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ओपिनियन

बगदादी के बाद भी खतरा खत्म नहीं

Friday, November 08, 2019 11:10 AM
बगदादी (फाइल फोटो)

इस्लामिक स्टेट के प्रमुख अबू बकर अल-बगदादी की मौत से दुनिया के कई देशों पर मंडराता रहा आतंकी खतरा क्या खत्म हो गया है? सवाल का सीधा जवाब सिर्फ है, नहीं। कारण यह है कि बगदादी के लड़ाके मैदानी लड़ाई में भले ही हारते रहे हों लेकिन कई देशों में पनप चुके और वहां पल रहे बगदादी समर्थकों के रहते सभी संबंधित पक्षों को हर पल चौकन्ना रहना होगा। बगदादी और इस्लामिक स्टेट (आईएस) के प्रवक्ता अबू हस्सन अल मुहाजिर की मौत जेहादी संगठन के लिए एक साथ लगे दो बड़े झटके हैं। इन मौतों से आईएस लड़ाकों के मनोबल पर असर पड़ना स्वाभाविक है। फिर भी यह कहना सही नहीं होगा कि इस जेहादी संगठन की कमर तोड़ दी गई है। बगदादी ने उत्तरी-पश्चिमी सीरिया के गांव में अमेरिकी सैन्य दस्ते के छापे के दौरान स्वयं को विस्फोट से उड़ा लिया था। बगदादी की मौत के कुछ घण्टों बाद ही उत्तरी सीरिया में कुर्दिश फौज के साथ चलाए गए अमेरिकी संयुक्त अभियान में अल-मुहाजिर को मार गिराया गया। 2016 से संगठन के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहे मुहाजिर को बगदादी का करीबी बताया जाता था। वैसे कहा यह जाता है कि बगदादी किसी पर भरोसा नहीं करता था।

सीरिया में मैदानी लड़ाई में पराजय के सात माह बाद बगदादी और मुहाजिर के मारे जाने से इस्लामिक स्टेट को बड़ा झटका लगा है। जेहादी संगठन ने नए नेता के रूप में अबू इब्राहिम अल-हाशिमी के नाम की घोषणा की है। नया प्रवक्ता भी नियुक्त कर दिया गया। हाशिमी की पहचान अभी स्पष्ट नहीं की गई है। माना जाए कि संगठन में उसका एक स्तर तक दबदबा रहा होगा। बगदादी की मौत के बाद जिस तरह हाशिमी की नियुक्ति की घोषणा की गई उससे स्पष्ट है कि आईएस को इस तरह की परिस्थितियों को अनुमान रहा है। उसने भविष्य के नेतृत्व को लेकर नाम तय कर रखे हैं। अब देखना यह होगा कि आईएस में जान फूंकने के लिए हाशिमी क्या कर पाता है। मैदानी लड़ाई के लिए लड़ाके जुटाना और पुन: फौज खड़ा करना काफी कठिन काम होगा। आईएस की उम्मीद दुनियाभर में फैले उसके हमदर्दों और समर्थकों पर टिकी होगी। एक दूसरा सच यह है कि आईएस से मोह टूटने के उदाहरण सामने आते रहे हैं। अन्य देशों के कट्टरपंथी तत्वों में आईएस के प्रति कमजोर होते मोह की वजह सीरिया में आईएस पराजय और इराक में उस पर भारी दबाव को माना जाता है। हां, यह आशंका निर्मूल नहीं है कि भविष्य में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने के लिए आईएस आत्मघाती हमलों और विस्फोटों के रास्ते को अपना सकता है। श्रीलंका में कुछ माह पूर्व किए गए आतंकी हमलों की जिम्मेदारी लेकर वह इसके संकेत पहले ही दे चुका है।

एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का कहना सही है कि बगदादी के मारे जाने से आईएस खत्म नहीं हो गया। उनका मत है कि अबू बकर अल-बगदादी की मौत से यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि उसके साथ वह विचारधारा खत्म हो गई जिसने आईएस को जन्म दिया था। उनकी बात सही साबित हुई है। हाशिमी को नया खलीफा बनाए जाने की खबरें क्या इस आशंका को सच साबित नहीं कर रही हैं। अभी यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि बगदादी की तुलना में नया खलीफा कितना प्रभावशाली साबित हो पाएगा। लेकिन, बात यहां किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि सोच और विचारधारा की है। इनमें बदलाव के बगैर नए-नए बगदादियों को पैदा होने से रोक पाना असंभव सा है। याद करें कि 2011 में इराक से अमेरिकी सेना हटने के मात्र डेढ़ साल के अंदर अलकायदा ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। उसने अपना रूप बदला और मैदान में इस्लामिक स्टेट दिखाई देने लगा। इसके साथ कट्टरवाद का ताण्डव शुरू हो गया।

दुनियाभर के जेहादियों को अपना चिरस्वप्न साकार होते दिखाई देने लगा। खिलाफत की घोषणा करते हुए बगदादी को खलीफा बनाया गया सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर एक सैकड़ा देशों के कट्टरपंथी युवाओं को लुभाने में आईएस काफी हद तक सफल रहा। ऐसा माना जाता है कि अकेले पश्चिमी जगत से पांच हजार युवा आईएस में गए। जो जहां है, उसे वहीं से खिलाफत का साथ देने का संदेश फैलाया गया। ऐसा करके आईएस ने कई देशों में अपने स्लीपर सेल पैदा कर लिए। श्रीलंका में आतंकी हमला इसका प्रमाण है। अपुष्ट जानकारी के अनुसार भारत से ही सौ से अधिक युवा आईएस से जुड़ गए। माना जाता है कि भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मालद्वीव पर आईएस की विशेष नजर रही है। आईएस को लेकर किए जाते रहे मंथन से यह गंभीर सवाल अवश्य उठा कि आखिर क्या वजह है कि दुनियाभर से इतनी बड़ी संख्या में युवा आईएस की ओर से लड़ने के लिए सीरिया और इराक जाते रहे हैं। इनमें खासी संख्या उच्च शिक्षित युवाओं की रही है। यह शोध का विषय हो सकता है कि शिक्षित युवाओं को ब्रेन वाश कर उन्हें कैसे कट्टर बना दिया जाता है। इस संबंध में पाकिस्तानी मूल के इस्लामी विद्वान जावेद अहमद घामिदि के विचारों को जानना चाहिए। वह कहते हैं कि कच्ची उम्र के बच्चों के मस्तिष्क में धर्म को लेकर भरे जा रहे गलत विचार ही समस्या की जड़ हैं। उनका मानना है कि यह काम मदरसों और कई बार परिवारों में किया जाता है, खुलेआम नहीं तो लुके-छुपे तौर पर। घामिदि सभी मुस्लिम देशों को सलाह दे चुके हैं कि किसी को बच्चों के कोमल मन में धर्म की गलत व्याख्या कर जहर घोलने की छूट नहीं दें।               
अनिल बिहारी श्रीवास्तव (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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