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ओपिनियन

राजकाज

Monday, September 06, 2021 10:40 AM
कॉन्सेपट फोटो

रिपोर्ट कार्ड ने उड़ाई नींद

सूबे में गांवों की सरकार के चुनावों में रिपोर्ट कार्ड क्या आया, कइयों की नींद उड़ गई। हवाई किले बनाने वाले दोनों दलों के कुछ भाईसाहबों की हालत तो देखने लायक है। हाथ वाले भाई लोगों को तो कुर्सी जाने का खतरा समझ में आता है, लेकिन भगवा वाले भाईसाहबों का माजरा समझ से बाहर है। सूबे के सदर तक की हालत ठीक नहीं है। भगवा के हरबोले की दशा तो उसी के क्षेत्र के वर्कर्स ने बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूरे सूबे में अपनी मजबूत पकड़ का दावा करने वाले बड़े नेता अपनी ही भूमि पर चारों खाने चित्त हो गए। अब इनको कौन समझाए कि यह पब्लिक है, यह सब जानती है। अब तो कुछ को ही पहचानने की जरूरत है।

चिढ़चिढ़ेपन का बड़ा ग्राफ
सूबे में भगवा वाले भाईसाहबों के एक खेमे के लोगों में इन दिनों चिढ़चिढ़ेपन का ग्राफ एकदम बढ़ गया है। बढ़े भी क्यों नहीं, बेचारों के पास और कोई चारा भी तो नहीं है। अब देखो ना पिछले दिनों भृर्तहरि की भूमि वाले जिले में आनन-फानन में कुछ वर्कर्स को जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन कारसेवकों ने एक हार्ड कोर वर्कर की यह कहकर सेवा कर दी कि जिसको जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह मैडम की टीम का एक्टिव मेम्बर है। मैडम के नाम से ही चमक नींद सोने वाले नेताजी ने शाम को ही ऑर्डर देकर होप सर्कस वाले डिस्ट्रिक्ट के सदर के फरमान को बदल दिया। फिलहाल वसु टीम के मेम्बर्स के पास मंद-मंद मुस्कुराने के सिवाय कोई इलाज भी तो नहीं है।


अंदरुनी स्ट्रांग
इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में रोजाना कोई न कोई नई बहस छिड़ती है। इसका असर भगवा तक को मार करता है। इस बार की बहस जोधपुर वाले भाई साहब को लेकर है। उसका मुद्दा भी कोई छोटा मोटा नहीं, बल्कि प्लस-माइनस को लेकर है। चर्चा है कि सूबे में जो कुछ हो रहा है, उससे तो जोधपुर वाले भाईसाहब की अंदरुनी दबंगता उभरी है। यह बात अलग है कि चेहरा दबाव में दिखता है। पहले वाले राज में इसका उलटा था। अब देखो ना देवनारायण के वंशज ने फिर से हुंकार भरी तो भाईसाहब ने भी मैसेज दे दिया कि अब दादागिरी चलने वाली नहीं है। मैसेज का असर भी दोनों तरफ जुबान पर है।


यह पब्लिक है....
यह पब्लिक है, सब जानती है......। फिल्मी गाने की इन लाइनों को गुनगुनाने वालों की संख्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर हर कोई जानबूझकर इन लाइनों को गुनगुनाता है। कई दिल जले तो मैसेज देने के लिए चाय की दुकान से लेकर पान की थड़ी तक ऊंची आवाज में भी गाते हैं। पीसीसी में खुसरफुसर है कि छह जिलों में गांवों की सरकार के चुनाव में पब्लिक ने हाथ वालों को ऑक्सीजन तो दे दी, मगर दिग्गजों के इलाकों में जो कुछ किया, वह सिर्फ खुद ही जानती है। पब्लिक ने मैसेज दे दिया कि अब जल्द ही नए चेहरों की तलाश के लिए कॉम्पिटिशन की जरूरत है। मैसेज को समझने वाले तो समझ गए ना समझे वो अनाड़ी हैं। बाकी पब्लिक तो सब जानती है।


एक जुमला यह भी
इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर इन दिनों एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी छोटी मोटी नहीं, बल्कि बदलाव के हवाई किलों को लेकर है। खास बात यह है कि चर्चा में रोजाना कुछ न कुछ नया शगूफा जुड़ जाता है। लेकिन हमें गांधी टोपी वाले बुजुर्ग भाईसाहब की बात में कुछ दम नजर आया। भाईसाहब बोले कि हाथ वाले किसी भी मुखिया को घर का रास्ता दिखाया जाता है, तो मैडम कई महीनों पहले से ही किनारा कर लेती हैं। यहां तक कि वेटिंग पीएम राजकुमार भी किसी न किसी बहाने कन्नी काटते हैं। लेकिन यहां तो एक हफ्ते पहले ही राजकुमार से और बुध को ही मैडम से गुफ्तगू जो हुई है। अब इन हवाई किले बनाने वालों को कौन समझाए कि जब कुछ ठीक ठाक है।

    एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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