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Friday 17th of September 2021
 
ओपिनियन

भारत में लघु पत्रिकाएं: चुनौतियों का समय

Thursday, September 09, 2021 14:20 PM
कॉंसेप्ट फोटो।

भारतीय पाठक सर्वे 2019 के अनुसार इंटरनेट की वजह से मुद्रित समाचार पत्रों के पाठक कम होने का भ्रम टूटता है अर्थात हमारे देश में मुद्रित माध्यमों पर भरोसा रखने वाले पाठक बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ  कोरोना से अनेक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद अथवा स्थगित हुआ है। ऐसे में लघु पत्रिकाओं को देखना और भी कठिन है, क्योंकि समाचार पत्रों के सभी पाठक साहित्य के पाठक नहीं होते। क्या फिर भी साहित्य बचाया जाना आवश्यक है? इसका उत्तर है हाँ, क्योंकि साहित्य पाठकों को संस्कारित करता है। संवेदनशील बनाता है और उन्हें सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता है। हिंदी में लघु पत्रिकाओं से साहित्य की पत्रिकाओं का आशय लिया जाता है जो मोटे अर्थों में ठीक ही है तथापि ये साहित्य के साथ संस्कृति की पत्रिकाएं भी हैं। वस्तुत: सातवें दशक में मीडिया घरानों और बड़े संस्थाओं द्वारा निकाली जाने वाली साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिकाओं के सामानांतर लघु पत्रिकाओं की शुरुआत हुई, जो अपने सीमित दायरों के बावजूद एक आंदोलन में बदल गई। इन लघु पत्रिकाओं की प्रसार संख्या भले कम थी, किन्तु इनका प्रभाव गहरा और स्थाई था। इनमें पहल, वसुधा, कथा, लहर, क्यों, बिंदु, उत्तरार्ध, ओर अणिमाए संबोधन, कारखाना, दस्तावेज, अब, विकल्प जैसी अनेक पत्रिकाएं थीं जिनके अवदान को बार-बार याद किया जाता है। लघु पत्रिका आंदोलन से प्रभावित और उसे आवश्यक मानने वाले लोगों में अनेक महत्वपूर्ण कवि- कथाकार भी थे। जिन्होंने अपने प्रयासों से सम्पादन-प्रकाशन किया। अमरकांत, मार्कण्डेय, हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, नन्द चतुर्वेदी, रवींद्र कालिया, ज्ञानरंजन, कमला प्रसाद, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, विजयकांत जैसे अनेक महत्वपूर्ण लेखक इस आंदोलन के साथ जुड़े और अपनी पत्रिकाओं का प्रकाशन किया।
2001 में जयपुर में आयोजित लघु पत्रिकाओं के चौथे राष्टÑीय सम्मलेन में सर्वसम्मति से तय हुआ था कि हर साल 9 सितम्बर को लघु पत्रिका दिवस मनाया जाएगा। असल में इन दो दशकों में साहित्य और संस्कृति के समक्ष चुनौतियां बढ़ी ही हैं जब वैश्वीकरण के व्यापक प्रभाव भारतीय जन जीवन पर देखे जा रहे हैं। ऐसे समय में इन लघु पत्रिकाओं के महत्व और जरूरत पर बात करना प्रासंगिक हो जाता है। इन दिनों हिन्दी में लगभग तीन-चार सौ लघु पत्रिकाएं नियमित-अनियमित रूप से निकल रही हैं। अगर इन पत्रिकाओं को आवृत्ति के अनुसार विभाजित किया जाए तो अधिकांश त्रैमासिक, चातुर्मासिक या अनियतकालीन हैं। मासिक और द्वैमासिक पत्रिकाएं भी हैं, लेकिन बहुत कम और इसके कारण स्पष्ट हैं। अच्छी रचना सामग्री और मुद्रण-वितरण के लिए धनराशि एक साथ जुटाना ऐसी पत्रिकाओं के लिए मुश्किल है।  
इन पत्रिकाओं की पाठक संख्या यद्यपि अधिक नहीं है, लेकिन ये बड़े पाठक समुदाय तक पहुंचती हैं। यह विरोधाभास इसलिए कि जहां एक लघु पत्रिका एक-डेढ़ हजार की संख्या में अपने क्षेत्र में साहित्य- संस्कृति के सवालों के साथ पहुंच रही है तो दूसरी ढाई-तीन हजार की प्रसार संख्या के साथ अपने क्षेत्र में। बड़ी पूंजी के दबाव से मुक्त होने के कारण लघु पत्रिकाओं के लिए वैचारिक स्वाधीनता का आकाश खुला होता है और वे निर्भीकता से चयन-सम्पादन कर पाती हैं। इस स्वतंत्र चेतना के बिना साहित्य का विकास सम्भव नहीं है। आकस्मिक नहीं कि पिछले तीन चार दशकों की श्रेष्ठ रचनाओं का प्रथम प्रकाशन ऐसी पत्रिकाओं में ही हुआ है। तद्भव, अकार, पक्षधर, कथा, दस्तावेज, परिकथा,संवेद, अक्सर, सापेक्ष, उद्भावना एक और अंतरीप, अभिव्यक्ति, मड़ई, समयांतर, चौपाल, लमही, कथाक्रम,अलाव, अभिनव कदम, समकालीन सरोकार, अनहद, साखी, पाठ, कविता बिहान, शीतल वाणी, सबद निरंतर, सृजन सरोकार, जनपथ, नया प्रतिमान, प्रयाग पथ, देस हरियाणा, किरण वार्ता, लोक चेतना वार्ता, समकालीन चुनौती, चिंतन दिशा, दोआबा, रोशनाई जैसी लघु पत्रिकाएं अपने सीमित संसाधनों के बावजूद हिंदी भाषी समाज को साहित्य और संस्कृति की श्रेष्ठ सामग्री दे रही है तो इसका श्रेय लघु पत्रिका आंदोलन को जाता है। लघु पत्रिकाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती पाठकों का सांस्कृतिक विकास है, जिसके बिना नागरिक बोध,लोकतंत्र और संवेदनशीलता का होना कठिन है। जिस बाजारीकरण और वैश्वीकरण के कारण जन रुचियां लगातार विकृत हो रही हैं और मुख्यधारा का मीडिया बाजार की शक्तियों के आगे निरुपाय है वहां छोटे साधनों वाली ये पत्रिकाएं ही हैं जो दृढ़ता से पाठकों के सांस्कृतिक बोध को उन्नत कर सकती हैं। ऐसी पत्रिकाओं के महत्व और जरूरत को इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि हमारी भाषा के महान लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की जन्म शताब्दी पर सरकारी उदासीनता के बावजूद यदि उत्साहपूर्ण माहौल बन सका, तो इसका कारण बड़ी संख्या में लघु पत्रिकाओं द्वारा रेणु पर विशेषांकों का प्रकाशन करना ही था। 

    



लघु पत्रिकाओं के सामने दूसरी चुनौती यह है कि वे विपरीत परिस्थितियों में नियमित प्रकाशन के साथ बड़ी संख्या में पाठकों तक कैसे पहुंचे? दिल्ली सरकार और भारत सरकार के कुछ बड़े उपक्रम एक दशक पहले तक विज्ञापनों द्वारा ऐसी पत्रिकाओं को सहयोग देते थे जो अब लगभग पूरी तरह से समाप्त है। लघु पत्रिका दिवस मनाने का सही आशय यही हो सकता है कि हमारी नई पीढ़ी साहित्य संस्कृति के गहरे आशयों को ग्रहण करने में समर्थ हो और इसके लिए ये पत्रिकाएं अपनी सही भूमिकाओं का निर्वाह कर सकें।

2001 में जयपुर में आयोजित लघु पत्रिकाओं के चौथे राष्टÑीय सम्मलेन में सर्वसम्मति से तय हुआ था कि हर साल 9 सितम्बर को लघु पत्रिका दिवस मनाया जाएगा। असल में इन दो दशकों में साहित्य और संस्कृति के समक्ष चुनौतियां बढ़ी ही हैं जब वैश्वीकरण के व्यापक प्रभाव भारतीय जन जीवन पर देखे जा रहे हैं।


              पल्लव

  (ये लेखक के अपने विचार हैं)



ऐसे समय में इन लघु पत्रिकाओं के महत्व और जरूरत पर बात करना प्रासंगिक हो जाता है। इन दिनों हिन्दी में लगभग तीन-चार सौ लघु पत्रिकाएं नियमित-अनियमित रूप से निकल रही हैं। अगर इन पत्रिकाओं को आवृत्ति के अनुसार विभाजित किया जाए तो अधिकांश त्रैमासिक, चातुर्मासिक या अनियतकालीन हैं। मासिक और द्वैमासिक पत्रिकाएं भी हैं, लेकिन बहुत कम और इसके कारण स्पष्ट हैं। अच्छी रचना सामग्री और मुद्रण-वितरण के लिए धनराशि एक साथ जुटाना ऐसी पत्रिकाओं के लिए मुश्किल है। 

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