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ओपिनियन

वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के उपाय

Tuesday, March 03, 2020 12:55 PM
फाइल फोटो

सरकार का कहना है कि थर्मल के स्थान पर बिजली के दूसरे स्रोतों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जैसे जल विद्युत को। कोयले को जलाने से वायु प्रदूषित होती है, यह तो सर्वविदित है और इसके विकल्प हमें खोजने ही चाहिए, लेकिन जल विद्युत के सम्बन्ध में भ्रम व्याप्त हैं। मूल रूप से जल विद्युत साफ नहीं होती है। जल विद्युत परियोजनाओं के पीछे बड़ा तालाब बनता है जिसके अन्दर मरे हुए पशु और पेड़ पत्तियां नीचे बैठकर सड़ते हैं। इनके सड़ने से मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है जो कि कार्बन डाई आॅक्साइड की तुलना में वायु को 20 गुणा ज्यादा प्रदूषित करती है, लेकिन इस प्रदूषण का संज्ञान हमारी सरकार, विशेषत: पर्यावरण मंत्रालय लेता ही नहीं है। हमें कोयले और जल विद्युत को छोड़कर परमाणु और सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन की तरफ  बढ़ना चाहिए।

विश्व के बीस अधिकतम वायु प्रदूषित शहरों में से चौदह भारत में हैं। यह हमारे लिए शर्मनाक ही नहीं अपितु हमारे आर्थिक विकास के लिए अत्यधिक हानिप्रद है, क्योंकि इस प्रदूषण से हमारे नागरिकों का स्वस्थ्य बिगड़ रहा है। उनकी आय नए माल के उत्पादन में निवेश करने के स्थान पर अस्पतालों में व्यय हो रही है। वायु प्रदूषण पर नियंत्रण न करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि उद्योगों पर प्रदूषण नियंत्रण का बोझ न पड़े, उनके माल के उत्पादन की लागत कम आए, देश का आर्थिक विकास हो जिससे कि जनता के जीवन स्तर में सुधार हो, लेकिन इस प्रक्रिया में बढ़े वायु प्रदूषण से जनता का स्वास्थ्य और जीवन स्तर गिर रहा है। अत: वायु प्रदूषण बढ़ाकर जनहित हासिल करने के स्थान पर हमें वायु प्रदूषण नियंत्रित करके जनता के जीवन स्तर में सुधार लाने के प्रयास करने होंगे। वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत उद्योग हैं जिसमें थर्मल बिजली प्लांट सम्मेलित है। थर्मल बिजली प्लांटों द्वारा भारी मात्रा में कार्बन, सल्फर और नाइट्रोजन का उत्सर्जन किया जाता है, जो कि वायु को प्रदूषित करते हैं। इस प्रदूषण को नियंत्रित करने का सीधा उपाय है कि उद्योगों द्वारा उत्सर्जित वायु के मानकों को कड़ा कर दिया जाए। जब इनके द्वारा साफ  वायु छोड़ी जाएगी तो प्रदूषण नहीं होगा, लेकिन सरकार नें हाल में इसके विपरीत कदम उठाए हैं। सरकार ने इनके मानकों को ढीला कर दिया है जिसके कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। इन मानकों को और कड़ा करके वायु प्रदूषण रोकना चाहिए और इनके अनुपालन से जो उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है उसे उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था को वहन करना चाहिए। जैसे आर्गेनिक फल सब्जी का उपभोक्ता पर आर्थिक भार पड़ता है लेकिन स्वस्थ्य सुधरता है और जीवन स्तर में सुधार होता है।

सरकार का कहना है कि थर्मल के स्थान पर बिजली के दूसरे स्रोतों को बढ़ावा दिया जा रहा है जैसे जल विद्युत को। कोयले को जलाने से वायु प्रदूषित होती है यह तो सर्वविदित है और इसके विकल्प हमें खोजने ही चाहिए। लेकिन जल विद्युत के सम्बन्ध में भ्रम व्याप्त हैं। मूल रूप से जल विद्युत साफ नहीं होती है। जल विद्युत परियोजनाओं के पीछे बड़ा तालाब बनता है जिसके अन्दर मरे हुए पशु और पेड़ पत्तियां नीचे बैठकर सड़ते हैं। इनके सड़ने से मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है जो कि कार्बन डाई आॅक्साइड की तुलना में वायु को 20 गुणा ज्यादा प्रदूषित करती है, लेकिन इस प्रदूषण का संज्ञान हमारी सरकार, विशेषत: पर्यावरण मंत्रालय लेता ही नहीं है। हमें कोयले और जल विद्युत को छोड़कर परमाणु और सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन की तरफ  बढ़ना चाहिए।

परमाणु ऊर्जा में समस्या रेडियोधर्मिता और पानी की खपत की हैं। यदि इन संयंत्रों को रिहाईशी इलाकों से दूर स्थापित किया जाए और इनमें पानी की खपत को कम किया जाए तो परमाणु ऊर्जा हमारे लिए उपयुक्त हो सकती है। इन संयंत्रों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए की वे गर्म पानी को नदी में न छोड़े बल्कि उसका तब तक उपयोग करते रहें जब तक वह समाप्त न हो जाए। ऐसा करने से इनकी पानी की खपत कम हो जाएगी। सौर ऊर्जा पर्यावरण के प्रति नरम है और इसके विस्तार के लिए हमारी सरकार प्रयास कर रही है जो कि सही दिशा में है और जिसके लिए सरकार को साधुवाद। अत: उद्योगों द्वारा वायु प्रदूषण रोकने के लिए दो कदम उठाने चाहिए। पहला यह कि उत्सर्जित वायु के मानकों को सख्त किया जाए और दूसरा कोयला और जल विद्युत का त्याग कर हम परमाणु और सौर ऊर्जा की तरफ  बढ़ें।

वायु प्रदूषण का दूसरा कारण यातायात है। अपने देश में निजी कारों का उपयोग भारी मात्रा में बढ़ रहा है। इस प्रदूषण को कम करने के लिए तीन कदम उठाए जा सकते हैं। पहला यह कि सार्वजनिक यातायात जैसे मेट्रो का विस्तार किया जाए। सरकार इस दिशा में कार्य कर रही है जो कि सही है। दूसरा यह कि निजी कारों का उपयोग करने के लिए हाइवे में सड़कों पर विशेष लेन बनाए जा सकते हैं जिनमें केवल उन निजी वाहनों को छूट हो जिनमें कम से कम तीन व्यक्तियों बैठे हों। अक्सर देखा जाता है कि एक गाड़ी में एक ही व्यक्ति यात्रा करता है जिसके कारण वायु प्रदूषण अधिक होता है। अमेरिका आदि देशों में सड़कों में विशेष लेन हैं जिनमें केवल अधिक बैठे यात्रियों की कारों को ही चलने की छूट होती है।

ऐसा करने से लोगों को प्रेरणा मिलेगी कि तीन या चार व्यक्ति साथ में चलें जिससे कि वे ट्रेफिक जाम से बच सकें और अपने गंतव्य स्थान पर शीघ्र पहुंच सकें। यातायात के सम्बन्ध में एक भ्रम यह है कि बिजली से चलने वाली कार के उपयोग से प्रदूषण कम होगा। इतना सही है कि बिजली से चलने वाली कार से स्थानीय प्रदूषण कम होता है, लेकिन बिजली के उत्पादन में उतना ही प्रदूषण अन्यत्र होता है। अत: यदि देश के वायु प्रदूषण को देखें तो बिजली की कार के उपयोग से सुधार नहीं होता है। केवल हम शहरी प्रदूषण को दूर क्षेत्रों में स्थानांतरित करते हैं जहां कि वह हमें दिखता नहीं है। यह गन्दगी पर पर्दा लगाने जैसा है। वायु प्रदूषण का तीसरा स्रोत निर्माण कार्य में धूल का पैदा होना है। यह विषय पूरी तरह से कार्यान्वयन का है। निर्माण कार्य के चारों तरफ परदे आदि लगाकर धूल को कम किया जा सकता है और इस कार्य के लिए सरकार को अलग पुलिस फोर्स बनानी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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