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ओपिनियन

इतने राम कहां से लाऊं?

Thursday, October 10, 2019 10:55 AM
कॉन्सेप्ट फोटो।

भारत वर्ष हजारों साल से गांव और गरीबी प्रधान देश है। हमें वैदिक काल से ही एक प्रजा के रूप में देवी-देवताओं और राजा की विजय के दिवस मनाने की आदत है। हमारा इतिहास, संस्कृति और परम्परा में हर दिन शक्ति और भक्ति का उत्सव मनाता है। दुनिया में सत्य, शिव और सुंदर की महाखोज करते रहना भी हमारी इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य की जीवनधारा को सुख-दु:ख का संगीत मानकर ही चलते रहना चाहिए। क्योंकि शायद भय, भाग्य और भगवान ही इस लोक और परलोक की नियति तय करते हैं। फसलों की कटाई और ऋतुओं की परछाई भी इस देश में प्रकृति को ही सबसे बड़ा निर्माता मानती है और कहती है कि तुम यदि मनुष्य हो तो पृथ्वी की पूजा करते रहो और चन्द्रमा हो तो पृथ्वी की परिक्रमा करते रहना ही तुम्हारा धर्म है। क्योंकि हम सूर्य नहीं है, इसलिए हमारा जीवन एक प्रार्थना है अर्चना है और आराधना है। इसीलिए कहा गया है कि सूरज नहीं चला करता, ये दुनिया घूम रही हैं। लोक रंग की धाराओं पर, रचना झूम रही है।

हजारों साल के इस अध्याय में, मनुष्य और प्रकृति का अनहदनाद ही भारत को पराजय में भी विजय का पर्व मनाने की, निराशा में आशा की, अंधेरे में उजाले की और अशुभ में शुभ की मनोकामना करने की दैविक प्रेरणा देता है। लेकिन भारत की ये वंदना, बीते हुए समय से आने वाले कल तक, वर्तमान समय में इतनी जटिल और विडम्बनापूर्ण बन गई है कि अब हमारा भविष्य भी पराजय की कुंठाओं से प्रतिशोध का नया इतिहास लिख रही है। अब हम ठहरे हुए पानी की तरह नहीं है और बहते हुए पानी की तरह अपने-अपने मन की बात कहकर रामायण से महाभारत में बदल गए हैं। यही कारण है कि आज हम संस्कृति और इतिहास की पराजय के सपनों को विजय की परम्परा में देख रहे हैं और कह रहे हैं कि हम नहीं हारे, मगर इतिहास हारा है। आज अपना हो न हो, पर कल हमारा है।

इन दिनों जब गली-मोहल्ले की राजनीति से लेकर संसद तक चुनाव जीतने का उत्सव चल रहा हो तब हमारी जीवन यात्रा में सांस्कृतिक अनुष्ठानों की विजय का अब क्या अर्थ है, इसे हमें समझना होगा। क्योंकि नया भारत (2019) अपनी प्राचीन संस्कृति का जुलूस निकालते और झांकियां सजाते हुए एक बाजार और कारोबार में फैल गया है। सोचिए कि किसान, जब आत्म हत्याएं कर रहा है और कर्ज में डूबकर खेतीपात छोड़ रहा है तो फिर हमारे 6 लाख गांव किसकी विजय का पर्व मना रहे हैं? जब मजदूर अपनी मेहनत की मजदूरी से विस्थापित है और कारखाने कंपनी का मालिक अपने मुनाफे से स्थापित है तो फिर ऐसे में विजय की रामलीला यहां कौन करवा रहा है?

हम अक्सर सोच ये नहीं पाते कि जब भारत की संस्कृति ही महिला प्रधान है तो फिर हमारे भारत में महिला उत्पीड़न सबसे अधिक क्यों हैं? हमारे व्रत त्योहार, उपवास, साधना, नदियां, जब सभी गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, कावेरी और नर्मदा के दैवीय नामों से बहती है तब मातृ प्रधान संस्कृति पर पुरुष प्रधान शक्ति की पूजा कौन कर रहा है? विजय की नवमी कौन मना रहा है? संस्कृति की इस उल्टी गंगा में अब कौन नारी को उसके अधिकार और सम्मान देने पर व्याकुल है? इसलिए हमारी मानसिकता आज भी शक्ति की भक्ति में मगन है क्योंकि मनुष्य की पराजय की इन्द्र सभा में सीता और द्रोपदी ही सबसे अधिक संस्कृति की गुलामी का बोझ ढो रही है और विजय का हर त्योहार कोई राम और कृष्ण की लीलाएं ही बना हुआ है। हमें विजय पर्व और विजय दशमी जैसे उत्सवों में उन सबको कभी नहीं भूलना चाहिए जो खुशियों के नक्कारखाने में किसी पीड़ित, वंचित और शोषितों की तूती की सदियों पुरानी आरती को नहीं सुन रहा है।

आप देखें तो सही! यहां कोई शस्त्रों की पूजा कर रहा है तो कोई मंदिरों में विजय शंख बजा रहा है तो कोई धर्म और जाति की विजय यात्रा निकाल रहा है तो कोई सरकार और प्रशासन की विजय का गुणगान कर रहा है तो कोई लक्ष्मी पूजा का दरबार सजा रहा है। लेकिन कोई बताए तो सही कि भारत में आज कौन है जो वैष्णव जन बनकर दूसरों की पीड़ा को समझ रहा है? ऐसे में ज्ञान और विज्ञान के प्रकाश में चलते हुए अपनी-अपनी विजय यात्रा का ढोल बजाते हुए अपने इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की पराजय यात्राओं को भी फिर से याद करना चाहिए। क्योंकि सत्य, शिव और सौन्दर्य की विजय का जन्म एक पराजित सत्य से ही होता है।

अत: हमें अपनी तीन हजार साल पुरानी, विकास और परिवर्तन की लोकयात्रा में आज के इन सवालों का उत्तर ढूंढ़ना ही होगा कि आज हमारा समाज इतना असहिष्णु, हिंसक, गैर बराबरी, काम, क्रोध, मद, लोभ और मोहमाया से अभिशापित और कलंकित क्यों है। क्योंकि जब घर-घर में रावण हो और घर-घर में लंका हो, तो फिर हम इतने राम, कहां से लाएं? जो भारत के 134 करोड़ देवी-देवताओं को उनके पापों से मुक्त कर दे और गांव तथा गरीब को न्याय, शांति और सद्भावपूर्ण विकास का विजय मंत्र सुना दे? ऐसे में प्रजा की दुर्दशा में एक राजा को अपनी क्षण भंगुर विजय पर गर्व नहीं करना चाहिए।
वेदव्यास (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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