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हिन्दू संस्कृति में आदिदेव हैं गणेश

Monday, September 02, 2019 10:40 AM
भगवान गणेश।

विघ्नहर्ता, प्रथमपूज्य एकदन्त भगवान श्री गणेश को ऐसे कई नामों से जाना जाता है। किसी भी शुभ काम की शुरूआत करनी हो या फिर किसी विघ्न को दूर करने की प्रार्थना करनी हो, गजानन सबसे पहले याद आते हैं। कोई भी सिद्धि हो या साधना, विघ्नहर्ता गणेशजी के बिना सम्पूर्ण नहीं मानी जाती। भाद्रप्रद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेशजी का जन्मोत्सव गणेश चतुर्थी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश के रूप में विष्णु शिव-पावर्ती के पुत्र के रूप में जन्मे थे। उनके जन्म पर सभी देव उन्हें आशीर्वाद देने आए थे। विष्णु ने उन्हें ज्ञान का, ब्रह्मा ने यश और पूजन का, शिव ने उदारता, बुद्धि, शक्ति एवं आत्म संयम का आशीर्वाद दिया। लक्ष्मी ने कहा कि जहां गणेश रहेंगे, वहां मैं रहूंगी। सरस्वती ने वाणी, स्मृति एवं वक्तत्व शक्ति प्रदान की। सावित्री ने बुद्धि दी। त्रिदेवों ने गणेश को अग्रपूज्य, प्रथम देव एवं रिद्धि-सिद्धि प्रदाता का वर प्रदान किया। इसलिए वे सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक लोकप्रियता वाले देव हैं।

गणेशजी के जन्म की कहानी बहुत रोमांचक है। बहुत साल पहले जब पृथ्वी पर राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तब महादेव शिव देवों की सहायता करने शिवलोक से दूर गए हुए थे। माता पार्वती शिवलोक में अकेली थी। जब पार्वती जी को स्रान करने की ईच्छा हुई तो उन्हें शिवलोक के सुरक्षा की चिंता हुई। वैसे तो शिवलोक में शिवजी की आज्ञा के बिना कोई पंख भी नहीं मार सकता था, पर उन्हें डर था कि शिवजी की अनुपस्थिति में कोई अनाधृकित प्रवेश ना कर जाए। अत: उन्होंने सुरक्षा के तौर पर अपनी शक्ति से एक बालक का निर्माण किया और उनका नाम रखा गणेश। उन्होंने गणेशजी को प्रचंड शक्तियों से नियुक्त कर दिया और घर में किसी के भी प्रवेश करने से रोकने के कड़े निर्देश दिए। इधर राक्षसों पर देवों का पलड़ा भारी पड़ रहा था। शिवजी युद्ध में विजयी हुए और खुशी-खुशी शिवलोक की तरफ चल पड़े। शिवलोक पहुंचकर सर्वप्रथम उन्होंने पार्वती माता को अपने विजय का समाचार सुनाने की इच्छा की। परन्तु शिवजी के प्रभुत्व से अनजान गणेशजी ने उन्हें घर में प्रवेश करने से रोक दिया। अपने ही घर में प्रवेश करने के लिए रोके जाने पर शिवजी के क्रोध का ठिकाना ना रहा। उन्होंने गणेशजी का सर धड़ से अलग कर दिया और घर के अंदर प्रवेश कर गए। जब पार्वतीजी को यह कहानी सुनाई तो उन्हें गणेशजी के मृत होने का समाचार सुनकर बड़ा रोष आया। उन्होंने शिवजी को अपने ही पुत्र का वध करने का दोषी बताया और उनसे गणेशजी को तुरन्त पुनर्जीवित करने का अनुरोध किया। रूठी पार्वती माता को मनाने के अलावा शिवजी के पास कोई दूसरा रास्ता भी ना था। तब शिवजी ने कहा कि गणेशजी का सर पुन: धर से तो नहीं जोड़ा जा सकता, परन्तु एक जीवित प्राणी का सर स्थापित जरूर किया जा सकता है। शिवजी के निर्देशों के अनुसार सेवक जंगल में ऐसे प्राणी को ढूंढ़ने निकले जो उत्तर दिशा की तरफ सर रखकर सो रहा हो। ऐसा ही एक हाथी जंगल में उत्तर दिशा की तरफ मुख किए सो रहा था। शिवजी के सेवक उसे उठा कर ले आए। शिवजी ने हाथी का सर सूंड़-समेत गणेशजी के शरीर से जोड़ दिया और इस प्रकार गणेशजी के शरीर में पुन: प्राणों का संचार हुआ। इतना ही नहीं, शिवजी ने यह भी उद्घोषना की कि पृथ्वीवासी किसी भी नए कार्य को शुरू करने से पहले गणेश भगवान की पूजा-आराधना करेंगे।

गणेशजी की सम्पूर्ण शारीरिक रचना के पीछे भगवान शिव की व्यापक सोच रही है। एक कुशल, न्यायप्रिय एवं सशक्त शासक एवं देव के समस्त गुण उनमें समाहित किए गए हैं। गणेशजी का गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं। वे विवेकशील हैं। उनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र हैं। हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है। हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आंखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। दरअसल गणेश तत्ववेत्ता के आदर्श रूप हैं। गण के नेता में गुरुता और गंभीरता होनी चाहिए। उनके स्थूल शरीर में वह गुरुता निहित है। उनका विशाल शरीर सदैव सतर्क रहने तथा सभी परिस्थितियों एवं कठिनाइयों का सामना करने के लिए तत्पर रहने की भी प्रेरणा देता है। उनका लंबोदर दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है तथा सभी प्रकार की निंदा, आलोचना को अपने उदर में रखकर अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। छोटा मुख कम, तर्कपूर्ण तथा मृदुभाषी होने का द्योतक है।तभी से गणेश सुख-समृद्धि, रिद्धि-सिद्धि, वैभव, आनन्द, ज्ञान एवं शुभता के अधिष्ठाता देव हैं। संसार में अनुकूल के साथ प्रतिकूल, शुभ के साथ अशुभ, ज्ञान के साथ अज्ञान, सुख के साथ दु:ख घटित होता ही है। प्रतिकूल, अशुभ, अज्ञान एवं दु:ख से परेशान मनुष्य के लिए गणेश ही तारणहार है। वे सात्विक देवता हैं और विघ्नहर्ता हैं। वे न केवल भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के कण-कण में व्याप्त है बल्कि विदेशों में भी घर-कारों, कार्यालयों एवं उत्पाद केन्द्रों में विद्यमान हैं। हर तरफ गणेश ही गणेश छाए हुए हैं। मनुष्य के दैनिक कार्यों में सफलता, सुख-समृद्धि की कामना, बुद्धि एवं ज्ञान के विकास एवं किसी भी मंगल कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने हेतु गणेशजी को ही सर्वप्रथम पूजा जाता है। याद किया जाता है। प्रथम देव होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है लोकनायक का चरित्र हैं, वे बुद्धि के देवता हैं।
ललित गर्ग (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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