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ओपिनियन

जानें राज काज में क्या है खास

Monday, November 11, 2019 10:10 AM
असर तो असर ही होता है और जब अपने खुद ही विरोध करे, तो उसके असर और भी ज्यादा बढ़ जाता है।

असर तो असर ही होता है और जब अपने खुद ही विरोध करे, तो उसके असर और भी ज्यादा बढ़ जाता है। अब देखो ना पिछले दिनों इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने में पर इसका असर कुछ ज्यादा ही दिखाई दिया। स्टेट इंचार्ज पाण्डे साहब ने केन्द्र की नीतियों का विरोध करने के लिए अपना मुंह क्या बोला, उसका युवा मंत्री पर मिनटों में असर दिख गया। मंत्री ने जो कुछ बोला, उसका असर औरों पर पड़ा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा, मगर पाण्डे साहब पर हाथों हाथ दिख गया। युवा मंत्री के मुंह से भी सत्य वचन निकल गया कि अब किसका विरोध करें, अभी तो हाइब्रिड सिस्टम के विरोध की गूंज थमी भी नहीं है। इस बार तो हम तो सबसे पहले अपने ही राज के फैसलों का ही विरोध करते हैं, औरों का नहीं।

बेचारे हरकारे
इस बार जो दशा हरकारों की बिगड़ी है, वह किसी सपने से भी कम नहीं है। उन्हें चारों तरफ से लताड़ के सिवाय कुछ भी नहीं मिल रहा। बेचारों के आंसू पौंछने वाले तक नहीं मिल रहे है। जिनके सहारे कॉलर ऊंची कर मार्केट में घूमते हैं, वो भी बगलें झांकने में ही अपनी भलाई समझते हैं। अब देखो ना रात दिन राज के गीत गाने के बाद भी बताशों की जगह दुत्कार ही पल्ले पड़ती है। राज का काज करने वाले भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर माजरा क्या है। पहले चौकड़ी की सलाह से सीएमओ के चारों तरफ लक्ष्मण रेखा खींची गई। और अब प्रेम से बुलावा देने के बाद दुत्कार दिया जाता है।

बड़ी कुर्सी को कौन सलाह दे कि हरकारों और राज का संबंध तो जन्मों-जन्मों से है। अब राज को दोष भी तो नहीं दिया जा सकता, चूंकि उनके सलाहकारों को तो अपने कामों से ही फुर्सत नहीं है। सचिवालय में खुसर फुसर है कि राज के कानों तक सच पहुंचे, तो कई चापलूसों का पत्ता साफ हो। लेकिन खांटी कहने वाले भी तो कम नहीं हैं, वो चौकड़ी से भी दो कदम आगे हैं। जो कुछ हो रहा है, उसे देख वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। उनकी छठी इन्द्री का संकेत है कि थोड़ा ठण्डी करके खाओ, वक्त एक सा नहीं होता।

गली निकाली
राज का काज करने वाले कई मामलों में नेताओं से एक कदम आगे होते हैं। हर मामले में गली निकालने में महारथियों ने इस बार भी ठान ली है कि राज के किसी भी नवरत्न के हवाई आदेशों को नजरअंदाज करने में ही भलाई है। पिछले राज के नवरत्नों के मौखिक आदेशों की पालना कर काले कोट वालों के फेर में फंसे कारिन्दों ने तो बाकायदा कसम तक खा ली है।

लंच टेबिल पर चर्चा के दौरान गली भी निकाल ली गई कि मौखिक आदेश देने वाले रत्नों की फाइल में नोटिंग डाल देने बचत हो सकती है। पानी वाले महकमे के कारिन्दे अब तोड़ ढूंढने में जुटे हैं कि बिना धन के बड़ी परियोजनाओं को मौखिक मंजूरी से हुए नुकसान की भरपाई कैसे की जाए।

एक जुमला यह भी
इन दिनों खाकी वालों में एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि डिप्टी को लेकर है। पिछले दिनों इंस्पेक्टर से डिप्टी बने कुछ भाई लोगों के चेहरों पर ज्यादा रौनक नहीं है। पीएचक्यू में चर्चा है कि डिप्टी की स्थिति उस उदण्डी और रोने वाले बच्चे जैसे होती है, जिसे साइकिल के अगले डण्डे पर बिठा दिया जाता है। वह रो भी नहीं पाता और आराम से बैठ भी नहीं सकता।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

 

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