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केन्द्र की सत्ता से अब भी दूर क्यों है राजस्थान

Saturday, May 04, 2019 09:35 AM

किसी भी प्रदेश के विकास में उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन इन सबकी संरचना और सुरक्षा शासन-प्रशासन के योगदान तथा राजनीतिक परिवेश पर काफी हद तक निर्भर करती है। आज की स्थिति में यह समझना आवश्यक हो गया है कि राज्यों में होने वाले विकास में राजनीतिक भूमिका का निर्वहन कितनी ईमानदारी से हो रहा है। इस नजरिए से अगर हम दूसरे प्रदेशों की तुलना राजस्थान से करें, तो पाएंगे कि सांस्कृतिक स्तर पर तो राजस्थान काफी मजबूत और महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक विकास की दृष्टि से आज भी उतना विकसित नहीं हो सका है, जितनी संभावनाएं रही हैं।

इसके पीछे एक तरफ जल जैसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों का अभाव है, तो वहीं राज्य के नेताओं की केन्द्र में राजनीतिक भूमिका की कमी भी है। हालांकि, राजस्थान में कद्दावर नेताओं की केन्द्र तक बेहतर पकड़ और पहुंच है, परन्तु ये नेता गिने-चुने ही हैं। देश में सबसे ज्यादा क्षेत्रफल वाले राजस्थान की ही तरह मध्य प्रदेश में भी कद्दावर नेता उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। वहीं, अगर दूसरे प्रदेशों, मसलन हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिन्दी राज्यों के राजनीतिक पटल पर नजर डालें, तो दर्जनों कद्दावर नेता मिल जाएंगे।

इसके कई कारण भी हैं। एक कारण यह है कि राजस्थान के लोगों में हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों के लोगों की तरह राजनीतिक रुचि व जागरूकता का अभाव है। इन राज्यों में पान के खोखे से लेकर चाय की दुकानों तक, यहां तक कि यात्राओं के दौरान हर दूसरा व्यक्ति राजनीतिक चर्चा करता दिखाई दे जाता है। इन राज्यों में राष्ट्रीय स्तर के अलावा राज्य स्तरीय तथा क्षेत्रीय पार्टियां भी अनेक हैं। दूसरा कारण यह है कि इन राज्यों के आम लोगों में राजनीतिक रुचि पैदा करने और छोटे-छोटे दलों को उभारने में मीडिया का बड़ा योगदान रहा है। राजस्थान में जहां आम लोग राजनीति में उतनी रुचि नहीं रखते, वहीं छोटे-छोटे दलों का या तो अभाव है या वे राज्य स्तर पर उतने चमक नहीं पाए है।

हरियाणा में जहां कांग्र्रेस और भाजपा बड़ी पार्टियां हैं, तो वहीं इनेलो, बसपा, जननायक जनता पार्टी, लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी, आम आदमी पार्टी ने भी अपना वर्चस्व कायम किया है। हालांकि, हाल-फिलहाल हरियाणा में जाटों और ब्राह्मणों के बगैर सत्ता कायम करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है, लेकिन दलित-पिछड़ों और मुसलमानों के राजनीतिक उभार में छोटे-छोटे दलों की महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणवाद और राजपूताना वर्चस्व के बावजूद कांशीराम और राम मनोहर लोहिया जैसे दिग्गज नेताओं ने दबे-कुचले वर्गों के लिए बड़ा राजनीतिक मैदान तैयार कर शासन करने का बेहतरीन मौका दिया, जिसके चलते मायावती और मुलायम सिंह जैसे नेता कई बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो सके।

बिहार में भी राजपूतों, भूमिहारों, कायस्थों और ब्राह्मणों के वर्चस्व को हल्का करके ओबीसी-एससी का राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने में जय प्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर और जगदेव प्रसाद का अभ्युदय हुआ। इन लोगों से प्रेरित होकर उस समय छात्र नेताओं के रूप में उभर रहे राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, नीतिश कुमार, शरद यादव और कुछ समय बाद जीतन राम मांझी जैसे लोगों ने दलित-ओबीसी की राजनीति को मजबूत किया। वहीं राजस्थान में आज भी वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत का वर्चस्व कायम है।

वैसे तो अन्य नेताओं ने भी राज्य की कमान संभाली है, लेकिन उनमें अधिकतर राजपूत और ब्राह्मण ही थे। राजपूतों-ब्राह्मणों के इस राजनाीतिक किले को गुर्जर नेता राजेश पायलट ने भेदा और गुर्जरों का वर्चस्व कायम किया। सन् 2000 में उनकी मृत्यु के चार साल बाद उनके बेटे सचिन पायलट ने कांग्र्रेस में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में गुर्जरों का नेतृत्व शुरू किया, जो कि आज राजस्थान के उप मुख्यमंत्री हैं। अल्पसंख्यक वर्ग के एक और पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया, जो कि जैन समुदाय से थे, चार बार राजस्थान की सत्ता पर काबिज रहे, लेकिन उनके बाद इस समुदाय का नेतृत्व करने को कोई कद्दावर नेता नहीं उभर सका।

हालांकि, बीते तीन दशक से छोटे स्तर पर या यह कहें कि क्षेत्रीय राजनीति में जाट, मीणा और अन्य जातियों के नेता भी उभर कर सामने आए हैं, जिनकी संख्या आज अच्छी-खासी है। पर वे अभी तक राज्य के मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सके हैं। उप मुख्यमंत्री पद पर कुछ जरूर रहे हैं। लेकिन, इतिहास गवाह है कि राजस्थान की सियासत और रियासत में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है। कहने का मतलब है कि जिन घरानों के पास रियासत थी, ज्यादातर वही घराने सियासत में आज भी धाक जमाए हुए हैं। भारत में ईस्ट-इण्डिया कंपनी के राजनयिक रहे कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘एनल्स एण्ड एंटीक्विटीज आॅफ राजस्थान में लिखा है कि ‘राजपूतों के बिना हिन्दुस्तान के इतिहास की कल्पना नहीं की जा सकती।

हिन्दुस्तान के कई राज्यों में यह बात गलत साबित होती दिखाई दे रही है, लेकिन राजस्थान के राजनीतिक संदर्भ में आज भी यह बात सटीक दिखाई देती है। 1952 में पहले आम चुनाव के दौरान से ही राजस्थान की राजनीति का ताना-बाना राजपूतों के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है। राजपूतों का प्रभाव इतना था कि राजशाही के धुर विरोधी प्रजामण्डल आंदोलन के प्रमुख नेता जयनारायण व्यास को भी जसवंत सिंह जैसे जागीरदारों को कांग्र्रेस में शामिल करने की पैरवी के लिए मजबूर होना पड़ा।

हालांकि, राजस्थान की राजनीति में हमेशा से जाटों का भी बड़ा महत्व रहा है, लेकिन अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के सियासही वर्चस्व के चलते राज्य की जाट राजनीति शून्यता की ओर चली गई। राज्य की ताकतवर जाति होने के बावजूद भी इस समुदाय को उतना महत्व नहीं मिला, जिसकी इसे उम्मीद थी। हालांकि, इन दिनों हनुमान बेनीवाल जाट राजनीति को फिर से चमकाने की भरपूर कोशिश में लगे हैं। दूसरी ओर राजस्थान की अपेक्षा उत्तर प्रदेश और बिहार ने अधिक मंत्री केन्द्र को दिए हैं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश ने देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए हैं। हालांकि, बिहार इस मामले में पिछड़ा रहा है। मगर दोनों राज्यों से राष्ट्रपति भी चुने जा चुके हैं।

इसका कारण यह है कि राजस्थान में उत्तर प्रदेश और बिहार के बराबर लोकसभा और राज्यसभा की सीटें नहीं हैं, जिसके चलते अभी तक इस राज्य से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पद को कोई सुशोभित कर सका है। यहां तक कि गुजरात में राजस्थान से सिर्फ एक लोकसभा सीट अधिक है, और वहां से अब तक दो प्रधानमंत्री देश को मिल चुके हैं। हां, उप राष्ट्रपति के पद पर भैरोसिंह शेखावत रह चुके हैं।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से राजस्थान के आम लोगों में भी राजनीतिक जागरूकता आई है। देखना यह है कि क्या कभी कोई अन्य वर्ग राजस्थान के राजपूताना और ब्राह्मणवादी किले को भेदकर अन्य जातियों का राजनीतिक वर्चस्व हमेशा के लिए काम कर सकेगा। फिलहाल गुर्जर नेता सचिव पायलट एक प्रभावशाली हुआ चेहरा है।
- विकास बंसल

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