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ओपिनियन

भागो मत अपने को बदलो

Thursday, January 23, 2020 10:15 AM
फाइल फोटो

बदलती दुनिया की इस महाभारत में सभी देश सामाजिक, आर्थिक युद्ध में उलझे हैं तथा जहां भी लोकतंत्र है। वहां सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए विकल्पहीन होकर आम नागरिक को धर्म, जाति की राजनीति सिखा रही है। वहां सुरक्षा के लिए राष्ट्रवाद का झण्डा पकड़ा रही है। राष्ट्रवाद के इस झण्डे में धर्म, जाति, नस्ल के कई रंग हैं। देश में इस समय परिवर्तन और सुधार के नाम पर समस्याओं का बवंडर मचा हुआ है। इस आंधी की शुरूआत 2014 के जनादेश में निहित है। भारी बहुमत का ये जनादेश कोई 30 साल पहले इंदिरा गांधी को भी मिला था और जब भी भारत की राजनीति में कई तूफान आए थे। नरेन्द्र मोदी और इंदिरा गांधी को मिले जनादेश से इस देश में लोकतंत्र और संविधान की अवधारणाओं को लेकर बहस का एक नया स्वरूप बन गया है, क्योंकि इन दोनों ही जनादेशों ने शासन और प्रशासन की अधिनायकवादी मानसिकता को उजागर किया है। वहां हिन्दू, मुसलमान- सिक्ख, ईसाई के बीच भय और अविश्वास को भी बढ़ाया है, लेकिन 1990 के बाद निजीकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की खुले बाजार की अर्थव्यवस्था ने भारत के लोकतंत्र में गैर बराबरी का जीवन जीने वाले समाज के दबे-कुचले और धर्म जाति के चक्रव्यूह में फंसे गरीब समाज के संघर्ष को जहां तेज किया है और वहां संविधान में स्थापित समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता की चुनौतियां भी बढ़ाई है। इस विश्व बाजार की अर्थव्यवस्था का ही परिणाम है कि महात्मा गांधी, नेहरू और अम्बेडकर के सपनों का सामाजिक, आर्थिक स्वरूप ही धराशाही हो गया है।

इसके साथ फिर भूमण्डलीकरण दौर में दुनिया के सभी छोटे-बड़े देशों में टैक्नोलॉजी का प्रयोग लोगों के जीवन में आमूल-चूल बदलाव ला रहा है और बंद समाज की सभी खिड़कियों को खोल रहा है और परम्परा तथा आधुनिकता की मुठभेड़ें बढ़ रही हैं। इसीलिए 21वीं शताब्दी में जहां आधी आबादी भूखी-तंगी और बेरोजगार है। वहां आधी आबादी टैक्नोलॉजी और विकास के नए सपनों में उड़ रही है, तो वहां आधी आबादी धर्म-जाति के चौरासी लाख नर्क को भोग रही है। समझने की बात अब ये है कि जहां कभी हम कहते थे कि भागो मत दुनिया को बदलो, तो वहां हम ये कह रहे हैं कि भागो मत खुद को बदलो। ये एक सच है कि 1947 में गुलामी से आजाद हुआ भारत में चन्द्रयान और मंगलयान पर सवार है और डिजिटल इण्डिया बन गया है। भारत जैसा सामाजिक, आर्थिक संकट आज दुनिया के सभी 192 देशों में भूकंप के तीखे झटके दे रहा है क्योंकि दुनिया आज शीत युद्ध से निकलकर व्यापार और बाजार के युद्ध में फंस गई है, तो खेती-बाड़ी के बाद औद्योगिकीकरण के दौर में खड़ी है तथा तेजी से विकास और परिवर्तन के दौर में तीसरे विश्व युद्ध जैसा आज वातावरण है। बदलती दुनिया की इस महाभारत में आज सभी देश सामाजिक, आर्थिक युद्ध में उलझे हैं तथा जहां-जहां भी लोकतंत्र है। वहां सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए विकल्पहीन होकर आम नागरिक को धर्म, जाति की राजनीति सिखा रही है। वहां सुरक्षा के लिए राष्ट्रवाद का झण्डा पकड़ा रही है। राष्ट्रवाद के इस झण्डे में धर्म, जाति, नस्ल के कई रंग हैं, जो कभी अधिनायकवादी, तो कभी एकाधिकारवादी, तो कभी व्यक्तिवादी, तो कभी प्रचार पाखण्डवादी बन जाते हैं और जितनी तेजी से उदय होते हैं उतनी तेजी से अस्त भी हो जाते हैं।

आने और जाने की इस जल्दबाजी में सरकार गिरगिट सम्राट की तरह बिना सोचे-समझे आधी रात के ऐसे फैसले करती है कि लोकतंत्र और संविधान की जान पर बन आती है और बड़े-बड़े महापुरुष और राष्ट्र निर्माताओं को कालपात्र में गाड़ दिया जाता है। ऐसे में लोक कल्याण का विकल्प सरकार के पास केवल मंदिर निर्माण, नागरिकता कानून, धारा 370 का सफाया, संवैधानिक संस्थानों की स्वायत्ता समाप्ति और धर्म, जाति के झण्डे लहराना ही रह जाता है। सरकार आम नागरिक को भूलकर बाजार और अमीरों की शरण में चली जाती है तो असहमति को दबाने के चक्कर में असहिष्णु होकर- भारत माता की जय और वन्दे मातरम् के नारे लगाते हुए राष्ट्रवाद और समाज का धर्म के नाम पर सैन्यीकरण करने लग जाती है। अब आप समझ लीजिए कि भारत में भी आगे क्या होने वाला है और हम भारत के लोगों को भेड़ों की तरह कोई गडरिया आज बहुमत के बल पर क्यों हांक रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और अपराध की जगह हम आज इसीलिए हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई बनाए जा रहे हैं, क्योंकि ज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान की आंधी ने युवा, महिलाएं और शोषित समाज को लामबंद कर दिया है। परिवर्तन ये हुआ है कि भारत के लोग लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए सड़क पर आ गए हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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