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ओपिनियन

रक्षा-बंधन विशेष: स्वयं ही स्वयं की रक्षा का वचन लें

Saturday, August 21, 2021 14:20 PM
अगर आप स्वयं से प्यार करते हैं तो पांच राखियां अपने आपको जरूर बांधें।

रक्षा बंधन यानी रक्षा का वचन। रक्षा करने के लिए वचनबद्ध होना, रक्षा का प्रण लेना। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर भाइयों के प्रति अपना स्रेह-दुलार प्रकट करती, उनके लिए मंगलकामना करती हैं। वहीं दूसरी ओर भाई अपनी बहनों के रक्षा-सूत्र के बदले उनकी रक्षा का वचन देते हैं। पुराने जमाने में ब्राह्मण, पुरोहित लोग अपने यजमानों को, राजाओं को राखी बांधते थे और बदले में राजा लोग ब्राह्मणों, पुरोहितों की रक्षा का वचन देते थे। उनके पालन-पोषण का जिम्मा लेते थे। कालांतर में यह प्रथा धीरे-धीरे लुप्त हो गई। उधर भाई बहनों के प्यार में भी कमी आने लगी है। कारण चाहे जो भी रहे हों पर, अब वो बात नहीं। इधर बहनें भाइयों को कोरियर से राखी भेज देती हैं,कई बार ई-राखी भी भेज देती हैं।
उधर भाई लोग भी पेटीएम करके अपना फर्ज निभाकर  इतिश्री कर लेते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे एक औपचारिकता बनकर रह गया है ये त्योहार। सूचना तकनीक के युग मे भावनाएं समाप्त होती प्रतीत होती हैं। वर्ष में एक बार राखी और पैसों का लेन-देन हो जाता है और फिर वर्ष भर कोई किसी की खबर नहीं लेता। हां, कुछ अपवाद हो सकते हैं इसके, पर कमोबेश यही स्थिति देखने को मिलती है। ये तो हुई प्रचलित रक्षाबंधन की बात। चलिए रक्षाबंधन को एक नई दृष्टि देते हैं। आज से  स्वयं ही स्वयं को राखी बांधते हैं और स्वयं ही स्वयं की रक्षा करने का वचन लेते हैं। अगर आप स्वयं से प्यार करते हैं तो ये पांच राखियां अपने आपको जरूर बांधे।
हमारा यह जो शरीर है यह एक पांच मंजिला भवन है, इसके पांच तल हैं। यथा-अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष। तो आइए आज हम स्वयं के पांच राखी बांधे और इन पांचों की रक्षा करने का वचन लें। ये जो हमारा स्थूल शरीर है यह अन्न से बना है। इसलिए इसे अन्नमय कोष कहते हैं। इसकी रक्षा करने के लिए हमें उचित आहार-विहार पर ध्यान देना होगा। नित्य-प्रति व्यायाम करें,उचित मात्रा में नींद ले, पौष्टिक आहार लें, खूब पानी पीयें। स्वाद के लिए सेहत से समझौता नहीं करें। किसी के दबाव या प्रभाव में आकर अपना स्वभाव न छोडंÞे। स्वाद वाली चीजों से कभी सेहत नहीं बनती उल्टा स्वाद के चक्कर में स्वास्थ खराब हो जाता है। शरीर में लोच बनी रहे इसके लिए स्ट्रेचिंग वाली कसरत, व्यायाम करें। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हड्डियों की लोच खत्म होने लगती है,जरा-सा फिसलने या गिरने से ही हड्डी चटक जाती है। जबकि बच्चा ऊंचाई से गिर जाए तो भी उसकी हड्डी नहीं टूटती, क्योंकि उसकी हड्डियों में लोच रहती है। इसलिए अपने शरीर को लचीला बनाए।
ह्रदय ठीक प्रकार से काम करता रहे, इसके लिए साइकिलिंग, तैराकी, तेज चलना, दौड़ना आदि में से किसी को भी अपनी सुविधानुसार चुन सकते हैं। दूसरी राखी अपने प्राणों पर बांधे और अपने प्राणों की रक्षा का वचन लें। हमारे शरीर में जो जैविक ऊर्जा या बायो इलेक्ट्रिसिटी है उसे ही प्राण ऊर्जा कहते हैं। हमारे शरीर में पांच प्राण और पांच उप प्राण हैं, जो सारे शरीर में फैले हुए हैं। ये है-अपान,उदान, समान, व्यान और प्राण। इनका संतुलन बिगड़ा नहीं कि बीमारियां शुरू। अत: इनका ठीक संतुलन बना रहे इसके लिए नित्य प्रति कुछ प्राणायाम करने की आदत डालें। जैसे अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भ्रामरी, भस्रिका, उज्जाई आदि पांच प्राणायाम तो नित्य प्रति आधे घण्टे करने की आदत डालें। शरीर का तीसरा कोष है मनोमय कोष, यहां मन की प्रधानता होती है। मन को ठीक रखने के लिए इसे रोग, शोक, भोग, अवसाद, पलायन और नकारात्मक विचारों से दूर रखें तो मन का रक्षण होगा और मन प्रसन्न रहेगा। चौथी राखी विज्ञानमय या बौद्धिक कोष को बांधे। ताकि आपकी बुद्धि ठीक रहे।अपने बौद्धिक स्तर को ठीक रखने के लिए रोज-रोज नया जानते-सीखते, पढ़ते  रहे। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। एक विद्यार्थीपन आप में हमेशा बना रहे। ये ना सोचें कि ‘बूढ़ा तोता अब क्या खाक सीखेगा’,अब तो उम्र ही नहीं बची, अब पढ़कर क्या करेंगे। विनोबा भावे अस्सी वर्ष की उम्र में एक नई भाषा सीख रहे थे, तुलसीदास जी ने 75 वर्ष की उम्र में रामचरितमानस की रचना की थी। अत: जानना, सीखना, पढ़ना हमेशा जारी रखें, इससे बुद्धि तीक्ष्ण बनी रहेगी। पांचवीं राखी अपने आनंदमय कोष को बांधें। यह हमारी आत्मा का तल है। आत्मा का भोजन है परमात्मा इसे परमात्मा की खुराक दें। ध्यान में बैठना सीखे,अपने आपको खाली करना सीखें। कुछ देर भगवान की याद में बैठें, उन्हें धन्यवाद करना सीखें। शिकायती बनकर न जिए। किसी योग्य गुरु से ध्यान सीखे और इसका अभ्यास करें।
इस तरह से इस बार ये पांच राखी अपने पांचों तलों को बाँधे, फिर जीवन में आनंद ही आनंद है। याद रखे ंदुनिया का बडेÞ से बड़ा हाथ आपको बड़ा नहीं बना सकता, आपको स्वयं ही प्रयास करना होगा, बड़ा बनने के लिए। अगर आप स्वयं से प्यार करते हैं तो ये पांच राखियां अपने आपको जरूर बांधें और स्वयं ही स्वयं की रक्षा करने का वचन लें।
        -ललित शर्मा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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