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ओपिनियन

प्रतिस्पर्धी से बात और टीकाकरण पर सख्ती

Thursday, September 23, 2021 14:00 PM
राष्ट्रपति जो बाइडन

अमेरिका में इन दिनों चार प्रमुख मुद्दे सुर्खियां बटोर रहे हैं। इनके केंद्र में हैं-राष्ट्रपति जो बाइडन के तीन फैसले। पहला-अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का फैसला और वहां तालिबान का सत्तारूढ़ होना। दूसरा-बाइडन का चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से टेलीफोन पर बातचीत करना। वह भी तब जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और चीन में तनाव चरम पर है। तीसरा-टीका नहीं लगवाने वालों के खिलाफ  सख्त कदम उठाना। चौथी घटना- शनिवार को ‘जस्टिस फॉर जे 6 रैली’ का शांतिपूर्ण समापन।
अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी के बाद बने माहौल से अमेरिका एवं स्वयं बाइडन की वैश्विक महाशक्ति और नेतृत्व की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। आम अमेरिकी से लेकर यहां के प्रमुख दोनों राजनीतिक दल-डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य अब उनके फैसले पर यह कहते हुए सवाल खड़े कर रहे हैं कि बाइडन ने इस कार्य के लिए जो प्रक्रिया अपनाई उसका तरीका ठीक नहीं था। अब ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। आलोचना सिर्फ विपक्षी दल रिपब्लिकन पार्टी ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के कुछ सांसद भी कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं, पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश।
भले ही बाइडन अपने इस फैसले को अब तक सही ठहराते हुए इसे ऐतिहासिक बता रहे हों, लेकिन उन्होंने बैठे-बिठाए पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बड़ा मुद्दा तो सौंप ही दिया, जो वे आने वाले चुनावों में इसे भुनाने का पूरा प्रयास करेंगे। आलोचना के केंद्र में यह बिंदु भी है कि बाइडन ने अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित निकालने का जो दावा किया था, उस पर भी वे खरे नहीं उतरे। दूसरा मुद्दा इस बात को लेकर भी है कि बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से टेलीफोन पर बात की। वह भी ऐसे वक्त पर जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी और अमेरिकी नौसेना में टकराव के हालात बने हुए हैं। इस मुद्दे पर बाइडन समर्थकों, यहां तक कि उनका स्वयं का भी यह मानना है कि लोकतंत्र में जब हम विश्वास करते हैं, तो हमें प्रतिस्पर्धी हो या हमारा विरोधी, संवाद ऐसा लाभदायक जरिया है जिसके माध्यम से तनाव को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। ऐसे में प्रतिद्वंद्वी की शिकायतों और अपेक्षाओं के बारे में जाना जा सकता है। सत्ता में आने के बाद उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन से ना सिर्फ फोन पर बल्कि योरोपीय दौरे के दौरान आमने-आमने बैठकर भी बातचीत की थी।
उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति से भी बिना शर्त बातचीत की पेशकश की थी, लेकिन दूसरे पक्ष ने बेरूखी अपनाई। इसके बावजूद प्योंगयांग से दक्षिण कोरिया से हुई बातचीत का बाइडन ने समर्थन किया। इसी क्रम में ईरान से भी बाइडन प्रशासन ने पांच बार औपचारिक रूप से बातचीत का सिलसिला बनाए रखा। ताकि वर्ष 2015 के समझौते को पुनर्जीवित कर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाया जा सके। अब जब ईरान में सत्ता की बागड़ोर इब्राहिम रईसी ने संभाली है, तो उन्होंने अनौपचारिक रूप से बातचीत नहीं की। फिर भी कतर और अन्य देशों के माध्यम से उनका प्रशासन संपर्क बनाए हुए है।
अब आते हैं अमेरिका में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए टीकाकरण अभियान को लेकर बाइडन प्रशासन की सख्ती के आदेशों को लेकर। इस महामारी से विश्व में सबसे अधिक कोई देश इस त्रासदी से घिरा है, तो वह अमेरिका ही है। जहां अब तक चार करोड़ से अधिक व्यक्ति संक्रमण का शिकार हुए। इनमें से करीब सा पौने सात लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है। अब इन दिनों वहां कोरोना वायरस के डेल्टा वैरियंट ने भी पांव पसार रखे हैं। इससे संक्रमितों की संख्या एक दिन में सवा लाख से अधिक तक जा पहुंची थी। मौतों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। ऐसे में वहां टीके के बूस्टर डोज देने का फैसला भी लिया गया है। जबकि वहां अभी आठ करोड़ लोगों ने टीके नहीं लगवाए। ऐसे में शिक्षकों, सौ से अधिक काम करने वाले प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को टीके लगाने की अनिवार्यता लागू की गई हैं। मास्क नहीं पहनने वालों का जुर्माना दुगना करने से लेकर जांचों की संख्या बढ़ाने जैसे निर्णय लिए गए हैं। शांतिपूर्ण रही जस्टिस फॉर जे 6 रैली: यह संतोष का विषय रहा कि शनिवार को राजधानी वाशिंगटन (डीसी) के कैपिटल हिल इलाके में ‘जस्टिस फॉर जे 6’ की रैली शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गई। गत छह जनवरी को संसद भवन में हुई हिंसा के आरोप में गिरफ्तार 63 लोगों के समर्थन में इस रैली का आयोजन किया गया था। इसमें सात सौ लोगों के शामिल होने की सुरक्षा प्रशासन ने इजाजत दी थी। लेकिन इसमें मुश्किल से पांच सौ लोग ही शामिल हो पाए। वैसे हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा बलों का काफी बंदोबस्त किया गया था।

         महेश चंद्र शर्मा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सामयिकी

अमेरिका में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए टीकाकरण अभियान को लेकर बाइडन प्रशासन की सख्ती के आदेशों को लेकर। इस महामारी से विश्व में सबसे अधिक कोई देश इस त्रासदी से घिरा है, तो वह अमेरिका ही है। जहां अब तक चार करोड़ से अधिक व्यक्ति संक्रमण का शिकार हुए। इनमें से करीब सा पौने सात लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है। अब इन दिनों वहां कोरोना वायरस के डेल्टा वैरियंट ने भी पांव पसार रखे हैं।
 

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