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Wednesday 3rd of June 2020
 
ओपिनियन

विकास और सद्भाव में क्यों राजनीति

Thursday, February 13, 2020 10:25 AM
फाइल फोटो

हम ज्ञान-विज्ञान की चक्की में कुछ इस तरह पिस रहे हैं कि शासन का राजपथ तो अहंकार से गरज रहा है, लेकिन जनपथ की जनता तमाशबीन हो गई है। 5 साल तक शासन को भुगतने और बदलने में ही रोते-चिल्लाते बीत जाता है, लेकिन किसान मजदूर, बेरोजगार और ईमानदार का भाग्य कभी नहीं बदलता। समझ में नहीं आता कि यदि जन प्रतिनिधि ईमानदार हैं तो फिर उनकी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था चोर कैसे है और जब अली बाबा साक्षात धर्मराज का अवतार है, तो फिर उनके चालीस चोर शासन व्यवस्था में क्या भूमिका निभाते हैं, क्योंकि हम लोकतंत्र और अधिनायकवादी सरकारों के चेहरे, चाल और चरित्र को पिछले 72 साल से देख रहे हैं और ऐसा अनुभव कर रहे हैं कि यहां समझदार और सदाचारी ही सबसे पहले मारा जा रहा है और दुनिया कह रही है कि जिसके पास लाठी है। वही दीन-हीन जनता को अपने शाम, दाम, दण्ड, भेद से हांक रहा है। ये देखते-देखते भी हम भारत के लोग इतना थक गए हैं कि लुटती और पिटती जनता ही मंदिर में बिना बुलाए अधिक जा रही है, लेकिन अपने चुने हुए नुमाइन्दों के पास न्याय के लिए कमजोर ही है।

आश्चर्य ये भी है कि यहां हर शासक अपने को सम्राट और महान समझ रहा है, लेकिन किसी के पास दीने-इलाही बनने की औकात नहीं है और जो भी नवरत्नों की इस सभा में शामिल है वो भी रात दिन राग दरबारी ही बजा रहे हैं। नतीजा ये है कि सरकार भी बदल जाती है, दरबारी भी बदल जाते हैं और विधि-विधान भी बदल जाते हैं लेकिन नौकरशाही का दिल और दिमाग नहीं बदलता और हर कामदार गरीब फरियादियों को दुत्कारता तथा फटकारता ही रहता है। इस लोकतंत्र के हाकिम इतने बेरहम भी होते हैं कि आंख- मीचकर सजा भी सुनाते हैं और न्याय के लिए गिड़गिड़ाने वाले को अपील पर अपील करने की लाइन में भी धकेल देते हैं और इस तरह पीड़ित अदालतों के चक्कर खाता-खाता ही मर जाता है। अराजकता और अविश्वास से भरी ऐसी शासन व्यवस्था का आज ये परिणाम है कि कोई पार्टी और सरकार एक बार चुनाव जीतकर दूसरी बार लोकप्रियता से चुनाव नहीं जीत पा रही है। हालत ये बन गई है कि दुनिया में सबसे अधिक समय तक भारत में चुनाव जीतने वाली कांग्र्रेस पार्टी आज अपना वजूद बचाने को जूझ रही है तो बंगाल में सबसे अधिक चुनाव जीतने वाली कम्युनिष्ट पार्टी भी अपना इंकलाब का नारा लगाना भूल गई है। लोकतंत्र के इस चक्रव्यूह में जो भी अभिमन्यु जाता है वो मारा ही जाता है और चोर-साहूकार सभी मिलकर गांधी की लाठी-लंगोट और आम्बेडकर के संविधान को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं। जैसे तुलसीदास को भगवान राम नचाते थे, वैसे ही अब लोकतंत्र को कालेधन की अर्थव्यवस्था नचा रही है तो गांधी की सत्य और अहिंसा अच्छे दिनों के इंतजार में लाचार है, क्योंकि पांच साल सरकार के हैं तो केवल एक दिन हम भारत के लोगों का है।

हम ज्ञान-विज्ञान की चक्की में कुछ इस तरह पिस रहे हैं कि शासन का राजपथ तो अहंकार से गरज रहा है लेकिन जनपथ की जनता तमाशबीन हो गई है। पांच साल तक शासन को भुगतने और बदलने में ही रोते-चिल्लाते बीत जाता है लेकिन किसान मजदूर, बेरोजगार और ईमानदार का भाग्य कभी नहीं बदलता। इधर 2020 में आते-आते इतना विकास और परिवर्तन भी आ गया है कि बाजार के धनपति ही सरकार को चला रहे हैं, तो हमारे सरकार बहादुर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार को पीछे धकेलकर रक्षा प्रति रक्षा का बजट ही लगातार बढ़ा रहे हैं। क्योंकि सरकार अपनी असफलताओं से डरी हुई है और जनता के हर सच को राष्ट्र विरोधी मान रही है तथा जनता से अधिक पुलिस प्रशासन और फौज पर भरोसा कर रही है। लोकतंत्र के इस भीतरी बदलाव का दबाव अब इतना बढ़ता जा रहा है कि सरकार नागरिकता कानून को बदलकर हम भारत के लोगों को बदलने पर आमादा है तो धारा 370 को हटाकर कश्मीर और भारत के 20 करोड़ मुसलमानों का विश्वास जीतने की महाभारत कर रही है। इस तरह लोकतंत्र में अब व्यक्ति और वंशवाद का विरोध करने वाले भी गाय, गंगा और गीता की सौगन्ध खाकर राष्ट्रवाद की वैतरणी पार करने का जतन कर रहे हैं। दिलचस्प बदलाव तो ये है कि हमारा लोकतंत्र भी धीरे-धीरे युवाओं, महिलाओं और शोषित, पीड़ितों के साथ खड़ा हो रहा है तो सरकार और व्यवस्था के अहंकार, भय और आतंक का ‘शाहीन बाग’ की तरह शांतिपूर्ण सत्याग्र्रह से विरोध कर रहा है। गांधी को शहीद करने वाली व्यवस्था और मानसिकता अब खुद भयभीत होकर संसद, बहुमत और संविधान की दुहाई दे रही है। ऐसे में गांधी और हिन्दू राष्ट्रवाद का चेहरा और मुखौटा लगाकर लोकतंत्र को गुलाम बनाने वाली सभी शासन व्यवस्थाओं को अब ये समझ लेना चाहिए कि जैसे झूठ के पांव नहीं होते हैं वैसे ही मानवता से बड़ा कोई धर्म और सामाजिक, आर्थिक न्याय से बड़ा कोई भविष्य नहीं होता है। जनता का मूड़ बदल रहा है और अब 2016 के बाद से एक के बाद दूसरे राज्य के चुनावों में सरकारों का हुलिया भी बदल रहा है। ये लोकतंत्र और संविधान का ही प्रभाव है कि हम भारत के लोग अब बहुमत की तानाशाही की धमकियों का जवाब शांति और अहिंसा से दे रहे हैं। इसलिए जागते रहो और सच को सच कहते रहो।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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