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ओपिनियन

कर्नाटक: बार-बार इस्लामिक नारे

Monday, December 07, 2020 11:50 AM
फाइल फोटो।

उत्तर कर्नाटक के तटीय जिले मंगलुरु में एक छोटा सा शहर है भटकल। इसे मिनी दुबई भी कहा जाता है। राज्य में जब भी कोई कट्टरपंथी इस्लामिक घटना होती है तो पुलिस और ख़ुफिया एजेंसियों की नजर सबसे पहले इस इलाके या यों कहिए इस शहर की ओर जाती है। इसका कारण यह है कि देश के सबसे पहले इस्लामिक आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहीद्दीन के सह-संस्थापक अहमद सिद्दिबापा उर्फ यासीन भटकल इसी जगह का ही रहने वाला है। उसने ही यहां के मुस्लिम युवकों को कट्टर इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया था। फिर उन्हें अपने संगठन का सदस्य बनाकर यहां के जंगलों में उनके ट्रेनिंग कैंप लगाए थे। जहां उन्हें बम्ब बनाने, विस्फोट करने और हथियार चलाने के लिए तैयार किया गया था। बाद में इन्हीं युवकों द्वारा राज्य में तथा देश के कुछ अन्य भागों में आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया जाता है। उनमें से कई यहां तक की खुद यासीन भटकल को गिरफ्तार भी किया गया था।

बड़ी संख्या में यहां मुस्लिम युवक खाड़ी देशों में काम करते हैं तथा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वे यहाँ रह रहे अपने परिवारों के सदस्यों को भेजते हैं। यहाँ के अधिकांश मुस्लिम नवाथ समुदाय के हैं। देश के विभाजन के समय काफी संख्या में इस समुदाय के मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे। यहाँ के इन मुसलामनों के अभी भी पाकिस्तान में रह रहे उन मुसलमानों से अभी भी रिश्ते बने हुए हैं। दोनों ओर के परिवारों में शादी विवाह भी होते रहते हैं। यहां ईद उसी दिन मनाई जाती है जिस दिन सऊदी अरब में चांद दिख जाता है। जबकि सामान्य तौर पर देश के अन्य भागों तीज के दिन अगर चांद नहीं दिखता तो सऊदी अरब में ईद के अगले दिन ईद मनाई जाती है। यह माना जाता है कि यहाँ के मुस्लिम सदियों पहले अरब देशों से यहां घोड़ों का व्यापार करने के लिए इस तटीय इलाके में पहुंच थे। उनमें कई यहीं बस गए और समय के साथ उनकी आबादी भी बढ़ती गई और वे पूरी तरह यहीं रस बस गए।

इस साल के शुरू में जब-जब दिल्ली सहित देश के कई भागों में मुसलमानों ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू किया तो राज्य की राजधानी बंगलुरु, जहां काफी बड़ी मुस्लिम आबादी है, उससे भी बड़ा आन्दोलन मंगलुरु में हुआ था। एक समय ऐसा था जब करीब 20 हजार मुसलमान इस कानून के विरोध में यहां जुटे थे। कड़ी पुलिस व्यवस्था के बावजूद आन्दोलन हिंसक हो गया। आखिर में भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें दो मुस्लिम युवक मारे गए और काफी लोग घायल भी हुए। पुलिस ने बड़ी संख्या में उन लोगों को गिरफतार किया। जिन पर हिंसा भड़काने का आरोप था। इस घटना के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने यहां कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया। पर इन सबके बावजूद करीब दस दिन पूर्व एक बार नहीं बल्कि दो बार शहर की दीवारों पर इस्लामिक कट्टरपंथी नारे लिखे पाए गए। ये नारे अंग्रेजी लिपि में थे, पर इनकी भाषा उर्दू थी। यह नारा सबसे बड़े इस्लामिक आतंकवादी संगठन लश्करे-ए-तैयबा के समर्थन में लिखा गया था। पूरा नारा था हमें संघियों और मनुवादियों से निपटने के लिए लश्करे द्वारा ए-तैय्यबा को बुलाने के लिए मजबूर ना करो। नीचे लिखा गया था। लश्कर जिंदाबाद। यह नारा शहर के एक बहुमंजिला ईमारत की बाहरी दीवार पर लिखा गया था।

संभवत: यह नारा रात के समय लिखा गया हो। सूचना मिलने पर पुलिस ने इस नारे को पोत दिया। फिर इस नारे को लिखने वालों की धरपकड़ के लिए तीन टीमों का गठन कर दिया। आसपास लगे सीसीटीवी कमरों को खंगाला गया। लेकिन पुलिस संदिग्धों को पकड़ने में सफल नहीं हुई। उनको पकड़ने की कोशिशें अभी चल रही थी कि जल्दी ही एक और दीवार पर ऐसा ही नारा लिखा पाया गया। मजे की बात यह कि यह नारा उस ईमारत की दीवार पर लिखा पाया गया जहां कुछ समय पहले तक पुलिस की चौकी थी। यह नारा था ‘गुस्ताखे-ए-रसूल एक ही सजा- सर-तन से जुदा। यह घटना तब हुई जब पुलिस ने शहर के अधिकांश इलाकों में रात की गश्त को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया। इस नारे को भी पुलिस ने आनन-फानन में पोता, लेकिन इसके साथ ही कई और टीमों का गठन कर दिया ताकि इन तत्वों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जा सके। ऐसा समझा जाता है कि पुलिस इन ऐसे मुस्लिम युवकों को चिन्हित कर रही है जो कभी प्रतिबन्धित संगठन इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़े हुए थे या फिर बाद में पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया सक्रिय हो गए। इस संगठन का गठन सिमी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ही हुआ था। इसका मुख्यालय केरल में है तथा इसकी लगभग सभी राज्यों में ईकाइयां हैं।
-लोकपाल सेठी (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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