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ओपिनियन

न्याय में लगातार देरी का गणित

Friday, December 20, 2019 12:55 PM
सुप्रीम कोर्ट।

हाल ही में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने न्यायपालिका से कहा है कि उसे यह तय करना चाहिए कि न्याय में देरी नहीं हो। गुजरात के गांधीनगर जिले के कराई गांव में पुलिस अकादमी के एक कार्यक्रम में नायडू ने कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी तय है। तुरंत न्याय नहीं हो सकता है, लेकिन न्याय में लगातार देरी भी नहीं कर सकते हैं। वहीं बीते दिनों हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ के नए भवन के उद्घाटन अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी न्याय व्यवस्था में देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि राजाओं के समय कोई भी घंटी बजाकर न्याय की गुहार कर लेता था, लेकिन अब न्याय हासिल करना बहुत खर्चीला है। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट तक गरीबों का पहुंचना नामुमकिन हो गया है। ऐसे में फ्री कानूनी सहायता को बढ़ावा देने की जरूरत है। न्याय प्रणाली में आम भागीदारी बनाने के लिए स्थानीय भाषाओं में भी फैसले देने चाहिए।

गौरतलब है कि देशभर की अदालतों में करीब साढ़े तीन करोड़ केस लंबित हैं। इन मामलों को निपटाने के लिए 2,373 अतिरिक्त जजों की जरूरत है। यह बात संसद में पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में सामने आई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश सर्वेक्षण के मुताबिक, कुल मामलों में 87.5 प्रतिशत मामले जिला और निचली अदालतों में हैं। लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ के कारण हमारे देश की अदालतों से त्वरित न्याय मिल पाना दिनोंदिन दूभर होता जा रहा है। दरअसल, देश की अदालतें जादू-टोना घर बनी हुई हैं। भारत जैसे पूर्व गुलाम देशों की यही दुर्दशा है। अंग्रेजों की बनाई न्याय व्यवस्था अभी तक ज्यों की त्यों चल रही है। विख्यात अंग्रेज विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है कि देर से किया गया न्याय अन्याय ही है। ये भारतीय न्यायिक तंत्र की खामी ही है कि आमजन के जीवित रहते न्याय प्रदान करने में वह आज भी सक्षम नहीं है।

देश में लचर न्यायिक व्यवस्था के कारण एक ओर अपराधों का ग्राफ व मनोबल बढ़ता जा रहा है, तो वहीं दूसरी ओर न्याय के इंतजार में बैठे लोगों में असंतोष भी घर कर रहा है। समय पर न्याय नहीं मिलने के कारण निर्दोष व्यक्ति को अपराधी नहीं होने पर भी समाज में अपराधी होने का दंश झेलना पड़ रहा है। दरअसल, भारत में सुस्त व लेटलतीफ न्यायिक प्रणाली के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। जिसमें पहला तो यह है कि देश में आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त नहीं है। जहां अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 135 न्यायाधीश हैं, कनाडा में 75, ऑस्ट्रेलिया में 57 और ब्रिटेन में 50 न्यायाधीश हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या महज 13 है। इसके अलावा अदालतों में न्यायाधीशों के पद सालों साल खाली पड़े रहते हैं। आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट एवं अधीनस्थ कोर्ट में जजों के तकरीबन 4,655 पद खाली पड़े हैं। एक तरफ अदालतों में मुकदमों का अंबार लगता जा रहा है, तो दूसरी ओर अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति ही नहीं की जा रही हैं। ऐसी स्थिति में लंबित मुकदमों के निपटारे एवं त्वरित न्याय की कल्पना कैसे की जा सकती है? मुकदमों की बढ़ती संख्या के आधार पर अनुमान है कि आगामी 10 वर्षों में देश में 10 लाख जजों की जरूरत होगी।

आबादी के ताजा आंकड़ों के हिसाब से 135 करोड़ भारतीयों के लिए हमें देश में 65 हजार अधीनस्थ न्यायालयों की आवश्यकता हैं, लेकिन वर्तमान में 15 हजार न्यायालय भी नहीं हैं। यदि अमेरिका की बात करें तो वहां पर 10 लाख की आबादी पर 111 न्यायालय हैं और ब्रिटेन में 55 न्यायालय। यही नहीं, अदालतों के आधारभूत ढांचे की भी बात की जाए तो उसमें भी कई कमियां नजर आती हैं। कंप्यूटरीकरण एवं डिजिटलीकरण के आधुनिक युग में आज भी भारतीय न्यायालय बीते जमाने के ढर्रे पर चल रहे हैं। अदालतों के कंप्यूटरीकरण की रफ्तार बिल्कुल सुस्त पड़ी हुई है। नई अदालतें बनाने का काम भी बहुत धीमी रफ्तार से चल रहा है। न्याय में देरी के लिए सिर्फ यही कारक उत्तरदायी नहीं हैं। इसके अलावा भारत में अब न्यायिक लड़ाई लड़ना गरीबों के बस की बात रही ही नहीं है। इस बात को सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों ने स्वीकारा है। यदि भारत के न्यायिक क्षेत्र में सुधारवादी कदम उठाते हुए न्याय को आसान और सभी व्यक्तियों की पहुंच वाला बना दिया जाए तो भारत में बड़े स्तर पर अपराध में गिरावट देखने को मिल सकती है। वर्तमान में देशवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार और अपराध पर अंकुश लगाने की है, परंतु सरकार की सुस्त एवं उदासीन कार्य प्रणाली इस ओर कोई भी कार्य नहीं कर पा रही है।

सरकार को हर हाल में भारतीय न्यायिक व्यवस्था में सुधारवादी कदम उठाने होंगे, जिससे आम जनमानस में सुरक्षा और स्वाभिमान की भावना प्रबल हो सके। समझना होगा कि अंतराल के बाद मिले न्याय का कोई अधिक औचित्य भी नहीं रह जाता है। जज कम और केस ज्यादा आखिर गुत्थी सुलझी भी तो कैसे? इसके लिए प्राचीन वैदिक कालीन विधि व न्याय व्यवस्था को पुन: लागू किया जाना चाहिए, जिसे अंग्रेजों ने खत्म कर दिया था। दरअसल, ग्राम सभा स्तर पर ही यदि आपसी सुलह-समझौते के मामलों का निपटारा किया जाएं तो छोटे-मोटे विवादों के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्राय: यह देखा गया है कि ग्राम सभा स्तर पर मिले न्याय को दोनों पक्षों ने खुशी-खुशी स्वीकार किया है। वहीं कोर्ट के अलावा कोर्ट के बाहर न्यायिकेत्तर उपाय से प्रकरण सुलझाने की आवश्यकता है।
देवेन्द्रराज सुथार (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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