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ओपिनियन

एक साथ चुनाव देश हित में

Tuesday, July 02, 2019 10:35 AM
नरेन्द्र मोदी (फाइल फोटो)

निस्संदेह, एक साथ चुनाव को लेकर दो मत हैं, लेकिन विरोधियों का तर्क कल्पनाओं पर ज्यादा आधारित है। वे मानते हैं कि भाजपा अपने लोकप्रिय कार्यक्रमों का लाभ उठाकर मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल होगी तथा लोकसभा के साथ विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में भी सफलता पा लेगी। वर्तमान चुनाव में ही उड़ीसा का परिणाम ऐसा नहीं आया। 2014 में नरेन्द्र मोदी की अपार लोकप्रियता के बावजूद 2015 के बिहार चुनाव में भाजपा को सफलता नहीं मिली। कोई भी पार्टी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थायी रुप से सत्ता में नहीं रह सकती। ऐसा तभी हो सकता है जब वह जन अपेक्षाओं के अनुरुप सतत श्रेष्ठ कार्य करता रहे तथा विपक्ष एकदम निष्प्रभावी हो जाए। 1999 में न्यायमूर्ति बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने चुनाव सुधार पर अपनी 170वीं रिपोर्ट में एक साथ चुनाव की अनुशंसा की थी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने तो 2015 के अपने गणतंत्र दिवस संबोधन में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था पर बल दिया। उन्होंने बार-बार चुनाव से सरकार के कामकाज बुरी तरह प्रभावित होने तथा इसका विकास पर असर पड़ने को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। संसद की स्थायी समिति ने भी इसी वर्ष एक साथ चुनाव की सिफारिश की थी। इन सारे अवसरों पर किसी ने विरोध नहीं किया। तो फिर अब विरोध करने का क्या मतलब है?

एक देश एक चुनाव पर पिछले साढ़े तीन वर्षों से सघन बहस चल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाने के साथ इस बहस ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। प्रधानमंत्री इसके सारे पहलुओं पर विचार के लिए एक समिति बनाएंगे जिसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे कदम उठाया जाएगा। किंतु जबसे यह विचार आया तभी से इसका इस तरह विरोध हो रहा है मानो कुछ ऐसा करने की बात की जा रही है जो होना ही नहीं चाहिए या जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही नष्ट कर देगा। प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक से 16 दलों का दूर रहना चिंताजनक है।

हालांकि 21 दल इसमें शामिल भी हुए। लोकसभा की सदस्य संख्या के अनुसार देखा जाए तो 400 से ज्यादा सांसदों वाली पार्टियां शामिल हुईं। प्रधानमंत्री द्वारा विचार-विमर्श के लिए आयोजित बैठक में शामिल न होना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत आचरण है। पता नहीं कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल, तेदेपा, द्रमुक आदि इससे क्या संदेश देना चाहते थे? खुले विचार-विमर्श के माहौल से किसी को समस्या होनी नहीं चाहिए। माकपा एवं भाकपा ने भाग लिया और प्रश्न उठाया कि इसे करेंगे कैसे? यह प्रश्न वाजिब था। ऐसे ही भाग लेने वाले दूसरे दलों ने अपना मत रखा।

निस्संदेह, एक साथ चुनाव को लेकर दो मत हैं, लेकिन विरोधियों का तर्क कल्पनाओं पर ज्यादा आधारित है। वे मानते हैं कि भाजपा अपने लोकप्रिय कार्यक्रमों का लाभ उठाकर मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल होगी तथा लोकसभा के साथ विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में भी सफलता पा लेगी। वर्तमान चुनाव में ही उड़ीसा का परिणाम ऐसा नहीं आया। 2014 में नरेन्द्र मोदी की अपार लोकप्रियता के बावजूद 2015 के बिहार चुनाव में भाजपा को सफलता नहीं मिली। कोई भी पार्टी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थायी रुप से सत्ता में नहीं रह सकती। ऐसा तभी हो सकता है जब वह जन अपेक्षाओं के अनुरुप सतत श्रेष्ठ कार्य करता रहे तथा विपक्ष एकदम निष्प्रभावी हो जाए। 1999 में न्यायमूर्ति बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने चुनाव सुधार पर अपनी 170वीं रिपोर्ट में एक साथ चुनाव की अनुशंसा की थी। पूर्व राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी ने तो 2015 के अपने गणतंत्र दिवस संबोधन में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था पर बल दिया। उन्होंने बार-बार चुनाव से सरकार के कामकाज बुरी तरह प्रभावित होने तथा इसका विकास पर असर पड़ने को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। संसद की स्थायी समिति ने भी इसी वर्ष एक साथ चुनाव की सिफारिश की थी। इन सारे अवसरों पर किसी ने विरोध नहीं किया। तो फिर अब विरोध करने का क्या मतलब है?

पहले आम चुनाव से लेकर 1967 तक सभी चुनाव एक साथ होते थे। यह एक स्वाभाविक और सहज क्रम था। परिस्थितियों के कारण यह क्रम भंग हुआ। 1967 में आठ राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास, तमिलनाडु और केरल में गैर कांग्रेसी सरकारें गठित हो गईं। दुर्भाग्यवश, इन सरकारों में शामिल दलों के बीच मतभेद के कारण ये अपना कार्यकाल पूरा न कर सकीं और अलग-अलग समयों में इनके चुनाव कराने पड़े। यह कांग्रेस के खिलाफ  जन असंतोष का काल था जिससे कई दल पैदा हुए और कई दलों का जन समर्थन बढ़ा। केन्द्र में 1967 में कांग्रेस की विजय हुई और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री अवश्य बनी, पर एक तो पूर्व सरकारों की तुलना में बहुमत छोटा था तथा दूसरे, कांग्रेस के अंदर ही उनके नेतृत्व को चुनौती मिल रही थी। उन्होंने 1972 की जगह  1971 में ही लोकसभा को भंग कर दिया। 1971 में वो भारी बहुमत से सत्ता में लौटीं, लेकिन परिस्थितियां उनके विपरीत होतीं गईं और उन्होंने देश पर 1975 में आपातकाल थोपकर संसद का कार्यकाल छ: वर्ष कर दिया। 1977 में शासन में आई जनता पार्टी सरकार के नेता एकजुट न रह सके और 1980 में सरकार गिर गई। इस पृष्ठभूमि को याद करिए और यह प्रश्न उठाइए कि आज जो स्थिति है वह चुनाव आधारित हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की स्वाभाविक स्थिति है या विकृति? अगर यह राजनीतिक विकृति है तो उसे फिर से स्वाभाविक सहज पटरी पर लाना अपरिहार्य है।

1980 के दशक के बाद क्षेत्रीय दलों का उभार तथा परवर्ती कार्यकाल की घटनाओं के कारण दलों में टूट व महत्वाकांक्षी नेताओं के उभार ने राजनीतिक अस्थिरता को भारतीय लोकतंत्र की मान्य प्रवृत्ति बना दी। आज कोई एक वर्ष ऐसा नहीं गुजरता जिसमें चुनाव न हों। अभी लोकसभा का चुनाव खत्म हुआ और तीन विधानसभाओं झारखंड, महाराष्टÑ तथा हरियाणा के चुनाव होने हैं। अगले वर्ष दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव है। उसके बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी का चुनाव है। फिर 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और मणिपुर का चुनाव आ जाएगा। इसी वर्ष गुजरात एवं हिमाचल का चुनाव होगा। इस बीच न जाने कितने स्थानीय निकाय के चुनाव होंगे। क्या हमारा लोकतंत्र ऐसे ही सतत् चुनावों के चक्रव्यूह में फंसा रहेगा या इससे बाहर निकलकर भी सांस लेगा? ज्यादातर संवैधानिक संस्थाओं ने एक साथ चुनाव का समर्थन किया है और उसके कारणों तथा प्रभावों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है। चुनाव की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता लागू होती है और उस दौरान कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया जा सकता।

- अवधेश कुमार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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