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ओपिनियन

कर्नाटक में फिर राजनैतिक अस्थिरता का दौर

Monday, November 18, 2019 12:10 PM
बीएस येद्दियुरप्पा (फाइल फोटो)

कर्नाटक में दल-दल बदलुओं के समर्थन से बनी येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली चार महीने पुरानी बीजेपी सरकार के वर्चस्व के लिए आगामी 5 दिसम्बर को होने वाले विधानसभा के उप चुनाव एक चुनौती हैं। अगर बीजेपी इनमें से आधी सीटें भी जीत गई तो वह सत्ता में बने रहने में सफल होगी नहीं तो राज्य में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता का दौर आरंभ हो जाएगा। इन 15 सीटों पर उप चुनाव पिछले महीने 21 तारीख के होने थे लेकिन कांग्रेस और जनता दल के 17 विधानसभा सदस्यों, जिन्हें दल बदल के आरोप में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने न केवल सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषिक कर दिया था बल्कि विधानसभा की बाकी बची अवधि तक उप चुनाव लड़ने पर पाबन्दी लगाई थी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के कहने पर चुनाव आयोग ने ये उप चुनाव 5 दिसम्बर तक के लिए टाल दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बुधवार इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इन सदस्यों को दल बदल कानून के अंतर्गत  सदस्यता से अयोग्य घोषित करने के अधिकार था लेकिन वे उन पर वर्तमान विधानसभा की पूरी अवधि, जो मई 2023 को पूरी होती है, तक उप चुनाव लड़ने की पाबंदी लगाने का कोई अधिकार नहीं था। जब या फैसला आया तो इन चुनावों के लिए नामांकन का काम शुरू हो चुका था। इसलिए सभी दलों ने जल्दी जल्दी अपने उम्मीदवार तय करने शुरू कर दिए। दल बदल करने वाले विधायकों में से 16 को अगले दिन ही बीजेपी में शामिल कर लिया गया और उनमें से 14 को पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया। नामांकन दाखिले करने की आखिरी तारीख 18 नवम्बर है इसलिए अभी देखना है कि बीजेपी इन सभी को उम्मीदवार बनाए रखती है या नहीं। इसका कारण यह है कि मई 2018 के विधानसभा चुनावों में यहां से हारे बीजेपी के उम्मीदवार  बगावत करने को तैयार बैठे है। अगर उन्हें पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाया गया या तो वे कांग्रेस अथवा जनता दल स में चले जाएंगे क्योंकि दोनों पार्टियां उन्हें लेने को तैयार है या फिर वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरेंगे। क्योंकि कांग्रेस और जनता दल-स के विधायकों की सदस्यता इसलिए गई क्योंकि उहोंने अपने दल छोड़कर बीजेपी का साथ दिया। इसलिए पार्टी केंद्रीय और राज्य नेताओं का कहना है कि उन्होंने उम्मीदवार बनाया जाना पार्टी की नैतिक जिम्मेदारी है।

पिछले विधानसभा अध्यक्ष दल बदल कानून के अंतर्गत दोनों दलों के कुल 17 विधायकों को अयोग्य घोषित किया था। इनमें से दो ने इसे कर्नाटक उच्च न्यायलय में चुनौती दी थी और उनकी याचिकाओं पर अभी फैसला सुनवाया जाना बाकि है। इसलिए केंद्रीय चुनाव आयोग ने केवल 15 सीटों पर चुनाव करवाए जाने की घोषणा की थी। अध्यक्ष सहित विधानसभा के सस्दयता संख्या 226 और 17 सदस्यों को अयोग्य घोषित कर दिए जाने के बाद अब इसकी प्रभावी संख्या 209 रह गई है। बीजेपी के पास इस समय कुल 106 सीटें और बहुमत में है। इन 15 सीटों में बीजेपी अगर 8 सीटें नहीं जीत पाई तो वह अल्पमत में आ जाएगी और सरकार का बचना मुश्किल होगा। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद   सबसे बड़े दल के रूप में सरकार तो बीजेपी की बनी लेकिन वह अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाई। इसके बाद कांग्रेस और जनता दल- सेक्यूलर की मिलीजुली सरकार बनी। कांग्रेस के पास 78 सीटें थी और जेडीएस के पास 37। लेकिन तभी लग रहा था कि आपसी झगड़ों के चलते सरकार अधिक दिन नहीं चल पाएंगी।

उधर येद्दियुरप्पा ने एक से अधिक बार इस सरकार को गिराने के प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हुए। लेकिन जब लोकसभा चुनावों में बीजेपी कुल 26 सीटों में से 25 सीटें जीतने में सफल रही तो तभी लगाने लगा था के राज्य में कांग्रेस द्वारा जेडीएस की सरकार अधिक दिन नहीं चल पाएगी। बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोडना शुरु कर दिया। लगभग डेढ़ दर्जन विधायकों, जिनमें अधिकतर कांग्रेस के थे, बीजेपी से हाथ मिलाने की घोषणा कर दी। बीजेपी ने उनकी बाड़ेबंदी करके कई हफ्ते मुम्बई रखा। इन सभी ने अपने त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को भेज दिए। उधर दोनों दलों के नेताओं ने अध्यक्ष को सूचित किया कि इन सदस्यों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है। इसलिए इनकी सदस्यता रद्द की जाए। बीजेपी ने इस बात को पुख्ता किया कि ये सभी बागी विधायक विधानसभा के बजट स्तर में शामिल नहीं हों। बीजेपी जब सरकार के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताब लाएगी तो इन सदस्यों की अनुपस्थिति के चलते कांग्रेस और जेडीएस के पास बहुमत नहीं होगा और सरकार गिर जाएगी। और ठीक वैसा ही हुआ। सरकार गिरी और बीजेपी फिर सत्ता में आई। येद्दियुरप्पा का चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा हो गया।

जब इन बागी विधायकों ने बीजेपी का साथ देने का निर्णय किया तो उनको साफ तौर पर वायदा किया था कि अगर उनके त्याग पत्र स्वीकार हो गए या उनकी सदस्यता रद्द हो गई, तो पार्टी उप चुनावों में उन्हें अपना उम्मीदवार बना कर फिर विधानसभा में लाकर मंत्री बना देगी या उन्हें किसी निगम आदि का अध्यक्ष बना दिया जाएगा। ऐसी उम्मीद की जा रही थे कांग्रेस और जेडीएस मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दोनों ने अपने-अपने प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे हैं। इसका कुछ लाभ बीजेपी को जरूर मिलेगा। लेकिन बीजेपी पर अपने बागी उम्मीदवारों का खतरा मंडरा रहा है। अगर बीजेपी इन उप चुनावों में 8 का आंकड़ा पार गई तो पार्टी की सरकार बनी रहेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस और जेडीएस मिलकर फिर सरकार बनाने का प्रयास करेंगे। लेकिन इसके अधिक देर चलने में संदेह है। इस प्रकार कुल मिलाकर राज्य की राजनीति एक बार फिर अस्थिरता के दौर में आ जाएगी।
लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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