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Thursday 23rd of January 2020
 
ओपिनियन

राज काज में देखें क्या है खास

Monday, January 13, 2020 11:40 AM
कॉन्सेप्ट फोटो

इन दिनों एक चौकड़ी को लेकर चर्चा जोरों पर है। हाथ वालों के साथ भगवा वालों की नजरें भी इस चौकड़ी पर टिकी है। चौकड़ी में शामिल भाई लोग भी कम नहीं है। सूबे के चुनावों में हाथी पर सवार हो सबसे बड़ी पंचायत की चौखट तक पहुंचे थे, लेकिन अब हाथ से हाथ मिलाकर उसके साथ ही जीने और मरने की कसमें खा ली हैं। चौकड़ी किसी एक इलाके से नहीं, बल्कि शेखावाटी के उदयपुरवाटी के साथ करौली, तिजारा और नगर से ताल्लुकात रखती है।

राज का काज करने वालों में चर्चा है कि चौकड़ी को देख कमल वालों पर नहीं, बल्कि हाथ वाले भाई लोगों के चेहरों पर सलवटें साफ दिखाई देती हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकानेदार तो उनसे हाथ मिलाने के बजाय हाथ जोड़ने में ही अपनी भलाई समझते हैं।

कमल वालों का संकट
मरु प्रदेश में इन दिनों सबसे ज्यादा संकट में कमल वाले भाई लोग हैं। हाथ वाले अशोक भाई के तुरुप के पत्ते को वे न तो निगल पा रहे हैं और न ही उगल पा रहे हैं। किसी के सामने खुल कर जुबान भी नहीं खोल पा रहे। और तो और खुद की जाजम पर भी एक साथ बैठने से पहले अगल-बगल वालों को घूर कर देख रहे है। अब देखो ना सदर के बाद भी जहाज हवा में हिचकोले लेते नजर आ रहा है। सदर भी कुछ ज्यादा ही युवा नजर आने की कोशिश में जुटे हैं, जिनका मन पिंकसिटी में ही रमता है। अब कमल वालों को कौन समझाए कि गांवों की सरकार के चुनावों में ज्यादा सफलता दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। यदि ऐसा हुआ, तो पार्टी एक बार फिर अपनी हार के मुहाने पर खड़ी दिख रही है।

अच्छा और बुरा दौर
इन दिनों सूबे में अच्छे-बुरे दौर को लेकर बहस छिड़ना शुरू हो गई। बहस करने वाले न कोई समय देख रहे और न ही स्थान।  सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ ही भारती भवन भी इससे अछूता नहीं है। राज का काज करने वाले भी आधे से ज्यादा वक्त बहस में गुजार रहे हैं। बहस इस बात की है कि इस समय अच्छा दौर किसका चल रहा है। बड़ी चौपड़ से लेकर इंदिरा गांधी भवन तक बहस छिड़ी है कि मामला इन फेवर आॅफ अशोकजी एण्ड अगेंस्ट सैकण्ड लीडर है, बीच में किसी का कोई लेना देना नहीं है। जो सैकण्ड लीडर के पक्ष में है, वो सबके पास जाएंगे और जो जोधपुर वाले अशोकजी के फेवर में है, वो कहीं नहीं जाएंगे। अब उनको कौन कहे कि समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।

दिल्ली से दिल्लगी
राज का काज करने वाले कई साहबों को अचानक दिल्ली से दिल्लगी हो गई, जबसे उनका दिल दिल्ली पर आया है, तब से दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो गई। सूबे के एक दर्जन से ज्यादा बड़े साहबों को दिल्ली से प्रेम हो गया। वह दिल्ली के लिए हाथ पैर भी मारने के साथ जोड़-तोड़ भी बिठा रहे हैं। हमने भी पता लगाया तो माजरा समझ में आया कि कई बड़े साहब किसी न किसी बहाने अभी सूबे के राज से दूर और नमो मंडली से नजदीकियां बनाने के जुगाड़ में हैं। इसके लिए दिल्ली सबसे बढ़िया जगह है। अभी डेपुटेशन करा कर दिल्ली में बैठो और नमो मंडली से मेल मुलाकात करो। बाद में वापस आकर मनमाफिक कुर्सी के मजे लो।

एक जुमला यह भी
इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि एकजुटता के मंत्र को लेकर है। राज के मुखिया मंत्र को सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, मगर उसका कोई असर नहीं दिख रहा। दो गुटों में बंटी सूबे की कांग्रेस के नेता अपनी-अपनी ढपली और अपना अपना राग अलाप रहे हैं। दोनों गुटों के झण्डे सिविल लाइन्स में लहराते हैं। झण्डों के फेर में फंसे हाथ वाले भाई लोगों को चिंता सता रही है कि मकर संक्रांति को दूसरों की पतंग की डोर काटने के चक्कर में एकजुटता का मंत्र कहीं दूर की कोड़ी साबित नहीं हो जाए।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)
 

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