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जम्मू कश्मीर के लिए नए सूरज का उदय

Monday, November 04, 2019 10:40 AM
जम्मू कश्मीर के लिए नए सूरज का उदय।

जम्मू कश्मीर में नए सूरज का उदय हुआ है। सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म दिवस से अनुच्छेद 370 खत्म करने का विधान तथा जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू होने के साथ जम्मू कश्मीर के चरित्र एवं ढांचे में आमूल परिवर्तन आ गया है। इसे लागू करने का सरदार पटेल की जंयती से बेहतर दिन नहीं हो सकता था। उन्होंने अपनी दृढ़तापूर्ण भूमिका से 563 रियासतों को भारत का अभिन्न अंग बना दिया, लेकिन जम्मू कश्मीर का पूरा निर्णय उनके हाथों नहीं था। जम्मू कश्मीर का राज्य का वास्तविक विलय भारत में अब हुआ है। इसका पहला प्रकट प्रमाण तब मिला जब श्रीनगर स्थित राज्य सचिवालय में राष्ट्रध्वज के साथ लहराने वाला जम्मू-कश्मीर का ध्वज 67 साल बाद 25 अगस्त को उतार दिया गया। इस तरह एक देश, एक विधान और एक निशान का सपना साकार हो गया। जम्मू कश्मीर के कुछ निहित स्वार्थी राजनीतिक समूहों को छोड़ दे आम जनता और सरकारी कर्मचारी तक 370 एवं 35 ए के शिकंजे में जकड़े हुए थे जिसका अंत हो गया है। वहां के वंचित समूहों को भी वही अधिकार मिला है जो शेष देश के लोगों को प्राप्त है।

किसी दृष्टि से यह अब पहले वाला जम्मू कश्मीर नहीं है। राजनीतिक-प्रशासनिक स्तर पर दो भागों में बंटा केन्द्र शासित प्रदेश हैं। लद्दाख एक अलग संघीय प्रदेश है जिसका स्वरुप चंडीगढ़ की तरह है जहां विधानसभा नहीं, उपराज्यपाल ही सब कुछ। जम्मू कश्मीर दिल्ली की तरह एक केन्द्रशासित प्रदेश है जहां विधानसभा होगी, मुख्यमंत्री-मंत्री होंगे तथा हर 5 वर्ष पर निर्वाचन होगा। पहले पूरे देश से अलग यहा 6 साल पर चुनाव होता था।  निस्संदेह, इस परिवर्तन का प्रभाव व्यापक होगा। ऐतिहासिक कदम के परिणाम भी ऐतिहासिक होते है। अब केन्द्र को किसी कानून को स्वीकार कराने के लिए जम्मू कश्मीर की सरकार को मनाने की जरुरत नहीं होगी। संविधान की हर धारा और कानून के हर प्रावधान में ‘जम्मू कश्मीर को छोड़कर’ शब्दावली खत्म हो गई है। राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर उपराज्यपाल प्रमुख प्रशासक होंगे। विधान परिषद को खत्म किया जा चुका है।

जाहिर है, केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति दिल्ली और केंद्र शासित पुडुचेरी के मुख्यमंत्री के समान होगी। मुख्यमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ विधायकों को ही मंत्री बना सकेंगे। इसके अलावा राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक या प्रस्ताव को उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद ही लागू किया जा सकेगा। उपराज्यपाल चाहें तो किसी भी विधेयक या प्रस्ताव को नकार सकते हैं। उनके लिए मुख्यमंत्री या राज्य विधानसभा के प्रस्ताव को मंजूरी देना बाध्यकारी नहीं होगा। राज्य विधानसभा का कार्यकाल भी 5 साल ही रहेगा, जबकि एकीकृत जम्मू कश्मीर में यह 6 साल था। हालांकि राजस्व विभाग पूरी तरह राज्य सरकार के अधीन होगा। कृषि भूमि, कृषि ऋण, कृषि भूमि के हस्तांतरण-स्थानांतरण के अधिकार, उद्योगों के लिए जमीन देना राज्य सरकार के अधीन ही होगा। शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं संबंधी अधिकार भी राज्य सरकार के अधीन ही रहेंगे।

यह जम्मू कश्मीर के संदर्भ में आमूल परिवर्तन है। 106 केंद्रीय कानून लागू होने के साथ 153 प्रादेशिक व राज्य अधिनियम के तहत बने 11 कानून समाप्त हो गए हैं। जैसा हम जानते हैं अनुच्छेद 370 लागू होने के चलते जम्मू कश्मीर देश का एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसका अपना संविधान था। यह संविधान जम्मू कश्मीर राज्य विधानसभा को अपने स्तर पर कानून बनाने और किसी केंद्रीय कानून के राज्य में क्रियान्वयन को रोकने में समर्थ बनाता था। अलगाववाद को प्रोत्साहित करने वाली यह खतरनाक व्यवस्था खत्म हो गई। जो नए कानून लागू होंगे उनमें राष्टÑीय मानवाधिकार अधिनियम, केंद्रीय सूचना अधिनियम, शिक्षा अधिकार अधिनियम, शत्रु संपत्ति अधिनियम और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर रोक संबंधी कानून व राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम मुख्य हैं। जिनमें संशोधन होगा वे हैं, संपत्ति स्थानांतरण अधिनियम, जम्मू कश्मीर एलाइनेशन आॅफ लैंड एक्ट, जम्मू कश्मीर भूमि अनुदान अधिनियम, जम्मू कश्मीर कृषि व कृषक सुधार अधिनियम में नई व्यवस्था के मुताबिक आवश्यक संशोधन किया जाएगा।

इनको देखने के बाद आप स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जम्मू कश्मीर के लोग किस तरह देश को प्राप्त अन्य अधिकारों और सुविधाओं से वंचित थे। मानवाधिकार के लिए छाती पीटने वालों को इसका जवाब देना चाहिए कि जम्मू कश्मीर ने इसे लागू क्यों नहीं किया? इसी तरह सूचना अधिकार से जम्मू कश्मीर के लोग वंचित रहे। जो राज्य 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार जैसा कानून 370 के तहत मिले विशेषाधिकार के कारण स्वीकार करने को तैयार नहीं हो उसे क्या कहा जाएगा? इससे पता चलता है कि अनुच्छेद 370 किस तरह कुछ नेताओं एवं प्रभावी लोगों के लिए हर तरह के अधिकार सुनिश्चित करने वाला तथा आम नागरिकों को वंचित करने वाला था। यह पश्चिमी देशों में मध्यकालीन सामंती व्यवस्था का प्रारुप था जिसका प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं। जरा सोचिए, भ्रष्टाचार निरोधक कानून देशभर में लोक सेवकों को कठघरे में खड़ा कर रहा है लेकिन जम्मू कश्मीर में नहीं। अब किसी के खिलाफ  कार्रवाई हो सकती है। राज्यपाल शासन में राज्यपाल सतपाल मलिक ने भ्रष्टाचार पर काफी काम किया। भ्रष्ट तंत्र पर चोट शुरू कर दी और हजारों करोड़ के घोटाले सामने लाए। मगर कानूनों के अभाव में भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा पूरी तरह नहीं कसा जा सका। कानून लागू होने के साथ सख्त कार्रवाई संभव हो सकेगा। इसके दायरे में बड़े-बड़े लोग आ सकते हैं।              
अवधेश कुमार (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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