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ओपिनियन

जल स्त्रोत अतिक्रमण व प्रदूषण के शिकार

Saturday, December 07, 2019 11:40 AM
फाइल फोटो

दु:ख का विषय है कि मरुप्रदेश के ये परम्परागत जल स्रोत अतिक्रमण, अनदेखी, उपेक्षा व प्रदूषण का शिकार होते हुए लुप्तप्राय व मृतप्राय हो रहे है। गांवों, ढ़ाणियों व कस्बों में हजारों की संख्या में फैले ये जल-स्रोत विकेन्द्रीकृत जल संग्रहण व्यवस्था के परिचायक होने के बावजूद भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने में असफल साबित हो रहे है। राजस्थान की विश्व प्रसिद्व झीले अतिक्रमण, प्रदूषण, अतिदोहन व खरपतवारों की अनियंत्रित वृद्धि के कारण महत्वहीन व जलरहित होती जा रही है, इनकी प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसी भांति, तालाबों व बावड़ियों में गाद जम जाने से इनकी भरावन क्षमता पचास प्रतिशत ही रह गई है। विडम्बना का विषय है कि इन महत्वपूर्ण जल स्त्रोतों के रखरखाव, प्रबंधन एवं संरक्षण की समुचित व पर्याप्त व्यवस्था विद्यमान नहीं होने से ये जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं, अतिक्रमण के कारण विशाल बावड़ियां, झीले, कलात्मक कुएं एवं सुप्रसिद्व तालाब अतीत की विरासत बनते जा रहे हैं।

जल मानव की मूलभूत आवश्यकता हैं। कृषि और दैनिक उपयोग दोनों के दृष्टिगत से जल की विशेष भूमिका है। कृषि के लिए मिट्टी के पश्चात दूसरा निर्णायक साधन जल ही है। तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या,औद्योगीकरण व आधुनिकीकरण जैसी प्रवृतियों ने देश में जल संकट की भयावह स्थिति उत्पन्न कर दी है। जल संकट की भयावह के प्रति सचेत करते हुए वांशिगटन स्थित वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट ने भी कहा कि भारत में 2020 के बाद गम्भीर जल संकट पैदा हो सकता है। देश में बढ़ते जल संकट की झलक तेजी से घटते प्रति व्यक्ति जल की औसत उपलब्धता से स्पष्ट होती है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता वर्ष 1950 में 5000 क्यूबिक लीटर थी घटकर वर्ष 2005 में 1869 क्यूबिक लीटर रह गई तथा वर्ष 2025 में यह उपलब्धता 1000 क्यूबिक लीटर रह जाने का अनुमान है। ज्ञातव्य है कि हमारे देश की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 16 प्रतिशत है, जबकि जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत भाग ही है। संयुक्त राष्ट्र की विकास रिपोर्ट में भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि जल उपलब्धता के दृष्टिकोण से भारत का स्थान 120वां हैं। विश्व संसाधन के वॉटर रिस्क एटलस ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में हाल में जारी अपनी रिपोर्ट में यह चिन्ताजनक तथ्य उजागर किया है कि हमारा देश अत्यन्त गम्भीर जल-संकट वाले देशों को सूची में 13वें पायदान पर है। यही नहीं इस श्रेणी में समावेशित अन्य 16 देशों की जनसंख्या से हमारे देश की जनसंख्या तीन गुना से अधिक है। यह तथ्य खतरे के आगमन का संकेत है, जिसके समाधान के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की नितान्त आवश्यकता है अन्यथा यह समस्या भीषण रूप धारण कर लेगी।

क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से देश का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान भौगोलिक बनावट एवं स्थायी पानी स्त्रोतों के अभाव के कारण सदैव जल-संकट से त्रस्त रहा है। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए प्राचीनकाल से ही इस प्रदेश में सेठ-साहूकारों द्वारा उच्च स्तर की जल संग्रहण, संचयन व संरक्षण की व्यवस्था की जाती रही है। ये पारम्परिक एवं पुरातन जल स्त्रोत प्रचलित सामाजिक व्यवस्था से गुंथते हुए प्रदेश की संस्कृति व परम्परा के अभिन्न हिस्से बन गए। यही नहीं राज्य के अधिकांश प्राकृतिक जल-स्त्रोत तीर्थ स्थान के रूप में भी अवस्थित हैं। राज्य के जल-स्रोत पूर्णतया वैज्ञानिक पद्वति व सुनियोजित ढंग से निर्मित है तथा जल प्रबंधन में समाज की सामूहिक भागीदारी पर अवलंबित है।

केन्द्रीय जल आयोग के अध्यक्ष आहूजा ने राजस्थान के इन पारम्परिक जल स्रोतों की प्रशंसा करते हुए देश के जल वैज्ञानिकों, जल-प्रबंधकों एवं अभियन्ताओं को राजस्थान की जल संरक्षण तकनीक को सीखने की सलाह भी दी। इसी क्रम में जोहान्सबर्ग में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में भी राजस्थान की जल प्रबंधन प्रणाली की प्रशंसा करते हुए उसे अन्य देशों के लिए अनुकरणीय बताया गया। नि:संदेह रुप से राजस्थान के कई कुएं, तालाब व झीलें स्थापत्य कला व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण व बेजोड़ है। जयसिंह द्वारा निर्मित विश्व की सबसे बड़ी झील राजसमन्द झील के बांध पर पच्चीस पत्थर शिलाओं पर राज-प्रशस्ति महाकाव्य संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है, जो कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अर्थपूर्ण है।

दु:ख का विषय है कि मरुप्रदेश के ये परम्परागत जल स्रोत अतिक्रमण, अनदेखी, उपेक्षा व प्रदूषण का शिकार होते हुए लुप्तप्राय व मृतप्राय हो रहे है। गांवों, ढाणियों व कस्बों में हजारों की संख्या में फैले ये जल-स्रोत विकेन्द्रीकृत जल संग्रहण व्यवस्था के परिचायक होने के बावजूद भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने में असफल साबित हो रहे है। राजस्थान की विश्व प्रसिद्व झीले अतिक्रमण, प्रदूषण, अतिदोहन व खरपतवारों की अनियंत्रित वृद्धि के कारण महत्वहीन व जलरहित होती जा रही है, इनकी प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसी भांति, तालाबों व बावड़ियों में गाद जम जाने से इनकी भरावन क्षमता पचास प्रतिशत ही रह गई है। विडम्बना का विषय है कि इन महत्वपूर्ण जल स्त्रोतों के रखरखाव, प्रबंधन एवं संरक्षण की समुचित व पर्याप्त व्यवस्था विद्यमान नहीं होने से ये जल स्त्रोत सूखते जा रहे हैं, अतिक्रमण के कारण विशाल बावड़ियां, झीले, कलात्मक कुएं एवं सुप्रसिद्व तालाब अतीत की विरासत बनते जा रहे हैं।

इस संदर्भ में उल्लेखनीय तथ्य है कि झीलों की जमीन पर अतिक्रमण तथा अवैध कब्जे व निर्माण कार्यों के कारण झीलों के अस्तित्व पर संकट का साया मंडरा रहा है। ज्ञातव्य है कि 15 वर्ष पूर्व उच्च न्यायालय ने झीलों के इलाके को निर्माण निषिद्व क्षेत्र घोषित किया था, लेकिन इसके बावजूद भी इन झीलों के क्षेत्र में होटल, फार्म हाउस व भवनों का निर्माण कार्य अनवरत जारी रहा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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