड़कियों का जीवन नरकीय बन जाता है। एक तरफ मनमर्जी षादी करके घर बसाने वाली नए जमाने की लड़कियों का जीवन, तो दूसरी तरफ जबरन षादी कराके किसी के गले में जानवर की तरह बांध दी गईं लड़कियों का जीवन जानवर जैसा क्यों है? इस सवाल का जवाब कौन देगा?


सरकारी आंकड़े बयां करते हैं, मध्य प्रदेष, बिहार, झारखंड, पष्चिम बंगाल, उड़ीसा जैसे पिछड़े रा’यों में गरीबी ’यादा है। गरीबी इंसान को कोई भी कर्म करने के लिए मजबूर करती है। यही कारण इन रा’यों से लड़कियों को बेचने और जिस्म-फरोसी का धंधा करने-करवाने की घटनाएं अधिक सामने आती हैं। एक गरीब परिवार किसी धनी परिवार या जरूरतमंद परिवार को अपनी लड़की पैसा लेकर बसाता है। एक गरीब परिवार की लड़की एक नए माहौल और जीवनषैली वाले ऐसे परिवार को दे दी जाती है जिसका उससे कोई ताल्लुकात किसी रूप में नहीं होता है। कोई माता-पिता अपनी लाडली को बेचकर अपने परिवार का खर्च चलाए और उससे उसको कोई पष्चाताप भी न हो, यह भूख और गरीबी का सबसे घृणित चेहरा है। बिडम्बना यह है, इस घृणित चेहरे को लेकर देष-समाज में कोई ऐसी चर्चा नहीं होती, जैसी चर्चा किसी धनवान परिवार की लड़की के अपहरण या उसके साथ गैरइंसानी बर्ताव होने पर होता है। षासन, प्रषासन, जनसेवक और मीडिया यदि ईमानदारी से इस तरफ गौर करें तो कोई कारण नहीं कि लड़कियों की खरीद-फरोख्त न रुके।

भूमण्डलीकरण, निजीकरण, उदारीकरण के साथ षुरू हुआ बाजारीकरण का यह विभत्स चेहरा है। बाजार का केवल एक नियम होता है- अपना हित साधना, उसके लिए चाहे जो तरीका अपनाना पड़े। ऐसी तथाकथित षादियों में वे सभी तरीके अपनाए जाते हैं जो तरीका बाजार का होता है।  हिन्दू परम्परा में विवाह एक संस्कार है, लेकिन खरीदी-फरोख्त करके घर बसाने वाली ऐसी षादियों को क्या ‘विवाह संस्कार’ कहा जा सकता है? ऐसे विवाह जहां बाजार की तरह दलाली चलती है, समाज क्यों मान्यता दे रहा है? क्या इस लिए कि इससे किसी लड़के की षादी हो जाती है? या इस लिए कि पुरुश वर्चस्व वाले भारतीय समाज में अब भी स्त्री का वस्तु वाली मान्यता अब भी कायम है, जहां स्त्री की अपनी कोई अहमियत नहीं है।

        -अखिलेश आर्येन्दु
(ये लेखक के अपने विचार हैं)




मंथन
इस साल कोरोना महामारी की वजह से गर्मियों में आयोजित होने वाले बाल विवाह छिटपुट चोरी-छिपे हुए होंगे, लेकिन हर साल बड़ी तादाद में होते हैं। बाल विवाह के अलावा घर बसाने के लिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त हर साल बड़ी तादाद में होता है। गरीब परिवारों को धन चुकता कर लड़कियों के साथ जबरन फेरे लिए जाते हैं। जबकि ऐसे तथाकथित विवाह या राजीनामे कानून के मुताबिक वैध नहीं होते। ऐसे खरीद-फरोख्त में लड़कों के पक्ष द्वारा लड़कियों के माता-पिता को पांच हजार से लेकर दो लाख तक चुकाए जाते हैं।

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