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ओपिनियन

हैदराबाद का निर्भया कांड

Monday, December 09, 2019 14:25 PM
फाइल फोटो।

लगभग सात साल पहले दिल्ली में निर्भया के साथ जघन्य तरीके से गैंगरेप हुआ था जिसके चलते बाद में उसकी अस्पताल में मृत्यु हो गई थी। इस घटना से सारा देश विशेषकर महिला वर्ग उद्वेलित हो गया था। इसके चलते सभी 6 आरोपी जल्दी पकड़े गए। फास्ट ट्रैक में उन्हें सजा भी सुना दी गई। जिसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट तथा बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखा। 6 में से एक नाबालिग था जो कानून के अंतर्गत सजा पूरी कर रिहा हो चुका है। शेष पांच जिन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, में से एक ने जेल में आत्महत्या कर ली। जबकि अन्य चार को सजा सुनाए जाने के चार साल बाद भी अभी फांसी नहीं दी गई है।

हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि मुदकमे लम्बे चलते है। निचली अदालतों के फैसलों को हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के प्रावधान के चलते मामले लटके रह जाते है। इसलिए जब गत 25 नवम्बर को हैदराबाद की एक युवा महिला पशु चिकिस्तक के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या कर उसके शव को जला देने की घटना में लिप्त जब चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, तो लोगों का गुस्सा इतना फूटा की उन्होंने उस थाने का लम्बे समय तक घेराव किए रखा, जहां आरोपियों को रखा गया था। आक्रोशित आन्दोलनकारी कह रहे थे कि उन्हें पुलिस प्रशासन और न्यायपलिका पर विश्वास नहीं है। इसलिए अपराधियों को उनके हवाले कर दिया जाए ताकि वे उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया जा सके।

घटना के लगभग दो सप्ताह बाद एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में चारों आरोपियों के एक पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद आम आदमी के पुलिस और प्रशासन पर गुस्सा हर्सौल्लास में बदल गया। लोगों ने मिठाइयां बंटी। मृतिका के परिवार वालों ने कहा उन्हें ख़ुशी है कि उन्हें न्याय मिल गया। यहां तक कि आरोपियों के परिवारजनों को भी उनके मरे जाने पर कोई गम नहीं हुआ। हालांकि कुछ खुसुर पुसर भी हो रही है कि यह एक फर्जी मुठभेड़ थी लेकिन फिलहाल लोग पुलिस के कदम की प्रशंसा कर रहे है। पुलिस के अनुसार आरोपियों को जब घटनास्थल की निशानदेही के लिए उस स्थान पर ले जाया गया, जहां उन्होंने युवती के शव को जलाया गया था। आरोपियों ने जब पोलकी हिरासर से भागने का प्रयास किया तो पुलिस ने उन पर गोली चलाई जिसमें चारों के चारों वहीं मरे गए।

जब-जब ऐसी घिनौनी घटनाएं होती है तब-तब जोर से मांग की जाती है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए संबंधित कानून में संशोधन कर उसके प्रावधानों और कड़ा किया जाए। ऐसे कानूनों को समय-समय पर सख्त भी किया गया। लेकिन इसके वावजूद इस तरह की घटनाओं में कमी नहीं हुई बल्कि कुछ बढ़ोतरी ही हुई है। अगर ठीक से देखा और समझा जाए तो यह बात सामने आती है कि इन घटनाओं को रोकने के लिए बनाए गए कानूनों की कमी  नहीं लेकिन इन कानूनों का कार्यन्वन जितनी सख्ती से होना चाहिए उतना नहीं होता। कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि अगर पहले से बने हुए कानूनों को ठीक से और सख्ती से लागू करने को पुख्ता कर दिया जाए तो सजा के भय के चलते इस प्रकार की घटनाओं पर अंकुश लगेगा। सच्चाई तो यह है कि पुलिस और प्रशासन अपना ‘इकबाल’ खो चुका है जिसके चलते अपराधी डरते नहीं। हां ऐसी घटना के बाद सबसे पहले यह बात सामने आती है कि पुलिस और प्रशासन एकदम संवेदनहीन हो गया है। ऐसी घोर आपराधिक घटनाओं के बाद जब आमजन का क्रोध फूटता है तो पुलिस और प्रसाशन कुछ चेतता है। आम जन का गुस्सा ठंडा करने के लिए कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है। गुस्सा ठंडा होते ही उनका निलंबन खत्म हो जाता है।
हैदराबाद की युवा महिला पशु चिकिस्तक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

घटनाक्रम के अनुसार युवती ने अपनी स्कूटी को शहर निकट एक टोल प्लाजा पर रोका था। रात का समय था, वहीं एक ट्रक ड्राईवर और उसके साथी अपना ट्रक रोक कर अंधेरे में शराब पी रहे थे। उनकी नजर उस महिला पर पड़ी और उन्होंने उसके साथ दुष्कर्म करने की योजना बना ली। एक ने चुपचाप जाकर उसकी स्कूटी के एक टायर को पंचर कर दिया। वापस लौटने पर जब उसने पंचर को देखा तो अपनी बहन को फोन किया। बहन ने कहा कि वे जल्दी ही उसे वहां से लेने का इंतजाम करते हैं। इसी बीच ड्राईवर के एक साथी ने पंचर ठीक करने में सहायता के नाम पर स्कूटी को ले गया। अंधेरे का लाभ उठा बाकी तीनों महिला को घसीट कर पास एक सुनसान स्थान पर ले गए और बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया। बाद में गला घोटकर उसकी हत्या कर दी तथा कुछ दूर जाकर उसके शव को पेट्रोल से जला दिया। जब युवती के बहन को उसका मोबाइल लगातार स्विच ऑफ मिला तो परिवार ने पास के थाने पर जाकर रिपोर्ट लिखवाने के लिए गए। जैसा की आमतौर पुलिस का रुख होता है थाने के अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करने के बजाए अपने तरीके से पूछताछ शुरू कर दी। पूछा गया कि उसका कोई पुरुष मित्र तो नहीं। एक घंटे तक इस तरह के सवाल करने के बाद भी रिपोर्ट लिखने से इंकार कर दिया।
लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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